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नालंदा और तक्षशिला की अनमोल विरासत को समेटने वाले भारत में ही शिक्षा व्यवस्था, सुव्यवस्थित दुर्व्यवस्था का केंद्र बन चुकी है। मैकाले के जमाने से चली आ रही रटंत शिक्षा प्रणाली ने पढ़ाई को सिर्फ और सिर्फ सर्टिफिकेशन की खोखली सतह पर ला खड़ा किया है। हालांकि सुकून की बात यह है कि युवाओं के देश कहे जाने वाले इस मुल्क के युवाओं ने ही अब आउट डेटेड हो चुके इस एजुकेशन सिस्टम को समय की जरूरत के हिसाब से संवारने का बीड़ा उठा लिया है और आज पॉजिटिव इंडिया (www.pozitiveindia.com) आपको एक ऐसे ही युवा उद्यमी से मिलाने जा रहा है, जिसने देश के सर्वोच्च शैक्षणिक संस्थान से तालीम लेने के बावजूद लाखों के पैकेज वाली बड़ी से बड़ी नौकरी के प्रस्ताव को ठुकरा कर नई सोंच के साथ शिक्षा के जरिए समाज को कुछ देने का फैसला लिया।

भारत युवाओं का देश है। भारत की युवाशक्ति सिर्फ दफ्तर जाकर पैसे कमाने में ही नहीं खपनी चाहिए…देश के युवाओं में असीम संभावनाएं हैं, अगर उन्हें सही दिशा निर्देश मिले तो वो क्या कुछ नहीं कर सकते हैं…उनके टैलेंट और मेहनत का सही इस्तेमाल हो तो ये देश नए-नए इनोवेशन, अविष्कार और सामाजिक बदलाव का साक्षी बन सकता है, तो युवाओं के लिए भी करियर का मतलब सिर्फ रोजगार पाकर घर चलाना भर नहीं रह जाएगा…

जी हां ऐसी ही सोच है शिक्षा के क्षेत्र में एक इनोवेटिव पहल करने वाले आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र दिवांशु कुमार की। दिवांशु का मानना है कि अब वक्त आ गया है जब हमें अपनी शिक्षा पद्धति के बारे में पुनर्विचार कर उसे नए सिरे तराशना होगा। ताकि पढ़ने-पढ़ाने के तरीके में बदलाव कर बच्चों में भी पढ़ने की ललक पैदा की जा सके।

आईआईटी मद्रास से पढ़ाई पूरी करने वाले दिवांशु कुमार अपने स्टार्टअप के माध्यम से छात्रों की सीखने की क्षमता में सुधार और ज्ञान प्राप्त करने के तरीके में आमूलचूल परिवर्तन लाने के मिशन में जमीनी स्तर पर जुटे हुए हैं।

पाजिटिव इंडिया से बात करते हुए दिवांशु कहते हैं कि देश में ऐसे बहुत से बच्चे हैं जिनमें काबिलियत तो कमाल की है मगर जागरुकता का अभाव है। स्टूडेंट्स की इसी समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने इनवॉल्व लर्निंग साल्यूशन संस्था की स्थापना की जहां बड़े क्लास के छात्र छोटी कक्षा के बच्चों को पढ़ाने के साथ ही जीवन कौशल के गुर सिखाते हैं। इसके लिए इनवॉल्व वाकायदा उन्हेंं प्रशिक्षण भी देती है।इनवॉल्व भारत में ऐसी पहली संस्था/संगठन है जो स्टूडेंट्स के सीखने की क्षमता को मजबूत बनाने के साथ ही बौद्धिक कला के विकास पर भी जोर देती है। दिवांशु और उनकी टीम PEER TEACHING का इस्तेमाल करते हुए छात्रों को 21वीं सदी का कौशल प्रदान करती है। इसके लिए संस्था सीनियर स्कूली छात्रों को एक शिक्षक के तौर पर उनके जूनियर छात्रों को पढ़ाने के लिए 12-16 साल की उम्र में विशेष रूप से प्रशिक्षित करती है।

