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साल 2006 में आई नागेश कुकूनूर की फिल्म डोर के एक गाने “ये हौसला कैसे झुके” ने आम दर्शकों की तरह मुझे भी काफी प्रभावित किया था। मैं यह तो नहीं कह सकता कि डायरेक्टर नागेश कुकुनूर ने ये गाना यूपी कैडर के आईएएस मुकेश मेश्राम के जीवन संघर्ष से प्रभावित होकर ही लिखा होगा, मगर ये जरूर कह सकता हूं उन्होंने ये गीत मुकेश मेश्राम जैसे असल जिंदगी के नायकों के जीवन संघर्ष से प्रभावित होकर ही गढ़ा होगा।


IAS Mukesh Meshram वैसे तो जब एक आईएएस अफसर का जिक्र होता है, तो दिमाग में एक सख्त और रौबदार अफसर की छवि उभर आती है, जो काम से काम रखता हो। लालबत्ती वाली गाड़ी, सरकारी तामझाम और जी हुजूरी करते मुलाजिम। लेकिन जब नाम आईएएस मुकेश मेश्राम का आता है, तो सहज ही दिमाग में एक छवि उभरती है एक सादगी पसंद इंसान की जो समाजसेवक है, चिंतक है, विचारक है, लेखक है, कवि है, साहित्यकार है…. और इन सबसे बढ़कर इंसानों की तकलीफ समझने वाला खुद भी एक आम इंसान। जो अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। जिनका अलहद अंदाज जनता का दिल जीत लेता है। उनके लिए किसी पद के कोई मायने नहीं होते। वो काम के प्रति भी बखूबी अपना दायित्व निभाते हैं और सामाजिक कार्यों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं। 

वर्तमान में मुकेश जी उत्तर प्रदेश के टूरिज्म एवं कल्चर विभाग के प्रिसिंपल सेकेट्री की भूमिका में नए-नए आयाम गढ़ने के साथ ही पर्यटन के नक्शे में उत्तर प्रदेश को नई पहचान दिला रहे हैं। 1995 बैच के आईएएस अधिकारी मुकेश मेश्राम का नाम सूबे के उन दमदार आईएएस अधिकारियों में शुमार है जो अपनी ईमानदारी, सादगी, सहजता, कार्यकुशलता और नवाचार के लिए जाने जाते हैं। संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव से पहले वो कई जिलों आजमगढ़, बांदा, कानपुर, मेरठ, आगरा में डीएम की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। इसके अतिरिक्त उपाध्यक्ष लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए), आयुक्त वाणिज्य कर, आयुक्त प्रयागराज, सचिव चिकित्सा-शिक्षा और आयुक्त लखनऊ समेत कई अहम पदों पर सेवाएं दे चुके हैं। खेलों में भी उनकी विशेष रुचि है और वो कई खेल संघों विशेषकर साधनविहीन, मूकबधिर, नेत्रहीन, दिव्यांग बच्चों को जूडो का प्रशिक्षण दिलाकर राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभाग करने हेतु पैरा जूडो एसोसिएशन से भी जुड़े हुए हैं।IAS Mukesh Meshram

एक छोटे और बेहद पिछड़े गांव के गरीब परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद देश के सबसे बड़े प्रदेश की प्रशासनिक गलियों में अपना खास मुकाम बनाने तक का उनका सफर कभी इतना आसान नहीं रहा। उनकी जिंदगी कई संघर्षों को खुद में समेटे हुए है।


एक बेहद पिछड़े गांव के अभावग्रस्त परिवार में जन्मे मुकेश मेश्राम ने बचपन से ही तमाम चुनौतियों का सामना किया, छोटे गांव से ताल्लुक रखने के कारण पढ़ाई की अच्छी सुविधा नहीं मिली, मुफलिसी के तमाम रंग देखे लेकिन कुछ भी इन्हें अपने ख्वाबों तक पहुंचने से नहीं रोक सका। जिंदगी ने हर मोड़ पर कठिन परीक्षा ली लेकिन मुकेश कभी मंजिल से भटके नहीं, हिमालय से अडिग रहे- अपने लक्ष्य पर। विपरीत हालातों से हार मानने की बजाए खुद को मुश्किल से मुश्किल हालातों का मुकाबला करने के काबिल बनाया। जिंदगी में कुछ बड़ा करने का जुनून ऐसा कि आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियों का सामना कर अभावों के बंधनो को तोड़ते हुए एक प्रशासनिक ऑफिसर बनने का गौरव हासिल किया। आज उनके संघर्ष की कहानी उन तमाम लोगों के लिए अंधकार में रोशनी की किरण की तरह है, जिनके सपने हालातों के आगे हार मानकर दम तोड़ देते हैं।

गांव की पगडंडियों से प्रशासनिक गलियारों तक

IAS Mukesh Meshramमुकेश मेश्राम का जन्म 26 जून 1967 को मध्यप्रदेश के नक्सल प्रभावित जिले बालाघाट के लालबर्रा तहसील के वन ग्राम बोरी में हुआ। उनका बचपन काफी गरीबी में असुविधाओं के बीच बीता। कक्षा सातवीं उत्तीर्ण पिता प्राइमरी स्कूल में टीचर थे और उस वक्त उनकी सैलरी काफी कम हुआ करती थी जबकि परिवार काफी बड़ा था। घर में वे 5 भाई और 4 बहनें थी। लिहाजा परिवार के गुजर बसर के लिए मुकेश जी की मां दूसरों के खेतों में मेहनत-मजदूरी का काम करती थीं। मुकेश हर रोज नंगे पांव अपने घर से पांच किलोमीटर दूर स्कूल पढ़ने जाते थे। उन्हें बचपन से ही किताबें पढ़ने का शौक था लिहाजा स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ वो दूसरे काम भी करते। गांव में अगर कहीं कोई काम मिलता, किसी का मकान बन रहा होता, खेतों की देखभाल, जुताई-बुआई, हल-बैल चलाने से लेकर, महुआ बीनना, सब्जी उगाना या कुछ और तो मुकेश जी वहां जाकर काम करते और वहां से जो पैसे मिलते उससे पुस्तक खरीद लेते। फिर गांव के दूसरे बच्चों को इकट्ठा करके ना सिर्फ जोर-जोर से कहानी पढ़कर सुनाते, बल्कि इन कहानियों के जरिए उन्हें भी पढ़ाई के लिए प्रेरित करते।

मुकेश को पुस्तकों के साथ-साथ प्रकृति से भी काफी लगाव था। कक्षा 6वीं की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने गांव में एक लाइब्रेरी की स्थापना के साथ ही ‘प्रेरणा बाल सभा’ नाम से बच्चों की एक संस्था बनाई। इसके जरिए वो गांव के सारे बच्चों को एकत्रित कर वन विभाग की नर्सरी से पौैधे लाकर खाली जगहों पर वृक्षारोपण कराते थे। इसके अलावा फोक सांग, फोक डांस समेत कई तरह के कल्चरल कार्यक्रम भी कराते। आगे जाकर मुकेश जी को मल्टीपरपज हायर सेकण्डरी स्कूल, बालाघाट का कल्चरल सेकेट्री भी बनाया गया था। मुकेश को बचपन से ही कहानी और कविता लेखन का भी शौक था। जिसके लिए उन्हें दुर्ग में राज्यस्तरीय पुरस्कार भी मिला।IAS Mukesh Meshramमुकेश शुरू से ही काफी होनहार और मेधावी थे। कक्षा 8 के बाद ग्रामीण प्रतिभा खोज परीक्षा में उनका चयन हो गया। आठवीं बोर्ड की परीक्षा में जबलपुर डिवीजन में तीसरी रैंक आई। उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए वजीफा मिलने पर पहले नैनपुर और फिर बालाघाट के मॉडल स्कूल में मुकेश जी को दाखिला मिला और वो शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़े। यहीं से उनके आत्मनिर्भर बनने का सफर शुरू हुआ। बालाघाट में शहर के बाहर सीलनयुक्त एक कमरा किराये पर लेकर खुद खाना बनाते, खाते औंर स्कूल जाते। खाना बनाने के लिए एक केरोसिन स्टोव औंर दो बर्तन मात्र थे जिनमें चावल पकाते या खिचड़ी।

अतीत के पन्नों को पलटते हुए मुकेश जी कहते हैं कि मेरा बचपन काफी अभावों और ग्रामीण परिवेश में बीता। मैं पिछड़े आदिवासी जिले बालाघाट से ताल्लुक रखता हूं। जहां आज भी पचास फीसदी से अधिक जंगल हैं। एक गांव से दूसरे गांव के बीच बहुत दूरी होती है। बीच में जंगल होते हैं। इन्हीं जंगलों में छोटे-छोटे खेत होते हैं, जिनकी फसल मुख्यतः वर्षा पर ही निर्भर रहती है। साल में एक ही फसल हो पाती है। बाकी महुआ एवं जंगली उपज सावा, कोदो, कुटकी आदि पर लोग अपना जीवन-यापन करते हैं। मुकेश जी बताते हैं कि पहले गांव में मूलभूत सुविधाओं का नामो निशां तक नहीं था। स्कूल जाने के लिए जंगल व खेतों के बीच सर्राटी नदी पार करनी पड़ती थी। हम बचपन में गांवभर मात्र एक कपड़े के नाड़े वाली सूती चड्डी पहनकर नंगे पांव घूमते रहते, जो खाना मिलता (अक्सर लाल मिर्च की चटनी औंर चावल) उसी में खुश रहते, बड़े भाइयों के जैसे कपड़े मिलते उसे पहन लेते।


दुनिया में ज्यादातर लोग विपरीत परिस्थितियों के सामने टूट जाते हैं, लेकिन मुकेश तो चुनौतियों से लड़ने के लिए ही पैदा हुए थे। छोटी उम्र में घर की बड़ी जिम्मेदारी ने उन्हें समय से काफी पहले ही परिपक्व बना दिया था। बावजूद इसके उन्होंने कभी हार नहीं मानी और बुरे हालातों का डटकर सामना किया। मुकेश जी कहते हैं कि संघर्ष जीवन को निखारता है। हमारे पास न रहने के लिए सर्व-सुविधायुक्त पक्का घर था और न ही पढ़ने के लिए पर्याप्त पैसे, था तो सिर्फ हौसला, जो सपनों को पूरा करने के लिए काफी था।

पढ़ाई के साथ-साथ पत्रिका का प्रकाशन

IAS Mukesh Meshramमुकेश शिक्षा की अहमियत को भली-भांति जानते थे और यह भी जानते थे कि शिक्षा के जरिए ही वो अपने परिवार को गरीबी के दलदल से बाहर निकाल सकते हैं। लिहाजा उन्होंने पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ बालाघाट में परिवार से दूर रहकर अपनी पढ़ाई जारी ऱखी। मैट्रिक के बाद उन्होंने राजधानी भोपाल का रूख किया और मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ टेक्नालॉजी में श्बैचलर ऑफ आर्किटेक्चरश् में दाखिला लिया। आर्किटेक्चर की महंगी पढ़ाई का खर्च निकालने वे पार्ट टाइम जाब करते थे- कभी किसी सीनियर आर्किटेक्ट के ऑफिस में ड्राफ्टिंग, रेण्डरिंग, ड्राईंग करना हो, या राम प्रसाद एण्ड संस प्रकाशन के लिये रेखाचित्र बनाना, पुस्तकों के कवर डिजाइन करना औंर छुट्टियों में बुक्स के सेल्स रिप्रेजेण्टेटिव का काम। स्कूलों-कॉलेजों में जाकर पुस्तकें बिकवाना।

भोपाल में आर्किटेक्चर की पढ़ाई के पहले साल में ही महज 16 वर्ष की उम्र में मुकेश जी ने ‘सुबास’ नाम से एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। जिसमें विज्ञान, साहित्य, संस्कृति, कला और क्विज़ के साथ-साथ युवाओं औऱ बच्चों से संबंधित समाचार और जानकारी होती थी। बाकायदा इस मासिक पत्रिका का आर.एन.आई. से रजिस्ट्रेशन भी करवाया था। कॉलेज के सहपाठियों एवं बाल लेखकों द्वारा लिखी गई रचनाओं को मुकेश जी इस पत्रिका में प्रकाशित करते। इसके अलावा मुकेश जी ने उस वक्त के देश के तमाम बड़े साहित्यकारों से संपर्क किया जिनमें डॉ. हरिवंशराय ‘बच्चन’, कन्हैयालाल नंदन, अमृता प्रीतम, विष्णु प्रभाकर, मृणाल पांडे, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ आदि प्रमुख हैं, सबने पत्रिका के लिए कुछ ना कुछ लिखा भी। इस दौरान मुकेश जी ने सोनल मान सिंह, अमोल पालेकर, ओमपुरी, खय्याम जैसी बड़ी-बड़ी शख्सियतों का साक्षात्कार भी लिया।

तीन साल तक सुबास पत्रिका खूब चली। लोग इसे काफी पसंद करते थे। आलम ये था कि पत्रिका के संपादक के नाम इतने ज्यादा पत्र आने लगे कि कॉलेज के पोस्ट ऑफिस वालों को मुकेश जी की पत्रिका के लिए अलग से एक लेटर बॉक्स तक लगवाना पड़ा। फिर आगे की पढ़ाई के चलते मुकेश जी नेे इस पत्रिका के प्रकाशन की जिम्मेदारी अपने जूनियर को सौंप दी। लेकिन जुनून औऱ वक्त की कमी के चलते ज्यादा दिन इसका प्रकाशन नहीं हो सका और आखिरकार मैग्जीन को बंद करना पड़ा।


IAS Mukesh Meshram

जिंदगी में मुसीबतें कितनी भी हो, जब लक्ष्य को पाने की चाहत प्रबल हो तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आपकी मंज़िल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती। या फिर यूं कह लीजिए कि जिसे ज़िंदगी में अपने हुनर के दम पर कुछ हासिल करना होता है, उसे सुविधाओं और संसाधनों की जरूरत नहीं होती। बिना किसी सहारे और शिकायत के भी वो आगे बढ़ जाते हैं और कुछ ऐसा कर दिखाते हैं जो उनके आसपास के माहौल के हिसाब से नामुमकिन होता है। आई.ए.एस. मुकेश मेश्राम के जीवन संघर्ष की कहानी भी कुछ यही साबित करती है।


भोपाल से बैचलर ऑफ आर्किटेक्चर की पढ़ाई करने के बाद मुकेश जी सन 1989 में मास्टर ऑफ आर्किटेक्चर का कोर्स करने के लिए तत्कालीन रूड़की यूनिवर्सिटी (आईआईटी रूड़की) चले गए। इसके बाद उन्होंने वर्नाकुलर आर्किटेक्टचर-ट्रेडिशनल इंडियन आर्किटेक्चर का उपयोग भारत में भवनों में एनर्जी कंजरवेशन के लिए क्यों जरूरी है, इस विषय पर रिसर्च की। इसके लिए करीब 75 ग्रंथों का अध्ययन करके टाउन प्लानिंग, भवन निर्माण, मंदिर निर्माण समेत डिजाइन से जुड़े कई कान्सेप्ट तैयार किए। खास बात यह थी कि मुकेश जी ने अपना डिसर्टेशन (शोध ग्रंथ) रिसर्च पत्र हिंदी में पेश किया। हालांकि काफी जद्दोजहद के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन ने मुकेश जी को अपनी रिसर्च हिंदी में पेश करने की अनुमति दी। इंडिया में इंजीनियरिंग के इतिहास में ये पहला मौका था जब किसी ने अपनी एम आर्क की थीसिस/डिजर्टेशन हिंदी में दाखिल की थी।

इस वाकये को याद करते हुए मुकेश जी बताते हैं कि मैं अपना डिजर्टेशन हिंदी में प्रस्तुत करना चाहता था। इसके लिए यूनिवर्सिटी से कई बार अनुमति मांगी लेकिन यूनिवर्सिटी प्रशासन ने हिंदी में डिजर्टेशन प्रस्तुत करने की अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया। बावजूद इसके मुकेश जी का हौसला कम नहीं हुआ और वो अपनी मांग पर अड़े रहे। इस दौरान विश्वविद्यालय विशेष तौर पर जवाहर भवन में रहने वाले पोस्ट ग्रेजुएट के छात्र और सहपाठी भी उनके समर्थन में आ गए और कुलपति आवास का घेराव कर चार घंटे धरने पर बैठे रहे। आखिरकार तीन महीने की लंबी मशक्कत के बाद यूनिवर्सिटी प्रशासन को मुकेश जी की मांग पर मुहर लगाना पड़ा और मुकेश जी ने हिंदी भाषा में अपनी थीसिस सबमिट की।

आईआईटी से तय किया आईएएस का सफर

रूड़की से पढ़ाई पूरी करने के बाद मुकेश जी ने नौकरी करने का फैसला लिया। सबसे पहले उन्होंने दिल्ली में हॉस्पिटल सर्विसेस कंसल्टेन्सी कॉर्पोरेशन में असिस्टेण्ट आर्कीटेक्ट का काम किया। कुछ महीनों तक दिल्ली में नौकरी करने के बाद मुकेश जी त्रिवेंद्रम चले गए और इसरो में साइंटिस्ट के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। कुछ समय इसरो में जॉब करने के बाद मुकेश जी वापस भोपाल चले गए और मौलाना आज़ाद एनआईटी कॉलेज में आर्किटेक्चर के सहायक प्राध्यापक के पद पर ज्वाइन किया।

