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नाउम्मीदी को मात देती संघर्ष की एक दास्तां, जिसे सदियों याद रखेगा हिंदुस्तान

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मिलिए अनाथालय से IAS का अद्भुत सफर तय करने वाले असल नायक मो.अली शिहाब से

जिंदगी में मुसीबतें कितनी भी हो, जब लक्ष्य को पाने की चाहत प्रबल हो तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आपके मंज़िल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। या फिर यूं कह लीजिए कि जिसे ज़िंदगी में अपने हुनर के दम पर कुछ हासिल करना होता है, उसे सुविधाओं और संसाधनों की जरूरत नहीं होती। बिना किसी सहारे और शिकायत के भी वो आगे बढ़ जाते हैं और कुछ ऐसा कर दिखाते हैं जो उनके आसपास के माहौल के हिसाब से नामुमकिन होता है। यह सिर्फ कहने की बात नहीं है बल्कि एक सच्चाई है। हमारे समाज में हमारे ईर्द-गिर्द ही ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्होंने आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियों का सामना करते हुए अपने संघर्ष से सफलता की नई इबारत लिखी।

आईएस मोहम्मद अली शिहाब भी एक ऐसी ही शख़्सियत हैं, जिन्हेोंंने बचपन से ही तमाम चुनौतियों का सामना किया, कच्ची उम्र में ही पिता का साया छिन गया और गरीबी के चलते पूरा बचपन अनाथालय में गुज़ारना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और खुद को मुश्किल से मुश्किल हालातों का मुकाबला करने के काबिल बनाया। कुछ बड़ा करने का जुनून ऐसा कि अनाथालय के अभावों और बंधनो को तोड़ते हुए एक आईएएस ऑफिसर बनने का गौरव हासिल किया है। आज वो नागालैंड के कोहिमा में एक सफल प्रशासनिक अफसर (कलेक्टर) के रूप में कार्यरत हैं। मो. अली शिहाब का जन्म केरल के मलप्पुरम जिले के एडवन्नाप्परा गांव में एक बेहद ही गरीब परिवार में हुआ। उनके पिता अपनी पत्नी, तीन बेटियों और दो बेटों के पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं थे। बहुत ही कम उम्र में शिहाब को अपने पिता के काम में हाथ बंटाना शुरू कर देना पड़ा l वो पान के पत्ते की बिक्री करते और बांस की टोकरी बनाकर बेचते थे ताकि उनके भाई-बहन को भूखा न सोना पड़े। अपने बीमार पिता को घर से उनकी खस्ताहाल दुकान तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी भी शिहाब के कंधों पर ही थी, इसलिए वो स्कूल बहुत ही कम जा पाते थे। बीमार पिता को मोहम्मद काम में हाथ बंटाता था। इस वक्त उसके लिए पढ़ाई किसी चुनौती से कम नहीं थी। फिर भी नन्हा मोहम्मद स्कूल में अच्छे अंक लाता रहा। 

शिहाबजी अतीत के पन्नों को पलटते हुए अपने बचपन से जुड़ी यादें साझा करते हुए कहते हैं कि सन 1980 के दशक में गांव के अन्य लड़कों की तरह मेरा भी सपना था दुकान खोलने का। तब मेरे जैसा बच्चा इससे आगे सोच भी नहीं सकता था। अस्थमा से पीड़ित मेरे पिता कोरोत अली इस काबिल नहीं थे कि परिवार का पालन-पोषण कर सकें। इसलिए मुझे कभी बांस की टोकनियां तो कभी पान के पत्ते बेचने जाना पड़ता था। इसी वजह से मैं अक्सर स्कूल से भाग जाया करता था। मन में पढ़ने की खूब ललक थी लेकिन आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारी का बोझ मुझे किताबों से दूर कर रहा था।


उन्हें बहुत बड़ा सदमा पहुंचा जब 1991 में उनके पिता का देहांत हो गया। वो तब सिर्फ ग्यारह साल के थे। शिहाब के जीवन में एक गहरा अंधकार छा गया जिसमें उनके किसी भी सपने को जीवित रखने की कोई जगह नहीं थी। उनकी मां पर पांच बच्चों की ज़िम्मेदारी आ गई और उनके पास बच्चों को पेट भर खाना देने तक का कोई रास्ता नहीं था। उनके बच्चें भुखमरी और मौत से बचे रहे इसलिए उन्होंने एक बेटे और दो बेटियों को कोझिकोड के एक अनाथालय में डाल दिया। कोई भी मां यह नहीं चाहती कि उसके बच्चें उससे दूर चले जाएं, पर फातिमा ने अपने दिल पर पत्थर रख कर अपने पति के देहांत के दूसरे ही दिन बच्चों को एक मुस्लिम अनाथालय में भेज दिया। 

