LOADING

Type to search

Share

आधुनिकता के इस दौर में जहां शिक्षा ने बिजनेस और शिक्षकों ने बिजनेसमैन का रूप धारण कर लिया है, जिसका नतीजा शिक्षा का गिरता स्तर और शिक्षकों के लगातार घटते सम्मान रूप में हमारे सामने है। लेकिन आज के इसी युग में कुछ ऐसे शिक्षक भी मौजूद हैं जो अपने संघर्ष, फर्ज और कर्तव्यनिष्ठा से गुरू पद की महिमा की लाज बचाए हुए हैं और आज भी दुनिया के सामने अनोखी मिशाल पेश कर रहे हैं। हमारी ये कहानी भी शिक्षा के एक ऐसे दूत की है, जो बीते 15 सालों से नामुमकिन परिस्थियों में भी शिक्षा की अलख जगाकर नौनिहालों के भविष्य को रोशन कर रहा है।

सरकार ने नहीं बनाई सड़क,घोड़े पर सवार होकर स्कूल पहुंचे दिव्यांग शिक्षक

तस्वीरें मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिला डिंडौरी की हैं और तस्वीरों में नजर आ रहे शख्स शिक्षक रतनलाल नंदा हैं। जन्म से ही दिव्यांग रतनलाल नंदा जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर लुढरा गांव के निवासी हैं।  गांव से 7 किलोमीटर दूर जिस स्कूल में वो पदस्थ हैं वहां तक पहुंचने के लिये सड़क ही नहीं है,जंगली ऊबड़खाबड़ रास्तों और नदी-नालों को पार करके ही स्कूल तक पहुंचा जा सकता है। लेकिन ये तमाम मुश्किलात भी इस दिव्यांग शिक्षक के हौसले और हिम्मत को कम नहीं कर पाई। लिहाजा रतनलाल ने खुद एक घोड़ा खरीद लिया और पिछले 15 सालों से लगातार 14 किमी का लंबा सफर हर रोज वो इसी घोड़े पर बैठकर तय करते हैं ताकि इन इलाकों में रहने वाले नौनिहालों की जिंदगी में अशिक्षा का अंधियारी न फैल सके।

शिक्षक रतनलाल नंदा को सड़क न होने की वजह से घोड़ा खरीदना पड़ा और वो उसी घोड़े पर बैठकर पिछले 15 सालों से हर रोज 14 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर इलाके में शिक्षा की अलख जगाने का काम कर रहे हैं।


रतनलाल बताते है कि समस्याएं तो बहुत हैं मगर मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी है। कई बार इसे लेकर नेता-अफसरों से सड़क बनवाने की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। शासन प्रशासन को भी कई बार लिखित शिकायत भी दी गई थी पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। स्कूल भवन भी पूरी तरह जर्जर हो चुका है लेकिन कोई सुध लेने नही पहुंचा। 

 प्राथमिक शाला संझौला टोला में पदस्थ रतनलाल नंदा का एक पैर जन्म से ही बेकार है लेकिन अपने कर्तव्यों को पूरा करने उन्होंने कभी अपनी दिव्यांगता को आड़े नहीं आने दिया, तमाम चुनौतियों को मात देते हुये घोड़े के सहारे वो हर रोज स्कूल पहुंचकर बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि नौनिहालों का भविष्य संवर सके।

घर से स्कूल तक 7 किलोमीटर का दुर्गम सफर तय करने के लिये उन्हें घर से दो घंटे पहले निकलना पड़ता है और स्कूल की छुट्टी के बाद वो देर शाम घर पहुंच पाते हैं। सफर के दौरान कई बार ऐसे स्थान भी हैं जहां घोड़े की हिम्मत भी जवाब दे जाती है तब शिक्षक घोड़े का सहारा बनकर उसे पार लगाते हैं। गांव के लोग शिक्षक रतनलाल की जमकर तारीफ़ करते हैं। 

कहते है अगर दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा और जूनून हो तो इंसान हर असंभव काम को भी आसानी से कर जाता है और दुनिया के सामने एक मिसाल पेश कर जाता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है दिव्यांग शिक्षक रतनलाल नंदा ने, जिन्हें POZITIVE INDIA दिल से सलाम करता है और उम्मीद करता है कि देश-प्रदेश के दूसरे शिक्षक भी रतनलाल से प्रेरणा लेंगे।

Tags:

Leave a Reply

%d bloggers like this: