LOADING

Type to search

Share

महबूब राही का एक शेर है.

काम नहीं आते जज़्बात सियासत में..जायज़ होती है हर बात सियासत में…

ये शेर इसलिए क्योंकि जिस भारत की धरती से निकलकर योग की जो विद्या आज पूरी दुनिया में धूम मचा रही है, वही सनातन साधना आज हमारे देश में ही राजनीति की यार्ड से बाहर नहीं निकल रही है। वैसे तो योग और सियासत का संबंध हिंदुस्तान में दशकों पुराना है और राजनीति की काल कोठरी में देश के कथित धर्म गुरुओं की भूमिका भी पहले से ही रही है लेकिन पिछले कुछ सालों में योग केंद्र को ही साधना की बजाए सियासी हित साधने के टूल के रूप में तब्दील कर दिया गया है। इतना ही नहीं शून्य बजट में स्वास्थ्य बीमा देने वाले योग को अब देश के तथाकथित योग-गुरुओं ने कमाई  का जरिया भी बना लिया है। आलीशान होटलों की तर्ज पर खुलते योग केंद्रों में युवाओं की उमड़ती भीड़ यह साबित करती है कि योग यहां नए फैशन के तौर पर सिर्फ स्टेटस सिंबल बनकर रह गया है। ऐसे में अब सोचना जरूरी हो गया है कि क्या सच में राजनेताओं और धर्मगुरुओं को देश के स्वास्थ्य की चिंता सताने लगी है या फिर बाजारवाद के चलते उन्हें योग के रूप में एक नया प्रोडक्ट मिल गया है।भारत और योग का संबंध दो हजार साल से भी ज्‍यादा पुराना है। योग परम्परा और शास्त्रों का अपना विस्तृत इतिहास भी रहा है लेकिन हाल के कुछ दशकों में इसकी लोकप्रियता और स्‍वीकार्यता बेहद तेजी से बढ़ी है। वहीं अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस जैसे आयोजन ने योग को एक ब्रांड बना दिया है। जिसका फायदा उठाने में कारपोरेट जगत भी जुट गया है। यही वजह है कि प्रयोग, फॉरइवर योग, अर्बन योग, डू यू स्पीक ग्रीन जैसी नई कंपनियां भी योग से जुड़े कपड़े निर्मित करने लगी हैं। सिर्फ योग के दौरान पहने जाने वाले कपड़ों के बाजार का आकार ही ढाई हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। मोबाइल ऐप बनाने वाली कंपनियों ने भी विशेष योग एप लांच की है। डेली योगा, योगासन, बाबा रामदेव योग नाम से कई एप बाजार में आ चुके हैं,योग के फैशन के चलन को देखते हुए योग की कक्षाएं चलाने वाले संस्थान, स्टूडियो और टीचर भी अब चैन श्रृंखला की तर्ज पर अलग-अलग शहरों में लोगों और बडी कॉरपोरेट कंपनियों के कर्मचारियों को योग का प्रशिक्षण उपलब्ध करा रहे हैं। वहीं देश के बड़े-बड़े गुरुओं ने तो वाकायदा मोटी रकम वसूलने वाले पैकेज बना रखे हैं।

योग का अजब संयोग 

कहीं फिटनेस की बजाए फैशन पर जोर

तो कहीं साधना पर भारी सियासत का रोगयोग को विश्व में बुलंदी पर पहुंचाने वाले हिंदुस्तान में इस बार कोरोना के खतरे के चलते लोगों ने खामोशी और पूरी सावधानी के साथ योग दिवस मनाया। देश में योग की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले भारत में एक साल में ही योग इंडस्ट्री 65% तक बढ़ चुकी है। ट्रेनर 48% तक बढ़े हैं। वहीं योग करने वालों में 50% तक इजाफा हुआ है।

क्य़ोंकि बाजारवाद के इस दौर में योग अब फिटनेस की बजाए फैशन का सबसे जरूरी हिस्सा बन गया है। इस नए ट्रैंड को भुनाने के लिए जगह-जगह ‘योगा शॉप’ और ‘योगा रिसार्ट” खुल गए हैं। दुकानों में योगा बुक्स से लेकर योगा मैट्स जैसे तमाम उत्पाद बिक रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ ने योग को एक बड़ा ब्रांड बना दिया है। ऐसे में कारपोरेट जगत भी इस ब्रांड का बेजा फायदा उठाने में जुट गया है। लिहाजा अध्यात्म में कार्पोरेट कल्चर आने और जरुरत व लोगप्रियता के कारण योग अब दिनों दिन महंगा होते जा रहा है।