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PEER TEACHING प्रणाली (सहकर्मी शिक्षण पद्धति) में नौ महीने की फेलोशिप शामिल है जहां कक्षा 8वीं से उच्च ग्रेड के छात्र अपने से छोटी कक्षा के छात्रों को पढ़ा सकते है और सलाह दे सकते हैं। एक कक्षा में एक साथ सीखने वाले छात्रों और शिक्षार्थियों को शामिल करके स्कूल में एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण किया जाता है, जहां एक स्टूडेंट्स की क्षमता को न सिर्फ परीक्षा के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है बल्कि उनके समग्र शैक्षणिक और व्यक्तिगत उत्कृष्टता को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया जाता है।दिवांशु बताते हैं कि छात्रों को इन्वॉल्व के निर्धारित पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण मॉड्यूल से आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। साथ ही युवा छात्रों को गणित की समस्याओं को बेहतर ढंग से समझाने के लिए खुद के बनाए फार्मूलों का सहारा लिया जाता है। इतना ही नहीं हर चैप्टर की शुरूआत में छात्रों को प्रेरित करने के लिए यह भी बताया जाता है कि वो इस सब्जेक्ट को क्यों सीख रहे हैं और यह सब्जेक्ट इतना महत्वपूर्ण क्यों है।

इन्वॉल्व के जरिए दिवांशु न सिर्फ बेहद सस्ती कीमत में एक हाई क्वालिटी एजुकेशन सिस्टम तैयार कर रहें हैं, बल्कि स्टूडेंंट्स को  21वीं सदी की जरूरत के हिसाब से स्किल सिखाने के साथ ही लीडरशिप का एक्सपोजर और एक्सपीरियंस भी दे रहे हैं। ताकि छात्रों में शैक्षणिक चुनौतियों के अलावा जिंदगी में आने वाली मुसीबतों से लड़ने की क्षमता भी विकसित की जा सके। 

बिहार के गया के चांदचौरा से ताल्लुक रखने वाले दिवांशु कुमार को शिक्षा का महत्व अच्छे से पता था लिहाजा उन्होंने आईआईटी मद्रास से पढ़ाई करने के बाद अवंती समूह के एक फेलोशिप कार्यक्रम में शामिल होने का निर्णय लिया। जहां आईआईटी और एनआईआईटी के स्टूडेंट्स कम आय वाले परिवारों के मेधावी छात्रों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़कर हाई क्वालिटी एजुकेशन देते हैं। वहीं एजुकेशन सेक्टर में जमीनी स्तर पर पूरे डेडिकेशन के साथ काम करने के दिवांशु के जुनून ने उन्हें फेलोशिप के दूसरे साल में ही प्रमोशन दिला दिया और उन्हें मेंटर मैनेजर की अहम जिम्मेदारी दी गई। इस दौरान दिवांशु को 25 कॉलेज के छात्रों की एक टीम की बागडोर सौंपी गई, जिसके बाद दिवांशु ने मौजूदा शिक्षा प्रणाली की बारीकियों और कमियों को समझने के बाद छात्रों की चुनौतियों को कम करने और पाठ्यक्रम की बेहतर समझ विकसित करने के लिए 12वीं कक्षा के छात्रों को 11वीं के स्टूडेंट्स की मदद करने का सुझाव दिया।

इसके बाद दिवांशु ने 21वींं सदी की स्किल के जरिए कमजोर वर्ग के छात्रों के बीच पढ़ाई-लिखाई का माहौल तैयार कर उन्हें एक बेहतर भविष्य देना ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया। औऱ अपने दोस्तों और सह-संस्थापकों अवनीश राज और सम्यक जैन के साथ मिलकर इन्वॉल्व की नींव रखी।