अनाथालय में प्रवेश के लिए 5वीं में होना पड़ा फेल

अनाथालय में प्रवेश पाने के लिए मोहम्मद अली शिहाब को कक्षा पांचवीं में फेल होना पड़ा। उस समय शिहाब मात्र 11 साल के थे और उन्‍होंने अनाथालय में 10 साल बिताए। इस दौरान उन्होंने अपनी पढ़ाई के साथ मजदूरी और सड़क किनारे होटल में काम तक किया। शिहाब कहते हैं कि अनाथालय, अनाथालय होता है और औपचारिक स्कूल, औपचारिक स्कूल, फिर भी शिहाब के लिए अनाथ आश्रम का जीवन उस जीवन से बेहतर था जहां पिता के गुज़र जाने के बाद उनका परिवार मजदूरी करके पेट पालने को मजबूर था। 

अगर आपके पास खोने को कुछ नहीं है तो आपके पास हासिल करने के सारे रास्ते खुले होते हैं। लिहाजा अनाथालय में शिहाब के लिए जीवन कुछ बेहतर था लेकिन यहां पर औपचारिक स्कूली शिक्षा का अभाव था। वो मलयालम और उर्दू मदरसा में पढ़ते हुए बड़े हुए। उन्हें जो भी पढ़ाया जाता वो आसानी से समझ लेते थे। शिहाब 21 साल की उम्र तक अनाथ आश्रम में रहे और इस दौरान तमाम परेशानियों के बीच अपनी हिम्मत बनाए रखी और मुकाम हासिल किया।

शिहाब आगे कहते हैं कि अनाथालय में मेरे जीवन में कई बदलाव आए। एक बदलाव तो यही था कि जीवन में जिस अनुशासन की कमी थी, वह आया। वहां मेरी पढ़ाई मलयालम व उर्दू भाषा में हुई। वहां संसाधन और अवसर सीमित थे। मेरा मन पढ़ाई में लगता था, इसलिए मैं लगातार आगे बढ़ता गया और 10वीं कक्षा अच्छे अंकों से पास की। उसके बाद मैं ‘पूर्व-डिग्री शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम’ में शामिल हो गया। अनाथालय के नियमानुसार रात आठ बजे बाद सभी सो जाते थे। मैं आधी रात को उठकर पढ़ता था। वह भी बेडशीट के अंदर अनाथालय की टॉर्च की कम रोशनी में, ताकि मेरे साथ वालों की नींद खराब न हो। मैं अच्छे कॉलेज से रेगुलर ग्रेजुएशन करना चाहता था लेकिन गरीबी के चलते मुझे किसी का साथ नहीं मिला। खर्च चलाने के लिए मैं प्राथमिक स्कूल में पढ़ाने के साथ पीएससी की तैयारी भी करता रहा। केरल जल प्राधिकरण में चपरासी रहते हुए कालीकट विश्वविद्यालय में इतिहास विषय में बीए में दाखिला ले लिया। इस तरह तीन साल तक छोटी-छोटी नौकरियों के साथ पढ़ाई जारी रखी। उस दौरान मैंने सीमित योग्यता के साथ फॉरेस्ट, रेलवे टिकट कलेक्टर, जेल वार्डन, चपरासी और क्लर्क आदि की राज्यस्तरीय लोक सेवा आयोग की परीक्षाएं पास कीं।

लगातार 21 प्रतियोगी परीक्षाओं में हुए सफल  

कहते हैं असली हीरो वही होता है जो चौतरफा चुनौतियों से लड़कर आगे आता है, फिर परिस्थिति चाहे कैसी भी हो। शिहाब ने भी तमाम संघर्षों के बीच कभी अपना हौंसला कम नहीं होने दिया। अपनी काबिलियत के दम पर उन्होंने लगातार 21 प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने का श्रेय भी हासिल किया। इसके बाद उन्‍होंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने की ठानी और मेहनत शुरू की। शिहाबजी के मुताबिक उन्होंने 25 साल की उम्र से ही सिविल सेवा की परीक्षा देने का सपना देखना शुरू कर दिया था।  

आखिरकार मो. अली शिहाब की मेहनत और संघर्ष के आगे हवा को भी अपना रुख बदलना पड़ा और किस्मत ने उनका साथ देना शुरू किया। साल 2009 में दिल्ली स्थित ज़कात फाउंडेशन ने मेधावी निर्धन छात्रों के लिए चलाई जा रही नि:शुल्क प्रशासनिक सेवा परीक्षा कोचिंग के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट के माध्यम से केरल के 12 छात्रों का चयन किया, जिसमें मोहम्मद अली शिहाब भी शामिल थे।

शिहाब के बड़े भाई अब तब तक एक आयुर्वेदिक डॉक्टर बन गए थे और उन्होंने शिहाब को सलाह दी कि वो सरकारी परीक्षा में बैठें लेकिन शिहाब को उस वक्त सिविल सर्विस के बारे में कुछ पता ही नहीं था। इसी दौरान 2009 में दिल्ली स्थित जकात फाउंडेशन ने केरल में उन उम्मीदवारों की एक परीक्षा रखी, जिसमें चुने जाने वाले छात्रों को यूपीएससी की तैयारी मुफ्त में करवाई जाती थी। यह शिहाब के लिए एक बड़ा अवसर बन कर आया, उनका चयन हो गया और वो आगे की तैयारी के लिए दिल्ली चले गए। दिल्ली में उनकी कोचिंग तो शुरू हो गई लेकिन उनके पास किताबें और अखबार खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे। इसलिए वो पब्लिक लाइब्रेरी में पढ़ाई करते और वहीं न्यूजपेपर पढ़कर नोट्स तैयार करते। बस मन में एक ही ख्वाहिश थी कि किसी काबिल बन भाई-बहनों के लिए कुछ कर सकें।साल 2007-2008 में शिहाबजी ने प्रीलिम्स टेस्ट दिया, तब तक उनकी उम्र 30 साल होने वाली थी लिहाजा उनके पास ज्यादा वक्त नहीं था। इस बीच उनकी शादी भी हो गई। चुनौतियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। आर्थिक तंगी से जूझते हुए, पारिवारिक जिम्मेदारी के बीच भी उन्होंने सिविल सर्विस की तैयारी जारी रखी। पहले की गई दो कोशिशों में वो असफल रहे, मगर अपना हौसला कमजोर नहीं पड़ने दिया। इस बीच एक और बड़ी चुनौती ने उनकी जिंदगी में दस्तक दी। तीसरे प्रयास के दौरान परीक्षा के ठीक पहले उनकी नवजात बच्ची बीमार हो गई और उसे लकवा हो गया। शिहाब अस्पताल के चक्कर लगाने के साथ ही पढ़ाई पर भी ध्यान देते रहे और परीक्षा में भी बैठे। आखिरकर उनकी मेहनत रंग लाई और 2011 में जब रिजल्ट सामने आया  तो 33 साल के शिहाब ने 226 वीं रैंक हासिल की। 

आसान नहीं था सफर

शुरुआती दिनों से लेकर आईएएस अधिकारी बनने तक का सफर शिहाबजी के लिए बिल्कुल भी आसान नहीं रहा। सिविल सर्विस की पहली दो परिक्षाओं में शिहाब असलफल रहे, लेकिन उन्होंने धैर्य बनाये रखा और थर्ड अटैंप्ट दिया। वहीं अंग्रेजी कमजोर होने के चलते उन्हें इंटरव्यू के दौरान ट्रांसलेटर की मदद भी लेनी पड़ी। बावजूद इसके उन्होंने 300 में से 201 नंबर हासिल किए, जो काफी अच्छा स्कोर था। इसके बाद उन्होंने लालबहादुर शास्त्री नेशनल अकादमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन में ट्रेनिंग ली, जहां नौकरी के हर पहलु से अवगत कराया गया और कैडर (नागालैंड) की भाषा भी सिखाई गई। सबसे पहले दीमापुर जिले में असिस्टेंट कमिश्नर के तौर पर उनकी नियुक्ति हुई। नवंबर 2017 में शिहाब जी का ट्रांसफर कैफाइर जिले में हो गया। इस जिले को प्रधानमंत्री और नीति आयोग ने देश के 117 महत्वाकांक्षी जिलों में से एक घोषित किया है। यह भारत के सबसे दूरस्थ और दुर्गम जिलों में से एक है। 

