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एक वक्त था जब बच्चों के पढ़ने-लिखने से लेकर शादी तक की उम्र तय होती थी। मगर अब जमाना बहुत आगे निकल चुका है। वक्त के साथ-साथ ना सिर्फ पीढ़ी बदली है, बल्कि सोचने और समझने के नजरिए में भी काफी बदलाव हुआ है। अब ना तो शादी करने की कोई उम्र है और ना पढ़ने लिखने की। जिंदगी अब उम्र की बजाए कुछ सीखने के जज्बे के हिसाब से चलने लगी है क्योंकि उम्र को मात देते हमारे देश में ऐसे कई लोग हैं, जिनका जज्बा उनकी उम्र को मात दे रहा है। हमारी आज की कहानी भी उम्र की तमाम सरहदों से परे हसीन हसरतों के हकीकत में तब्दील होने की एक ऐसी सुखद दास्तां है, जो यकीनन आपके चेहरे पर एक लंबी मुस्कान छोड़ जाएगी।

जिंदगी की सांझ रोशन करती ‘आजीबायची शाला’ Aajibaichi Shala Maharashtra

कहते हैं मजबूत इरादों पर उम्र की दीमक नहीं लगती और ना ही सपने, हसरतें और ख्वाहिशें उम्र की मोहताज होती हैं। अगर ठान लें तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है, फिर उम्र तो महज एक आंकड़ा भर है और इस बात को सच साबित करके दिखाया है महाराष्ट्र के ठाणे जिले के फंगाने गांव की आजीबायची स्कूल में पढ़ने वाली 60 से 95 वर्ष की बुजुर्ग महिलाओं ने। जिंदगी के जिस पड़ाव में आकर अक्सर लोग जीने की उम्मीद छोड़ देते हैं, उम्र के उस नाजुक दौर में ये बुजुर्ग महिलाएं अपने अधूरे अरमानों को पूरा कर रही हैं।

60 साल से अधिक उम्र वालों को ही मिलता है एडमिशनAajibaichi Shala Maharashtra

आजीबायची शाला देश का ऐसा पहला स्कूल है जो कि खास तौर पर दादी और नानी की उम्र की महिलाओं के लिए खोला गया है। यहां 60 से 95 साल की बुजुर्ग महिलाओं को प्राथमिक शिक्षा देकर उनके पढ़ने-लिखने के सपने को पूरा किया जा रहा है। इस स्कूल की शुरूआत साल 2016 में महिला दिवस के मौके पर गांव के ही एक शिक्षक योगेंद्र बांगरे ने की थी। जहां एक तरफ इन बुजुर्ग महिलाओं को पढ़ाने का जिम्मा योगेंद्र बांगरे ने उठाया तो वहीं दूसरी तरफ इस अच्छी पहल के लिए मोतीराम चैरिटेबल ट्रस्ट ने उनकी पूरी मदद की। इस शाला में मौजूद ब्लैकबोर्ड, चॉक, डस्टर और बैठने की व्यवस्था से लेकर दादी-नानियों को गुलाबी साड़ी, बस्ता, स्लेट और चॉक तक की सारी व्यवस्था ट्रस्ट की करफ से की जा रही है।

आजीबायची शाला देश का पहला स्कूल है जो बुज़ुर्ग महिलाओं को शिक्षित कर उनके अधूरे अरमानों को आकार दे रहा है। चमकीली गुलाबी साड़ी की ड्रेस पहन कर स्कूल आने वाली ये छात्राएं यहां किताबें पढ़ने से लेकर हस्ताक्षर करना तक सीख रही हैं। स्कूल में पढ़ाई के अलावा वो अपने घरों में अपने पोते-पोतियों के साथ भी पढ़ाई करती हैं। इस दौरान वे एक दूसरे के पाठ को पढ़ते हैं और एक दूसरे को कविताएं सुनाते हैं। उम्र के इस पड़ाव में शिक्षा को लेकर उनका उत्साह वाकई में देखने लायक है।

Aajibaichi Shala Maharashtraये स्कूल बाकी स्कूलों से बहुत अलग है। यहां रोज क्लास नहीं लगती बल्कि महिलाओं के रोज-मर्रा के कामों और उनकी निजी जिंदगी को ध्यान में रखकर यहां वीकेंड और छुट्टी वाले दिन ही महिलाओं को पढ़ाया जाता है। शुरूआत में दादी और नानी की उम्र की इन औरतों को सिर्फ पढ़ना-लिखना और कविता सुनाना सिखाया जाता है। स्कूल में ज्यादातर ऐसी महिलाएं हैं जो कभी स्कूल ही नहीं गईं, कुछ ऐसी भी हैं जो केवल पहली या दूसरी कक्षा तक की पढ़ाई कर पाई हैं। 

उम्र के जिस पड़ाव में अक्सर लोग जिंदगी से हार मान जाते हैं। अपनी बची हुई जिंदगी को बिस्तर पर बच्चों के सहारे बिताने पर मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में ये महिलाएं अपने पूरे जज्बे के साथ स्लेट पर बार-बार चॉक से लिखने की कोशिश करती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने के लिए तैयार रहती हैं। स्कूल में इन महिलाओं को गणित के साथ ही वर्णमाला, कविता और कला आदि का भी ज्ञान दिया जाता है।Aajibaichi Shala Maharashtraआम तौर पर घर के बड़े, बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते हैं, लेकिन यहां नजारा जरा उल्टा है। कभी बेटा, कभी बहू, तो कभी पोता-पोती इन्हें स्कूल तक ले कर आते हैं। स्कूल शुरु भी दोपहर में होता है दो बजे से चार बजे के बीच, ताकि महिलाएं अपनी दिनचर्या के अनुसार सुबह घर की जिम्मेदारियां पूरी कर सकें और दोपहर के खाली वक्त में पढ़ाई कर सकें। 

कुछ महिलाएं अब अपनी कमजोर नज़रों के साथ साफ देखने में असमर्थ हैं, जबकि कुछ को सुनने में समस्या होती है, लेकिन इन समस्याओं के बावजूद उन्होने अपने हौसलों को कमजोर होने नहीं दिया है। इस पहल का ही नतीजा है कि आज ये दादियाँ किताबें पढ़ने के साथ ही अपने दस्तखत करना सीख गई हैं। आजीबायची शाला ने वाकई में उन्हे गर्व से चल सकने का मौका दिया है।

आज दादी-नानियां करने लगी हैं सिग्नेचरAajibaichi Shala Maharashtra

इस स्कूल का आइडिया टीचर योगेंद्र बांगड़ को आया, उन्होने मोतीराम चैरिटेबल ट्रस्ट के साथ मिलकर इस स्कूल की नींव रखी। पहले तो दादी-नानियां स्कूल आने में संकोच करती थी। फिर उन्हे जागरुक किया गया और शिक्षा का महत्व बताया गया। स्कूल में दादी-नानियों को पहले ब्लैकबोर्ड पर लिखे शब्द समझ में नहीं आते थे, फिर समय के साथ-साथ उन्होने हिंदी और मराठी वर्णमाला सिखाई गई। आज वो फर्राटे से अपने पोते-पोतियों की किताबें पढ़ लेती हैं और हस्ताक्षर भी कर लेती हैं।

आसान नहीं था घर की दहलीज लांघकर स्कूल जाने का सफरAajibaichi Shala Maharashtra

आज पूरा फंगाने गांव दादी- नानियों की धीमी आवाज में कविताएं गाने की आवाज सुनने का आदि हो चुका है। हालांकि इन बुजुर्ग महिलाओं के लिए घर से शाला तक का सफर तय करना बेहद चुनौतीपूर्ण काम था। एक तो समाज के ताने और दूसरा बढ़ती उम्र के ख्याल ने दादी-नानियों के पैरों में बेड़ियां डालकर रखी हुई थी। मगर जैसे-जैसे एक दो बुजुर्ग महिलाओं ने हिम्मत करके समाज के तानों से परे स्कूल जाना शुरू किया, उन्हें देखकर बाकी की महिलाओं को भी पढ़ने के लिए हौसला मिला। फिर क्या था, धीरे-धीरे गांव की लगभग सभी बुजुर्ग महिलाओं ने आजीबायची शाला में जाना शुरू कर दिया।

हौसले को पंख लगे तो दूर हुई झिझक: कुछ सालों पहले जब इस स्कूल की शुरुआत की गई तो बुजुर्ग महिलाओं के लिए घर से स्कूल तक का सफर काफी झिझक भरा था। मगर जब महिलाओं ने अपनी उम्र से ज्यादा उम्र की औरतों को इस स्कूल में देखा तो हर किसी के हौसलों को पंख लग गए।

स्कूल की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां महिलाएं बच्चों की तरह ही अपना होमवर्क करती हैं और होमवर्क पूरा ना होने की दशा में वो बड़ी मासूमियत के साथ एक-दूसरे की शिकायत भी करती हैं। स्कूल में ये दादियां पढ़ाई के साथ मनोरंजन के लिए कई तरह के खेलों में भी हिस्सा लेती हैं। Aajibaichi Shala Maharashtra

खास बात ये है कि इस स्कूल में इन बुजुर्ग महिलाओं को सिर्फ पढ़ाया नहीं जा रहा बल्कि, उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश भी की जा रही है। योगेंद्र बांगरे इन महिलाओं को रोजगार देने के लिए आजीबायची शाला में फूड और ब्यूटी प्रोडक्ट बनाने का प्रयास कर रहे हैं, जिन्हें बेचकर इन महिलाओं की आमदनी हो सके।

Yogendra Bangareआजीबायची शाला को शुरू करने के पीछे 45 साल के योगेंद्र बांगरे का बस एक ही मकसद है, ऐसी महिलाओं को शिक्षित करना जिन्हें समाज की कुछ रूढ़िवादी सोच के चलते ना कभी स्कूल की शक्ल देखने का मौका मिला और ना कभी किताबें पढ़ने का। योगेंद्र कहते हैं कि गांव की बुजुर्ग महिलाएं अपने बच्चों और पोते की तरह पेंसिल उठाने और अपने नाम का दस्तखत करने में सक्षम होना चाहती थीं।

आजीबायची शाला दुनिया का एकमात्र ऐसा स्कूल है, जिसका नाम अपने छात्रों के नाम पर पड़ा है। 

पॉजिटिव इंडिया से बातचीत के दौरान योगेंद्र बताते हैं कि आजीबायची शाला खोलने का ख्याल मेरे जेहन में सबसे पहले फरवरी 2016 में आया, जब हम शिवाजी जयंती की तैयारियों में जुटे थे। योगेंद्र आगे कहते हैं कि इस दौरान गांव की कुछ महिलाएं पाठ पढ़ रही थीं, तभी मैंने कुछ बुजुर्ग महिलाओं को कहते सुना कि काश वो भी पाठ पढ़ पातीं। ये वही वक्त था जब मैनें इन बुजुर्ग महिलाओं को साक्षर करने के लिए स्कूल खोलने का निश्चय किया।Aajibaichi Shala Maharashtraयोगेंद्र ने सबसे पहले फंगाने गांव के लोगों को इस नेक पहल का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित किया। शुरूआत में उन्होंने गांव के ही एक घर में दो कमरे वाले स्कूल की स्थापना की, जो दिन में केवल दो घंटे दोपहर 2 से 4 बजे तक खुला रहता था। योगेंद्र के प्रयासों ने उन दबी हुई इच्छाओं को फिर से जीवित कर दिया, जिसे गांव की अज्जियों (दादियों) ने असंभव मान लिया था।

देश की पहली दादी-नानियों की पाठशाला ना सिर्फ बुजुर्ग महिलाओं के पढ़ने की इच्छा को पूरा कर रही हैं, बल्कि तमाम रूढ़िवादी सोच को परे रखकर इस बात का संदेश भी दे रही है कि, अगर मन में कुछ कर गुजरने की चाह हो, तो उम्र के किसी भी पड़ाव में सफलता पाना नामुमकिन नहीं है।

आजीबायची शाला में पढ़ने वाली गांव की बुजुर्ग महिलाएं आज वो जीवन जी रही हैं, जिसकी उम्मीद भी उन्होंने शायद ही कभी की हो। चमकीली गुलाबी रंग की साड़ी में कुछ दातों व कुछ बिना दांतों की मुस्कान लिए ये महिलाएं सुंदरता की एक अलग ही प्रतिमूर्ति स्थापित करती हैं।Aajibaichi Shala Maharashtraमहाराष्ट्र के इस गांव ने पानी के संकट, स्वच्छता और स्वास्थ्य-सुविधाओं के अभाव जैसी बुनियादी समस्याओं को नजदीक से देखा है, ऐसे में शिक्षित हो रही ये महिलाएं अब इस दिशा में जागरूकता फैलाने का काम कर रही हैं। ये इनकी पहल का ही नतीजा है कि गांव आज ‘खुले में शौच’ से मुक्त हो चुका है।

अपने शिक्षण कार्य के लिए अवार्ड जीत चुके योगेन्द्र की इस पहल की बदौलत साक्षरता की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही ये बुजुर्ग महिलाएं आज खुद पर प्राउड महसूस करती हैं। वहीं नेक मकसद के साथ शुरू हुए इस स्कूल ने अब तक कई देश के संगठनों का भी का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। अब तक करीब 15 देशों से आए हुए लोग इस स्कूल का दौरा कर चुके हैं।

आजीबायची शाला ने समाज के बने-बनाए पूर्व निर्धारित कई ढांचों को तोड़ा है और ना केवल फंगाने बल्कि पूरे भारत में एक मिसाल कायम की है। इस पहल ने देशभर के कई अन्य समुदायों में कुछ करने की ललक पैदा की है और एक ऐसी पीढ़ी को तैयार किया है, जिन्हें पहले पढ़ाई से लेकर स्वच्छता और अपने बुनियादी अधिकारों तक की समझ नहीं थी। लेकिन आज वही महिलाएं फोन का जवाब देती हैं, गांव की बैठकों में बोलती हैं, उन कागजातों को समझती हैं जिन पर वो हस्ताक्षर करती हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात इंकपैड को दूर करके वो कलम उठाकर अपना हस्ताक्षर करती हैं। यह एक तरह का सम्मान और प्रतिष्ठा है जो उम्र, लिंग और स्थिति से ऊपर उठकर उन्हें समान बनाता है। 

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1 Comments

  1. Mayank April 4, 2021

    Amazing

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