महिला टीचर के समर्पण की अद्भुत-अनसुनी कहानी

साल 2016 में दिवांशु और उनकी टीम ने दिल्ली के एएसएन सीनियर सेकेंडरी स्कूल की प्रिंसिपल सोनिया लूथरा से मुलाकात कर अपने माडल के बारे में जानकारी दी। दरअसल दिवांशु ने अपनी 11th-12th की पढ़ाई एएसएन सीनियर सेकेंडरी स्कूल से ही की थी, इसलिए उन्होंने सबसे पहले इसी स्कूल में अपने प्रोजेक्ट को लेकर प्रेजेंटेशन देने का निर्णय लिया। वहीं स्कूल ने भी दिवांशु के प्रयास को समझा और इस तरह इन्वॉल्व की पहली पायलट परियोजना शुरू हुई, जहां गर्मी की छुट्टियों के दौरान सीनियर छात्रों को उनके जूनियर स्टूडेंट्स को पढ़ाने-सिखाने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान अलग-अलग गतिविधियों और खेलों के जरिए छात्रों को संबंधित विषय को आसानी से समझने में मदद दी गई। अपने इस पायलट प्रोजेक्ट को लेकर दिवांशु बताते हैं कि हमने सिर्फ 6 सप्ताह में शिक्षार्थियों के शैक्षणिक अंक में 20 प्रतिशत का सुधार किया।शिक्षा व्यवस्था के सूरत-ए-हाल को बदलने की दिवांशु की अब धीरे-धीरे रंग ला रही है। अब शिक्षण सिर्फ किताबों और कक्षा के स्मार्टबोर्ड तक ही सीमित नहीं रह गया है। बदलते वक्त के साथ शिक्षण प्रणाली में कई सकारात्मक बदलाव साफ तौर पर देखने को भी मिल रहे हैं। दिवांशु के मुताबिक उनकी टीम ने अपनी यात्रा के दौरान 200 से अधिक छात्रों को प्रभावित और उनके शैक्षणिक अंकों में सुधार किया है।  वर्तमान में इन्वॉल्व की टीम पीयर टीचिंग के माध्यम से अधिक से अधिक छात्रों को प्रभावित करने के लिए चेन्नई और बैंगलोर के स्कूलों के साथ काम कर रही है। अब तक, टीम ने चेन्नई और बेंगलुरु में कई स्कूलों में 1000  से अधिक छात्रों के साथ काम किया है, जिसमें 100 से अधिक छात्र नेता भी शामिल हैं।

सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए बनाया रोबोट

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (NCSK) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर पांच दिनों में सेप्टिक टैंक या सीवर लाइनों की सफाई करते समय एक व्यक्ति अपनी जान गंवाता है। टेक्नालॉजी की इतनी तरक्की के बावजूद सेप्टिक टैंक के अंदर का जहरीला धुआं मैनुअल स्कैवेंजिग (हांथो से मल की सफाई) के दौरान सफाईकर्मियों के लिए काल का काम करता रहा है। जिससे चिंतित होकर आईआईटी मद्रास के पूर्व छात्र दिवांशु कुमार ने अपनी टीम के साथ मिलकर देश की इस विकराल समस्या का हल ढूंढ़ना शुरू किया। और टेक्नालॉजी का इस्तेमाल करते हुए एक ऐसे SEPOY रोबोट का अविष्कार किया, जो मैनुअल क्लीनिंग प्रोसेस को पूरी तरह से खत्म करने की क्षमता रखता है। दिवांशु और उनकी टीम ने सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले इस मानव रहित रोबोट को डॉ प्रभु राजगोपाल के निर्देशन में विकसित किया।

SEPoy रोबोट बायो प्रोपुलेजन तकनीक से काम करते है, जो पानी में जाकर मछली कि तरह अपना काम करते हैं। मशीन टैंक के अंदर जाकर पहले सारे कीचड़ को समरूप करती है और इसके बाद इस कीचड़ को एक वैक्यूम पंप की सहायता से बाहर निकाल दिया जाता है। इस बेहद उपयोगी अविष्कार के लिए दिवांशु कुमार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हांथों भाग्यलक्ष्मी और कृष्ण अयंगर अवार्ड के अलावा बेस्ट आंत्रप्रेन्योर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

पॉजिटिव इंडिया की कोशिश हमेशा आपको हिंदुस्तान की उन गुमनाम हस्तियों से मिलाने की रही है जिन्होंने अपने नए तरीके से बदलाव को एक नई दिशा दी हो और समाज के सामने संभावनाओं की नई राह खोली हो।

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