मुकेश जी बताते हैं कि कभी आईएएस बनने का सोचा नहीं था। मौलाना आजाद कॉलेज ऑफ टेक्नॉलॉजी में पढ़ाते वक्त शिक्षक साथियों-गोविन्द गुप्ता, मनमोहन कापशे, राजेन्द्र बघेल आदि ने सिविल सर्विस की परीक्षा देने के लिए प्रोत्साहित किया। दोस्तों की सलाह पर ही यूपीएससी की तैयारी शुरू की। हिंदी साहित्य और इतिहास मेरे विषय थे। पहले प्रयास में असफलता हाथ लगी मगर उन्होंने हार नहीं मानी और एक बार फिर पूरी शिद्दत के साथ तैयारी में जुट गए। इस बार उनकी मेहनत रंग लाई। अपने दूसरे प्रयास में साल 1995 में मुकेश जी ने सिविल सर्विस की परीक्षा क्लियर कर ली और उन्हें जम्मू-कश्मीर कैडर मिला। साल 1998 में वो उत्तर प्रदेश आ गए और विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाई।

कहते हैं प्रतिभा ना हालात देखती है और ना ही अमीरी-गरीबी का फर्क जानती है। वो तो बस साबित होने का अवसर तलाश करती है। और जैसे ही वो अवसर मिलता है, दुनिया के आगे अपना लोहा मनवा लेती है। मुकेश मेश्राम ने भी बिना किसी सुविधा और संसाधन के जिंदगी में बड़ा मुकाम हासिल किया है। यहां तक कि घर की खराब आर्थिक स्थिति ने उन्हें प्रतियोगी परीक्षा के लिए कोचिंग तक की इजाजत नहीं दी, बावजूद इसके वो रुके नहीं और हर परीक्षा में अपने हुनर और मेहनत के दम पर कामयाबी का परचम लहराया।

सिविल सर्विस ज्वाइन करने की वजह

IAS Mukesh Meshram

जिंदगी की हर कहानी एक सी नहीं होती लेकिन किसी मोड़ पर कुछ ऐसा होता है जिससे जिंदगी की पूरी कहानी ही बदल जाती है। साफ शब्दों में कहें तो आईएएस बनने के पीछे हर शख्स की अपनी कोई न कोई कहानी होती है, जब कोई लम्हा किसी के भीतर कुछ कर गुजरने की चिंगारी जला देता है। मुकेश जी भी गरीबों की मदद करना चाहते थे, समाज को समस्याओं के भंवरजाल और भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहते थे जो कि एक प्रोफेसर, आर्कीटेक्ट या वैज्ञानिक के तौर पर बेहद मुश्किल काम था। लिहाजा मुकेश जी ने समाज और सिस्टम की बुराइयों को मिटाने के लिए सिविल सर्विस में जाकर खुद को सक्षम बनाने का फैसला लिया।


आईआईटी से निकलकर सिविल सर्विस में जाने के सवाल पर मुकेश कहते हैं कि मुझे हमेशा से गांव की मिट्टी से खासा लगाव रहा है। मैं बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसते बाशिंदों की मदद करना चाहता था। पिछड़ेपन का दंश झेल रहे लोगों के जीवन में बदलाव लाना चाहता था। जो सिर्फ सिविल सर्विस में जाकर ही मुुमकिन था क्योंकि समाज सेवा और देश सेवा के लिए ये एक बेहतरीन सर्विस मानी जाती है। इसमें विविधता है, अलग-अलग कार्यों के लिए अवसर है। समाज को अलग तरह से देखने और समझने के साथ ही साथ उनके लिये कुछ करने का मौका मिलता है, जिससे मन को भी सुकून मिलता है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के बाद मुकेश जी को पहली पोस्टिंग काशीपुर में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के तौर पर मिली। साल 1998 में गोरखपुर में भीषण बाढ़ आई थी और जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित हुआ था। मुसीबत की इस घड़ी में मुकेश जी ने काशीपुर से अपना ट्रांस्फर गोरखपुर करवाया और बाढ़ राज के काम में जुट गये। इस दौरान उन्होंने अपनी कार्य-कुशलता का परिचय दिया और राहत पैकेज में गफलत करने वाले कई प्रधानों पर सख्त कार्रवाई कर चर्चा में आए। इसके बाद वो देवरिया में मुख्य विकास अधिकारी बने तो स्वयं सहायता समूह को अभियान और आंदोलन की तरह चलाकर महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के लिये कई प्रयोग किये। यहां से वे आजमगढ़ के जिलाधिकारी बने। यहां उनके द्वारा किए गए नवाचार ने जनता का दिल जीत लिया। उन्होंने पहली बार महिलाओं की जरूरतों पर ध्यान देने के लिए “सास-बहू सम्मेलन” की शुरुआत कराई।

संघर्ष का लंबा सफर तय कर सफलता हासिल करने वाले आईएएस मुकेश मेश्राम का मानना है कि सिविल सर्विस संभावनाओं से परिपूर्ण है। इस सेवा में आने के बाद भी कई लोग बहानेबाजी करते-रहते हैं कि हमें काम करने नहीं दिया जाता, हमारे मन का नहीं होता या इस विभाग में रहता तो मैं अच्छा कर लेता। जबकि मैंने देखा है कि कोई भी विभाग हो, कोई भी जगह हो, गांव हो या शहर हो, बड़ा जिला हो या छोटा, हर जगह आपकी जरूरत पड़ती है, हर जगह अवसर हैं। काम करने के लिए आपको अपनी नीयत भी साफ रखनी होती है।

हिंदी का बढ़ाया मान

IAS Mukesh Meshramमुकेश मेश्राम बेहद पिछड़े और आदिवासी जिले से अभावों के बीच हिंदी साहित्य की पढ़ाई कर सिविल सर्विस तक पहुंचे। जबकि एक आम धारणा है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने और हिंदी बोलने-लिखने वाले छात्र सिविल सर्विस में सफल नहीं हो पाते। लेकिन जिन सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई को लेकर अक्सर सवालिया निशान लगता रहा है, एक बड़ा वर्ग जिन सरकारी स्कूलों को हमेशा हेय दृष्टि से देखता है, मुकेश उसी हिंदी मीडियम के सरकारी स्कूल से निकलकर एक आई.ए.एस. अफसर बनते हैं और साबित करते हैं कि सरकारी स्कूल में पढ़कर भी जिंदगी में श्रेष्ठ मुकाम पाया जा सकता है। यही वजह है कि आज उनकी कामयाबी सरकारी स्कूलों को लेकर चली आ रही नकारात्मक सोच की परिपाटी को तोड़कर मुश्किलों से जूझते हर एक नौजवान को आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही है।

ज़िंदगी में कुछ भी बेहतर करने के लिए कभी भाषा रुकावट नहीं बनती, वो तो हमारे समाज ने खुद को भाषाओं की बेड़ियों में बांध रखा है। ये वहीं बेड़ियां हैं, जो कभी-कभी देश को दो हिस्सों में बांटती हैं, एक हिस्सा अंग्रेजी और दूसरा हिस्सा हिंदी। लेकिन मुकेश जी गर्व से कहते हैं कि उनकी पहली कक्षा से लेकर बारहवीं तक की पढ़ाई हिंदी मीडियम के सरकारी स्कूल से हुई है।

मां की स्मृति में खोला स्कूल

IAS Mukesh Meshramमुकेश जी अपनी मां के त्याग और तपस्या को स्मरण करते हुए बताते हैं कि मां निरक्षर थीं लेकिन पढ़ाई की अहमियत समझती थी। यही वजह थी कि दूसरों के खेतों में काम करके हमारी पुस्तकों और फीस का इंतजाम करती रहीं। मां ने मेहनत करके मुझे संवारा। आज जो भी बन पाया हूं, केवल मां की मेहनत के कारण ही बन सका हूं। लिहाजा मैंने उनकी स्मृति में उनके नाम पर ही अपने गांव में श्लक्ष्मीबाई विद्यालयश् की नींव रख वंचितों के जीवन में बदलाव की एक छोटी सी पहल की। इस स्कूल में गरीब, आदिवासी, दलित बच्चियों को निःशुल्क शिक्षा देने के साथ ही नवोदय स्कूल में चयन की तैयारी कराई जाती है। आज स्कूल में दो सौ से अधिक विद्यार्थी हैं, जहां शिक्षा की रोशनी से उनके जीवन में छाए गरीबी के अंधियारे को दूर किया जा रहा है।

अपने हाथों की लकीर बदलकर अपनी तकदीर खुद लिखने वाले मुकेश मेश्राम की आईएएस बनने की कहानी तो प्रेरणादायक है ही लेकिन एक अधिकारी के रूप में सेवा की कहानी और भी प्रेरणादायक और अनुकरणीय है।

सेवा का ऐसा जुनून

ना मशहूर होने की हसरत, ना ही किसी प्रकार का अपना स्वार्थ। स्वार्थ है तो सिर्फ समाज के लिए कुछ करने का, जुनून है तो सिर्फ वंचितों के जीवन स्तर में सुधार का, मकसद है तो सिर्फ तालीम के जरिए मासूमों का मुस्तकबिल बदलने का। कुछ इसी सोच के साथ आई.ए.एस. मुकेश मेश्राम बीते लंबे समय से बड़ी खामोशी के साथ बालाघाट जिले के दलित, पिछडे़ और आदिवासी समाज की बेहतरी के लिए पूरी शिद्दत से जुटे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने श्प्रबुद्ध तथागत फ़ाउंडेशनश् नाम से एक संस्था बनाई है। जिसके जरिए पिछड़ेपन का दंश झेल रहे आदिवासी खास तौर पर बैगा आदिवासियों के लोगों की जिंदगी में व्यापक बदलाव लाकर समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास जारी है। उनकी संस्था दूरस्थ वनग्राम के बाशिंदों की हर संभव मदद कर रही है। वनवासियों के खाने से लेकर कपड़े और शिक्षा से लेकर ईलाज तक का ख्याल रखा जा रहा है। कोरोना महामारी के दौरान भी मुकेश जी की संस्था इन ग्रामीणों के लिए वरदान साबित हुई। संस्था द्वारा राशन से लेकर एंबुलेंस तक का इंतजाम किया गया। इसके अलावा मुकेश जी ने निर्धन ग्रामीण युवचाओं के जीवन स्तर में सकारात्मक बदलाव कर उन्हें सशक्त बनाने के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग और सिलाई-कढ़ाई स्किल सेंटर भी खोले हैं। आगे एक बड़ा स्किल डेवलपमेण्ट सेण्टर खोलने की योजना है।

फर्ज की खातिर…. ‘The show must go on’

IAS Mukesh Meshram‘जरा सी देर को रुकता तो है सफर, लेकिन किसी के जाने से कब जिंदगी ठहरती है’ सुनने में फिल्मी लगने वाली ये लाइन इस निष्ठुर जीवन की एक कड़वी सच्चाई है, जिसका सामना कभी न कभी सबको करना पड़ता है। मुकेश जी ने भी इन लाइनों को न सिर्फ हकीकत में जीकर देखा बल्कि सबके सामने समर्पण और कर्तव्य की नई मिसाल पेश की। इसे लेकर मुकेश जी कहते हैं….

12 नवम्बर 2005 की सुबह मेरे लिये बहुत दुःखद थी, साथ ही स्तब्धकारी भी। माँ जो करीब 6 वर्षों से साथ ही रह रही थीं वो अपने रिश्तेदारों से मिलने गांव गई थी। थायराइड की दवा न मिलने से बहुत बीमार पड़ गई और कोमा में चली गई। बालाघाट में मां के निधन के समाचार ने मुझे झकझोर कर रख दिया। उस वक्त मैं यूपी के मऊ ज़िले में ज़िला मैजिस्ट्रेट के रूप में तैनात था और वहां भड़के साम्प्रदायिक दंगे को नियंत्रित करने के लिए सरकार की तरफ से रातोंरात स्टेट प्लेन से भेजा गया था। दंगाइयों द्वारा मऊ में सैकड़ों घर मकान जला दिये गए थे और हिंसा में क़रीब एक दर्जन लोगों की ज़ानें जा चुकी थीं। ऐसे में क़रीब 900 किलोमीटर दूर अपने घर मां के अंतिम दर्शन हेतु जाना सम्भव नहीं हुआ। कर्तव्य और भावनाओं के बीच द्वंद् में कर्तव्य की जीत तो हुई लेकिन एक टीस भी मन में जीवनपर्यंत घर कर गई। प्रशासनिक सेवा का यह एक दुःखद पहलू है।

पत्नि भी प्रशासनिक सेवा में

IAS Anita c meshramआईएएस मुकेश मेश्राम की पत्नि अनीता सी मेश्राम भी 1996 बैच की आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश शासन में बतौर प्रमुख सचिव पदस्थ हैं। अनीता सी मेश्राम एक तेज तर्रार आई.ए.एस. अधिकारी हैं। इससे पहले वो मेरठ की कमिश्नर समेत रामपुर, गाजीपुर, पीलीभीत, मैनपुरी, मथुरा, रायबरेली और उन्नाव में डीएम जैेस अहम पद की जिम्मेदारी संभाल चुकी है। उन्हें शासन में विभिन्न पदों, सचिव संस्कृति, सचिव, महिला व बाल कल्याण आदि पर कार्य का लंबा अनुभव भी रहा है।

मुकेश मेश्राम का मानना है कि ऊंचे ओहदे पर आने के बाद स्वयं का अनुशासन बनाए रखना एक चौलेंजिंग टास्क होता है। फिर दूसरी चुनौती परिवार और काम के बीच समन्वय बनाने की होती है। बड़ी जिम्मेदारी और दिन भर की व्यस्तता के बीच परिवार के साथ तालमेल बनाने के सवाल के जवाब में मुकेश जी कहते हैं कि हम घर में सामान्य तौर पर ऑफिस का काम नहीं ले जाते। एक दूसरे के काम का सम्मान करते है। इस तरह से जब समझदारी से काम होता है तो कोई दिक्कत नहीं आती है।

मध्यप्रदेश के नक्सल प्रभावित आदिवासी जिले बालाघाट के लालबर्रा के बोहरी गांव में जन्में मुकेश के सपने भी कुछ ऐसे थे कि नन्ही उम्र में ही नींद ने उनका साथ छोड़ दिया था।  

मजबूत इरादों वाले अफसर, जिनके लिए कुछ भी नहीं है नामुमकिन

IAS Mukesh Meshramकुछ लोग सिस्टम और समाज की समस्याओं से विचलित हो जाते हैं और कुछ समाज को बदलने के लिए जी-जान से लग जाते हैं। मुकेश इन्हीं लोगों में से हैं जो अपने सुखों को त्याग कर गांव, गरीब और असहाय लोगों के बेहतरी के लिए पूरी शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। रचनात्मक कार्यों के जरिए वो ग्रामीणों को जीने की नई राह सिखा रहे हैं।

नए भारत के निर्माण में अगर किसी चीज की सबसे बड़ी जरूरत है तो वह नवाचार या इनोवेशन। इसीलिए कहा भी जाता है कि अगर कोई IAS इनोवेशन नहीं करता, कुछ नया नहीं करता, लीक पर चल रहे सिस्टम को बदलने की कोशिश नहीं करता तो उसमें और किसी क्लर्क में कोई फर्क नहीं है। मगर मुकेश मेश्राम देश के उन चुनिंदा आईएएस अफसरों में से हैं, जो अपने इनोवेशन के लिए ही जाने जाते हैं।


“आम आदमी की सुविधाओं में इजाफा हो, उन्हें कुछ नया देखने, सीखने और करने को मिले” आई.ए.एस. मुकेश मेश्राम की इनोवेशन के जरिए हमेशा यही कोशिश रही है। स्मार्ट वर्क ही उनकी पहचान है। सरकारी कामकाज में तकनीक का इस्तेमाल करने में वो माहिर हैं। सोसायटी में उनकी इमेज सख्त नहीं, बल्कि सौम्य है। उनके छोटे-छोटे काम लोगों के दिलों में उतर जाते हैं। वो अधिकारियों-कर्मचारियों के टीम वर्क से ही बेहतर लक्ष्य हासिल करने में विश्वास रखते हैं। मुकेश जी ने अपनी संवेदनशीलता और कार्यशैली से ब्यूरोक्रेसी को लेकर आम आदमी की सोच बदली और प्रशासन के प्रति जनता में विश्वास भी पैदा किया।

अलहदा अंदाज, सादगी-संजीदगी की मिसालIAS Mukesh Meshram

कहते हैं जब कोई आदमी तरक्की की राह पकड़ता है, तो अपनी जमीन और जड़ को भूल जाता है लेकिन आईएएस मुकेश मेश्राम ने इससे इतर संवेदनशीलता और कर्तव्यभाव की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसे न सिर्फ लंबे समय तक याद रखा जाएगा बल्कि देश के दूसरे अफसर और बड़े व्यक्तियों को भी इससी प्रेरणा मिलेगी। उनके व्यक्तित्व ने साबित किया है कि कोई इंसान बड़ा या छोटा नहीं होता उसके कर्म उसका कद ऊंचा करते हैं।

आज भी उनके जीवन में बेहद सरलता और सहजता है। वो घूमने-फिरने, स्केचिंग करने, संगीमत सुनने, कविताएं लिखने औऱ किताबें पढ़ने का शौक रखते हैं। प्राकृतिक संगीत जैसे-चिड़ियों के कलरव, बारिश, पेड़ों, समुद्र और नदियों की कलकल ध्वनि को सबसे अच्छा संगीत मानते हैं। मुकेश मेश्राम का व्यक्तित्व इंजीनियरिग और कला-साहित्य का अद्भुत संगम है।

 

नवाचार से बदलाव की बयार

IAS Mukesh Meshram

वो लौ बार बार जलती थी और हर बार हवा का झोंका उसे बुझा देता था। बावजूद उस लौ ने जलना नहीं छोड़ा और आज ये एक बड़े बदलाव की लौ बन चुकी है। आलम यह है कि जिनके पास स्कूल की फीस और फार्म भरने तक के पैसे नहीं थे, आज उस घर के बेटे-बेटियां आईआईटी, जेईई और एआईपीएमटी जैसी प्रतियोगिताओं में कामयाबी की नई-नई कहानियां लिख रहे हैं। और ये सब मुमकिन हुआ है आईएएस मुकेश मेश्राम की नई सोंच, बुलंद हौसलों और मजबूत इरादों के दम पर। जिन्होंने सामाजिक बदलाव को ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया है। दरअसल कानपुर में पदस्थ रहते हुए मुकेश जी ने सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को सुधारने के मकसद से विद्यांजलि योजना के नाम से एक अभिनव पहल की थी। मुकेश जी ने सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी को देखते हुए सरकारी कर्मचारियों, रिटायर अधिकारियों, कॉलेज स्टूडेंट्स और यहां तक की गृहणियों को भी प्रेरित किया था कि वो समय निकालकर स्कूलों में जाकर गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों को पढ़ाएं। मुकेश खुद भी कई स्कूलों में जाकर बच्चों को पढ़ाते थे। उनके इस प्रयास में कानपुर शहर के 100 से ज्यादा लोग जुड़े थे जो आज भी काम कर रहे हैं। इसके साथ उन्होंने आरोग्यदान (बच्चों को निजी अस्पतालों द्वारा निशुल्क इलाज) और वस्तुदान (गरीब बच्चों को स्कूल की पूरी किट) योजना भी शुरू की। तीनों योजनाओं को उन्होंने एकलव्य नाम दिया। इस योजना से 25 हजार बच्चों के स्वास्थ्य कार्ड और करीब इतने ही बच्चों को स्कूल की किट दी गई।

उप्र टूरिज्म को नए आयामIAS Mukesh Meshram

मुकेश जी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश का संस्कृति विभाग लीक से हटकर अपने बेहतर काम के लिए सुर्खियां बटोर रहा है। उनके कुशल नेतृत्व में अयोध्या में दीपोत्सव के दौरान सरयू नदी के तट पर 9,41,551 दीप प्रज्ज्वलित कर विश्व रिकार्ड बनाया गया। वहीं अयोध्या और बनारस को विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित किया जा रहा है। एक अंतर्राष्ट्रीय कंसल्टेंसी के जरिए यहां वैदिक आर्किटेक्चर पर काम हो रहा है। बुंदेलखंड की विरासतों को सहेजने के लिए बुंदेलखंड सर्किट बनाया गया है। इसके अलावा चित्रकूट से लेकर बांदा, महोबा, हमीरपुर, जालौन, उरई, ललितपुर और झांसी समेत कई जिलों काफी काम किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं संस्कृति विभाग प्रदेश में बौद्ध परिपथ को विकसित करने के लिए एक मास्टर प्लान बना कर उसे साकार करने में जुटा हुआ है। इस परिपथ के विकास से जहां विभिन्न देशों से आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, वहीं सरकार को अच्छा खासा राजस्व भी प्राप्त होगा।

बालाघाट के युवाओं के रोल मॉडल

IAS Mukesh Meshramबालाघाट से ताल्लुक रखने वाले देश के सीनियर जर्नलिस्ट और स्वदेश न्यूज चैनल के मैनेजिंग डायरेक्टर रवि प्रकाश श्रीवास्तव बताते हैं कि मुकेश मेश्राम की गिनती उत्तर प्रदेश कैडर के सबसे तेज-तर्रार आईएएस अफसरों में होती है। देश के सबसे बड़े राज्य के प्रशासनिक महकमें में अपना एक खास मुकाम और पहचान बनाने के बावजूद मुकेश जी अपने गांव, अपनी मिट्टी को भूले नहीं हैं। वो आज भी हर मुश्किल वक्त में बालाघाट के बाशिंदों की मदद के लिए सबसे आगे खड़े नजर आते हैं और सामाजिक दायित्व भी बखूबी निभाते हैं। शायद यही वजह है कि मुकेश जी आज बालाघाट के हर उस युवा के रोल माडल बन गए हैं, जो अपनी अपनी मेहनत और काबिलियत के बूते जिंदगी में कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं।

मुश्किलें हमेशा सवाल करती हैं और धैर्य हमेशा जवाब देता है। सफलता वक्त और बलिदान मांगती है,  वो कभी भी प्लेट में परोसी हुई नहीं मिलती है। किसी काम को शुरू करना आसान है लेकिन उसमें निरंतरता बनाये रखना मुश्किल है। हर कोशिश में शायद सफलता नहीं मिल पाती लेकिन हर सफलता का कारण एक कोशिश ही होती है। अगर आप रिस्क नहीं लेते हो तो आप हमेशा उन लोगों के लिए काम करोगे जो रिस्क लेते हैं।


कुछ भी नहीं असंभव…

IAS Mukesh Meshram with PM Modiबिना किसी शान-ओ-शौकत में पले, एक गरीब परिवार से अपनी जीवन यात्रा शुरू कर आईएएस बन चुके मुकेश की कामयाबी की मिसाल सिर्फ उनके जीवन का उजाला नहीं, बल्कि उनके हिस्से के जीवन का सबक पूरी युवा पीढ़ी की भी राह को रोशन कर रहा है। इसीलिए वह आज के नौजवानों को ये सीख देना भी अपनी जिम्मेदारी मान रहे हैं कि ‘वे हिम्मत न हारें क्योंकि उनकी मंज़िल उनका इंतज़ार कर रही है।

मुकेश जी आज के दौर के युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं कि इस दुनिया में असंभव जैसी कोई चीज नहीं है। अगर आप पूरी इमानदारी, मेहनत और लगन के साथ लगातार प्रयास करते रहते हैं  तो एक ना एक दिन आपकी मुट्ठी में हर मुकाम होता है। मुकेश जी नई जनरेशन से कहते हैं कि वो सिर्फ दो चीजें ध्यान में रखें। पहला, इस जहां में कुछ भी नामुमकिन नहीं है और दूसरा, सबके साथ, सबके प्रति सम्मान होना चाहिए।

देश की सर्वश्रेष्ठ सेवा ‘आईएएस’ में शामिल होकर उन्होंने ऐसे लाखों युवकों को प्रेरित किया जो संघर्ष के बूते कुछ कर गुजरने का सपना देखते हैं। परिस्थितियों ने जहां उन्हें जीवन के लिए लड़ना सिखाया, वहीं गरीबी और सुविधाओं के अभाव ने एक सपने को जन्म दिया। कठिन परिश्रम और सच्ची लगन ने उस सपने को हक़ीकत का नाम दिया, जो आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है। आज दुनिया उसे आईएएस मुकेश मेश्राम के नाम से जानती है। हजारों हाथ उसकी दुआ में उठते हैं, उसे सलाम करते हैं।

बुके नहीं उपहार में बुक दीजिए…

आईएएस मुकेश मेश्राम किताबों को अपनी कामयाबी का मददगार मानते हैं। वो कहते हैं कि किताबों के पढ़ने से जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आता है। इससे न केवल अच्छी सोच का विकास होता है बल्कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों का मुकाबला कैसे किया जाए, इसकी क्षमता का भी विकास होता है। उनकी अब तक की जर्नी और कैरियर को देखें तो जीवन में किताबों के असली महत्व का पता चलता है। उनका मानना है कि लोगों को उपहार में ’बुके’ की जगह ’बुक’ देनी चाहिये। इससे लोग पढेे़ंगे और समझदार बनेंगे।

बेजुबानों से बेइंतहा मोहब्बत…

अपनी दरियादिली और इंसानियत के लिए पहचाने जाने वाले आईएएस मुकेश मेश्राम बेजुबानों से भी बेइंतहा मोहब्बत करते हैं। जिसकी बानगी लॉकडाउन के दौरान भी देखने को मिली। जब सारी होटल, दुकानें बंद हो गईं और इंसान अपने-अपने घरों में कैद हो गए, तब स्ट्रीट डॉग समेत तमाम जानवरों के लिए खाने का संकट खड़ा हो गया। ऐसे में मुकेश जी ने शहर के जानवरों के भोजन की व्यवस्था का बीड़ा उठाया और हर रोज घर से दफ्तर जाते वक्त शहर के आधा दर्ज पाइंट पर रुक कर स्ट्रीट डॉग के लिए खाने के पैकेट रखते। इतना ही नहीं उन्होंने इन आवारा पशुओं की मदद के लिए स्थानीय प्रशासन की मदद से ‘पशु मित्र’ नाम से एक विंग का गठन कराया। साथ ही जानवरों के लिए काम करने वाले लोगों और संस्थाओं से संपर्क कर समुचित व्यवस्था कराई।


मुकेश जी की कहानी आज हिंदुस्तान के लाखों लोगों की जिंदगी को एक नई दिशा दे रही है। आप इसे एक साधारण बच्चे की असाधारण सफलता की दास्तां मान सकते हैं मगर मेरे लिए मुकेश मेश्राम के असल जिंदगी की कहानी का एक-एक पन्ना उस लाइफ चेंजिंग किताब की तरह है, जिसे पढ़कर विपरीत परिस्थितियों में मेरे अंदर भी एक विश्वास सा जागता है और मुश्किल समय में खुद पर यकीन करने का साहस मिलता है।


पॉजिटिव इंडिया के इतने सालों के सफर में मैने संघर्ष और सफलता की ना जाने कितनी कहानियां लिखीं, लेकिन शायद कामयाबी की हर कहानी अमिट और अमर नहीं होती। कई कहानियों की प्रासंगिकता और सार्थकता समय के साथ खत्म हो जाती है। ऐसी कहानियां कम ही होती हैं जिनकी उम्र बेहद लंबी होती हैं। आईएएस मुकेश मेश्राम की कहानी भी ऐसी ही एक कहानी है जो लंबे समय तक बुरे वक्त में हर नौजवान को आगे बढ़ने का हौसला देती रहेगी। संघर्षों से भरी ये जीवन-गाथा हर उस युवा को प्रेरित करेगी, जो अपनी मेहनत और हुनर के दम पर जिंदगी में कुछ करना और पाना चाहता है। इसलिए ये जरूरी है कि उनके जीवन-संघर्ष की कहानी आज देश के कोने-कोने तक फैलाई जानी चाहिए, हर एक बच्चे को पढ़ाना चाहिए, हर नौजवान को समझाना चाहिए, ताकि मुसीबतों से डरकर कभी कोई जिंदगी का साथ न छोड़े, बल्कि चुनौतियों से लड़ना सीखे और समय के आगे घुटने टेकने की बजाए डटना सीखे। वाकई जिस दिन देश के सभी अधिकारी उनके जैसे हो जाएंगे,उस दिन देश की तस्वीर ही कुछ और होगी।

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