महंगा हुआ योग

भारत में 40-50 हजार करोड़ रुपए का बाजार।

देश में 400 से लेकर 1500 रुपए तक योग सिखाने की 1 घंटे की फीस ली जाती है।

ऋषिकेश के एक मशहूर परमार्थ निकेतन योग केंद्र में एक महीने के कोर्स की फीस 2 हजार डॉलर यानी 1 लाख 26 हजार रुपए है।

कृष्णमाचार्या योग मंदिरम, चेन्नई में दो से चार हफ्ते के कोर्स की फीस साढे़ पच्चहत्तर हजार रुपए तक है।

राममणि अय्यंगर मेमोरियल योगा इंस्टीट्यूट, पुणे में एक महीने की फीस 29 हजार रुपए है।

आष्टांग इंस्टीट्यूट, मैसूर, पहले महीने के लिए 40950 रुपए और फिर प्रतिमाह 26145 रुपए

रामदेव के पतंजलि का कारोबार पिछले 5 सालों में राजधानी की रफ्तार से भी तेज गति से बढ़ा है।

रामदेव योग सिखाने के लिए भी आगे की पंक्तियों में बैठने वालों से 50 हजार, उससे पिछली सीटों पर बैठने वालों से 30 हजार और अंतिम सीट पर बैठने वालों से एक हजार रुपये लेते हैं।

वहीं आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर का कारोबार भी करीब 155 देशों में फैला है। 10 साल पहले आश्रम को 55 लाख डालर की कमाई सिर्फ कोर्स के फीस से हुई थी। आर्ट ऑफ लिविंग के सिर्फ एक हफ्ते के कोर्स की फीस 22 हजार रुपए से शुरू होती है।

मेक इन इंडिया पर जारी सरकारी दस्तावेज के मुताबिक देश में योग और आयुर्वेद से जुड़े उत्पादों का बाजार 145 अरब रुपए का हो गया है।

हालांकि भारतीय संस्कृति की पहचान माने जाने वाले योग के साथ सिर्फ बाजारवाद की ही समस्या नहीं है। योग को राजनीति का रोग भी काफी पुराना है। सियासत और योग के गठजोड़ को देख अब कहना भी मुश्किल हो गय़ा है कि राजनीति का योग चल रहा है या योग की राजनीति हो रही है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि खुद को तथाकथित योग गुरु कहने वाले सन्यासी अब व्यापारी ज्यादा लगने लगे हैं। तो वहीं कई नेताओं और मंत्रियों ने इस मंच को निष्ठा प्रदर्शन और आत्मप्रचार का ज़रिया बना लिय़ा है। ऐसे में सवाल उठना भी लाजमी है क्या पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष अभ्यास और मुक्ति का मार्ग कहे जाने वाले योग को भी अब भोग का साधन बना लिया गया है। क्या अब योग सेहत की चिंता की बजाए एक नया फैशन स्टेटमेंट बनकर रह गया है और क्या योग को बेशर्मी का एक ऐसा ब्रांड बना दिया गया है जो बाजार से लेकर धर्म-संस्कृति और राजनीति तक हर जगह सबसे ज्यादा बिकता है।रहा है।

सेहत को तंदुरुस्त बनाने के मकसद से शुरु हुआ योग, आज सियासत से होता हुआ वैश्विक बाजार तक जा पहुंचा है। आखिर जिस योग को सादगी का आचरण माना गया है, वो योग फैशन और निष्ठा के प्रदर्शन का साधन कैसे बन सकता है। जो योग धार्मिक नहीं है वो राजनीतिक कैसे हो सकता है। योग को बढ़ावा देना अच्छी बात है, लेकिन ध्यान रहे कि आधुनिकता का लबादा ओढ़ाकर इसके मूलभाव से छेड़छाड़ न की जाए और योग की पहचान सिर्फ राजनेताओं और तथाकथित योग गुरुओं से ही न रह जाए…क्योंकि योग आंतरिक इंजीनियरिंग का एक ऐसा ज़रिया है, जो पूरे ब्रह्मांड के लिए उपयोगी है।

 मयंक शुक्ला, फाउंडर पॉजिटिव इंडिया

Tags:

You Might also Like

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *