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अंग्रेजों की गुलामी से आजादी पाने को बेताब देशवासियों ने एक बहुत बड़ी कीमत चुकाकर लंबे इंतजार के बाद स्वतंत्रता की पहली सुबह देखी थी, क्योंकि ब्रिटिश शासनकाल में जिंदगी तो थी लेकिन आजादी नहीं थी। कुशासन था लेकिन आज जैसा अपराध नहीं था। अंग्रेजो की यातनाएं थी लेकिन आज जैसा भ्रष्टाचार नहीं था। शिक्षा की बेहतर व्यवस्था नहीं थी, मगर आज जैसा शिक्षा का व्यवसायीकरण भी नहीं था। पीजा हट जैसी दुकानें और आधुनिक रहन सहन के संसाधन नहीं थे,तो आज जैसी भुखमरी और कुपोषण का कलंक भी नहीं था और न ही मजहबी नफरत की आग थी। कुल मिलाकर आजादी के बाद से आजाद भारत ने एक लंबा सफर तय किया है। इस बीच बहुत कुछ पाया है और उससे ज्यादा खोया भी। लेकिन जिन सपनों और लक्ष्यों को लेकर हमारे जन नायकों ने अपने खून से आजादी की गाथा लिखी थी, क्या वो पूरे हो पाए हैं? क्या आधी रात में हिन्दुस्तान को नसीब हुई आजादी की असल सुबह आ पाई है? क्योंकि आजादी की 73वीं सालगिरह के जश्न में डूबा आज का भारत, अपने वर्तमान और भविष्य से पूछ रहा है, कि क्या ये वही आजादी है जिसकी हमने कल्पना की थी !
स्वराज की बुनियाद पर आजादी के मतवालों, महापुरुषों और क्रांतिकारियों ने स्वतंत्र भारत के नव-निर्माण का सुनहरा भविष्य लिखा था। जिसका बड़ा सीधा और स्पष्ट सा अर्थ था कि हमारा भारत एक ऐसा राष्ट्र होगा जहां न शासक होगा, न कोई शोषित, न मालिक होगा, न कोई मजदूर। सबके लिए शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा और उन्नति के समान और सही अवसर उपलब्ध होंगे। लेकिन शायद हमारी जागती आंखों से देखा गया ये सपना अभी भी सच्चाई से कोसों दूर है और हकीकत सवाल कर रही है कि कौन आज़ाद हुआ है? किसके माथे से गुलामी की स्याही छूटी है? क्योंकि खंजर अब भी आज़ाद है सीनों में उतरने के लिए और मौत आज़ाद है लाशों पे गुज़रने के लिए।
राष्ट्र पिता महात्मा गांधी का मानना था कि आजादी एक जन्म के समान है। जब तक हम पूर्णरूप से स्वतंत्र नहीं होते तब तक हम दास हैं। इस लिहाज से क्या हम वाकई आजादी के 73 बरसों बाद भी उन विचारों से आजाद हो पाए हैं, जिनकी नींव अंग्रेजी हुकूमत डाली थी। हम आजाद हैं इसका अर्थ और आजादी का पैमाना क्या है। एक देश को दूसरे मुल्क से मिली आजादी, आर्थिक कर्जों से छुटकारे की आजादी, पुराने रीति-रिवाज और बंदिशों को तोड़कर आगे बढने की आजादी या फिर एक इंसान होने के नाते स्वतंत्रता से सोचने, विचार करने और खुद फैसले लेने की आजादी!
आज से ठीक 73 बरस पहले परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े एक मुल्क को आजाद कराने वाले जन नायकों ने एक सपना देखा था। सपना स्वराज का, सपना संसाधनों के समान अधिकार का, सपना सबके सम्मान का, जहां न कोई बड़ा हो न कोई छोटा। न मजहबी भेद हो न सरहदी। न कोई शासक होगा, न कोई शोषित। जहां खुले आसमां के नीचे सभी एक साथ सिर उठा के जी सकें। जंहा हर इन्सान अपनी खुदी को बुलंद कर सके, अपनी ख़ुशी ढूंढ सके, अपनी आत्मा की आवाज़ को सुन और सुना सके क्योंकि गांधी जी के नजरों में आजादी स्वतंत्र आकाश में पंक्षी की उङान जैसी थी। स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ आर्थिक और सामाजिक नहीं बल्की सोच-समझ में भी आजादी के आगाज से था। ऐसे में इस ख्वाब बुने हुए 73 साल का समय बीत चुका है जो सच्चाई को जानने और फैसला लेने के लिए काफी है, कि देश ने इतने सालों में क्या खोया और क्या पाया। क्योंकि इस दौरान हमारा देश बहुत से उतार-चढ़ावों से गुजरा है। एक सच यह भी है कि इतने दशकों में हिन्दुस्तान में बहुत कुछ बदला है। आजादी के बाद के इस लंबे सफर में देश ने बहुत कुछ हासिल भी किया है….दुनिया के नक्शे में भारत एक मजबूत अर्थ व्यवस्था वाला देश बनकर उभरा है। न्यूक्लियर पॉवर के क्षेत्र में सराहनीय कदम बढ़ाया है। विदेश में बसने वाले भारतीय भी कामयाबी के नए किस्से गढ़ रहे हैं तो हमारे देश की बेटियां चांद-तारों में भी पहुंच रही है।
अगर हमारे मुल्क ने इतने बरसों जहाँ ढेरों उपलब्धियाँ हासिल कीं है, तो वहीं दूसरी ओर पीड़ा और दुर्दिनों का भी सामना किया है। उसके दोनों चेहरे सामने आते रहे हैं फिर भी अगर कुछ नहीं बदला तो वो है ‘गुलामी की मानसिकता’। 1947 का दाग-दाग उजाला आज संगीन अंधेरी रात की शक्ल ले चुका है। साम्राज्यवाद और देशी पूंजीवाद के राहु-केतु ने हिन्दुस्तान के विकास के सूरज को पूरी तरह से ग्रस लिया है। आजादी वादों-विवादों तक सिमटती जा रही है और कई सवाल अभी भी स्वराज और सुशासन के सफर में आड़े आ रहे हैं। क्या भारत में बचपन आजाद है ? क्या महिलाएं महफूज हैं ? क्या समाज अंधविश्वास की बेड़ियों को तोड़ चुका  है ?
यकीनन ये सवाल तो यही बता रहे हैं कि हमने सिर्फ सरहदी आजादी पाई है और स्वराज का सपना अभी भी हकीकत से दूर है क्यों कि आजाद हिन्दुस्तान में आम आदमी को ना तो भूख से आजादी है और ना ही बीमारी से। शिक्षा के अभाव में वह अंधविश्वास का गुलाम बना हुआ है। आजादी के इतने समय भी कन्या भ्रूण हत्याएं खत्म नहीं हो रहीं, ना ही बाल विवाह और दहेज के दंश से मुक्ति मिली है। जिससे पूरा सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है। जहां तक दलितों और आदिवासियों के शोषण और तिरस्कार का सवाल है, इसके लिए दिखाने को कानून बहुत से हैं पर यहां भी इन तबकों की आजादी पूरी नहीं समझी जा सकती क्योंकि वो आज भी न सुखी हैं न समृद्ध। न सुरक्षित बना, न संरक्षित। न शिक्षित और न स्वावलम्बी। जहां स्वार्थ की भूख परमार्थ की भावना को ही लील रही है। हिंसा, आतंकवाद, जातिवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीयवाद और  धर्म, भाषा और दलीय स्वार्थों के राजनीतिक विवादों ने आम नागरिक का जीना दुर्भर कर रखा है। विडंबना यह भी है कि सरकार, आंकड़ों की भूल-भुलैया में आलोचकों को उलझाकर गद्दी पर बने रहना ही अपना कर्तव्य समझती है। बंधुआ मजदूर हो या  कर्ज में डूबे खुदकुशी करने वाले किसान या फिर गरीबी की सीमा रेखा के नीचे 20 रुपये रोज पर जिंदगी बसर करने वाले दिहाड़ी मजदूर, खुद को आजाद कैसे समझ सकते हैं भला? आजाद हिन्दुस्तान के 73वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर `आजादी की तलाश` एक बड़ा मुद्दा है… आइए, हम सब मिलकर गुम हुए अपने ‘आजाद’ हिन्दुस्तान की तलाश करते हैं और बापू के स्वराज के सपने को साकार करने के लिए एक कदम बढ़ाते हैं।
आँखों में स्वराज का सपना पल रहा है
बिखेरकर रौशनी का दिया खुद जल रहा है
हौसले की बाती,हिम्मत से भीगी हुई
धीरे ही सही ,पर समा बदल रहा है
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