जब कोई युवा अपने अभावग्रस्त परिवार के हालात को पछाड़ते हुए देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा में काबिज हो जाता है, पूरे समाज के लिए हीरो बन जाता है।

दुनिया में ज्यादातर लोग विपरीत परिस्थितियों के सामने टूट जाते हैं, लेकिन शिहाबजी तो मानो चुनौतियों से लड़ने के लिए ही पैदा हुए थे। छोटी उम्र में घर की बड़ी जिम्मेदारी ने उन्हें समय से काफी पहले ही परिपक्व बना दिया था।आईएएस मो.अली शिहाब अपनी सफलता का श्रेय अनुशासन, कड़ी मेहनत और चुनौतियों के बीच लगातार कोशिश करते रहने की ललक को देते हैं। शिहाब जी छोटी-छोटी कठिनाइयों के सामने हताश होने वाले हिंदुस्तान के आज के नौजवानों को संदेश देते हुए कहते हैं कि अगर केरल के अनाथालय से मेरे जैसा लड़का सभी बाधाओं को पार कर यह मुकाम हासिल कर सकता है, तो कोई भी कर सकता है। आप किसी भी परीक्षा या चुनौती में पहले प्रयास में पास नहीं होते हैं तो उम्मीद ना छोड़ें, डंटे रहे पूरी हिम्मत के साथ यकीन मानिए आने वाला कल आपका होगा।

आईएएस मो. अली शिहाब जैसे लोग प्रेरणा हैं उन लोगों के लिए जिनके सपने तो बड़े हैं, लेकिन उनके हिस्से का आकाश उन्हें विरासत में नहीं मिलता बल्कि खुद गढ़ना होता है। इंसान अगर ठान ले तो कुछ भी नामुमकिन नहीं, जैसे कि शिहाब ने कर दिखाया।

युवाओं को प्रेरित करने के लिए लिखी किताब

मुसीबतें हमारी जिंदगी का एक हिस्सा या फिर यूं कहें कि एक कड़वा सच हैं। कोई इस बात को समझकर दुनिया से लोहा लेता है, तो कोई पूरी जिंदगी इस बात का रोना रोता है। जिंदगी के हर मोड़ पर मिलने वाली इन मुश्किलों को देखने का हर किसी का अपना एक अलग नजरिया होता है। कई लोग जिंदगी की राह में आने वाले इन मुसीबतों के पहाड़ के सामने टूटकर बिखर जाते हैं तो कई लोग इन चुनौतियों से भिड़कर दूसरों के लिए नया मार्ग खोल जाते हैं। आईएएस मो.अली शिहाब की कहानी भी आज देश के लाखों लोगों की जिंदगी को एक नई दिशा दे रही है। शिहाबजी ने युवाओं को प्रेरित करने के लिए अपनी ऑटो बायोग्राफी ‘VIRALATAM’ भी लिखी है, जो हर स्टूडेट को जरूर पढ़ना चाहिए।

परेशानियों के पहाड़ को अपने जुनून के पराक्रम से परास्त करने वाले आईएएस मोहम्मद अली शिहाब की धूप-छांव भरी जिंदगी की कहानी वाकई आज देश के कोने-कोने तक फैलाई जानी चाहिए, हर एक बच्चे को पढ़ाना चाहिए, हर नौजवान को समझाना चाहिए, ताकि मुसीबतों से डरकर कभी कोई जिंदगी का साथ ना छोड़े, बल्कि चुनौतियों से लड़ना सीखे और समय के आगे घुटने टेकने की बजाए डटना सीखे। शिहाब की कहानी साबित करती है कि मुश्किलों से घबराकर उसके सामने घुटने टेक देना और जिंदगी भर घुट-घुट के जीना कोई अक्लमंदी नहीं होती। कंडीशन चाहे जितनी भी खराब और आपके खिलाफ क्यों न हों, हमें अपना संघर्ष हमेशा जारी रखना चाहिए ,क्योंकि हालातों से लड़ना, लड़कर गिरना और फिर उठकर संभलना ही जिंदगी है।

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