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मिलिए सारे जहां में इंडिया का डंका बजाने वाली देश की पहली ढोल गर्ल से

mayankshukla 3 years ago
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पुरुष-प्रधान सोच को चुनौती देती ‘ढोल गर्ल’ गीत सिंह

इस दुनिया में ऐसे लोग कम ही होते हैं जो अपने पैशन को प्रोफेशन बनाने का रिस्क उठाते हैं और ट्रेंड से हटकर कुछ नया कर जाते हैं। ऐसी ही एक शख्सयित हैं जहां गीत सिंह। गीत सिंह ने महज 12 साल की उम्र से ढोल बजाना शुरू किया और 19 साल की होने तक 300 से ज्यादा लाइव परफार्मेंस देने का नया रिकार्ड बना दिया। गीत सिंह देश की पहली और दुनिया की दूसरी महिला ढोल गर्ल हैं। इसके अलावा वो भारत की सबसे कम उम्र की महिला ढोली भी हैं।

गीत बताती हैं कि 5 मिनट तक ढोल बजाने में एक घंटा जिम करने जितना पसीना बहता है। कई बार प्रैक्टिस करते समय हाथों में छाले तक पड़ जाते थे और कई बार तो खून भी निकलने लगता।

चंडीगढ़ में रहने वाली 21 साल की जहान गीत सिंह को लोग भारत की ‘ढोल गर्ल’ के नाम से जानते हैं। गीत फिलहाल पंजाब यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई कर रही हैं। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ, जहान ढोल बजाने के अपने शौक और जुनून को भी आगे बढ़ा रही है। महज 12 साल की उम्र में जहान ने ढोल बजाना और सीखना शुरू कर दिया था लेकिन यह तो उनके संघर्ष की बस शुरुआत भर थी। उस उम्र में 9 किलो के भारी ढोल के वजन को घंटों तक संभालना भी जहान के लिए एक बड़ी चुनौती रही क्योंकि ढोल को उठाकर सिर्फ़ 5 मिनट बजाने के लिए भी बहुत ताकत और सहन-शक्ति की ज़रूरत होती है। कई दफा तो ज्यादा मेहनत के कारण हीमोग्लोबिन लेवल घटकर 5 ग्राम ही रह गया जिसके बाद जहान को समझ आया कि ढोल से जुड़े रहना है तो अपने शरीर का भी ख्याल रखना होगा लिहाजा उन्होंने अपने खाने-पीने पर खास ध्यान दिया। धीरे-धीरे अपनी सहनशीलता पर काम किया। कई बार बहुत प्रैक्टिस करते समय हाथों में छाले तक पड़ जाते और कई बार तो खून भी निकलने लगता। मगर गीत पर तो बस धुन सवार थी कि उन्हें भी बाकी ढोलियों की तरह घंटों तक ढोल बजाना है।

ऐसे शुरू हुआ ढोल गर्ल बनने का सफर

गीत बताती हैं कि “एक बार स्कूल से लौटते समय मैंने रास्ते में कुछ लोगों को ढोल बजाते देखा, जिनके चेहरे पर कुछ अलग ही नूर था, जिसे देख कर लगा कि बस मुझे भी ढोल सीखना है।  जब ये बात घर पर कही तो सबको बहुत हैरानी हुई क्योंकि ढोल को अभी तक सिर्फ़ पुरुषों के गले में लटका देखा गया है और शायद इसलिए कभी किसी ने सोचा ही नहीं कि एक लड़की भी ढोल बजा सकती है” इसी एक सवाल ने न सिर्फ जहान की ज़िंदगी का रुख बदला बल्कि हमारे समाज की सोच को भी चुनौती दी।

जहान को अपने इस शौक को पूरा करने के लिए परिवार का पूरा साथ मिला। उनके पापा ने दूसरे दिन से ही उनके लिए एक उस्ताद ढूंढना शुरू किया, जो उन्हें ढोल बजाना सिखा सके। पर उन्हें सब जगह ‘ना’ ही सुनने को मिला, क्योंकि कोई भी एक लड़की को ढोल बजाना नहीं सिखाना चाहता था। ज्यादातर लोगों के लिए इस बात को पचा पाना ही मुश्किल था कि एक अच्छे-खासे परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की ढोल बजाना और सीखना चाहती है। काफी मशक्कत के बाद आखिरकार सरदार करतार सिंह उन्हें ढोल सिखाने के लिए तैयार हो गए। उस वक़्त शायद करतार सिंह को भी लगा था कि ये जहान का दो-चार दिन का शौक है और जल्दी ही, वो खुद सीखने से मना कर देगी। लेकिन जैसे-जैसे वक़्त जाने लगा, तो उन्हें समझ में आया कि ढोल सीखना सच में मेरा जुनून है। इसके बाद उन्होंने पूरे दिल से मुझे सिखाना शुरू किया। आज तक वही मेरे उस्ताद हैं। उन्होंने मुझे बहुत बारीकी से सिखाया ताकि ये सिर्फ़ मेरे लिए शौकिया न रहे बल्कि मुझे ढोल की समझ भी हो।गीत अपने पुराने अनुभवों को याद करते हुए बताती हैं कि जब मैंने अपनी पहली परफॉरमेंस दी है, तो उन्हें बहुत ही अलग रिएक्शन मिले। लोगों के ताने और दकियानूसी बातें सुनने को मिली।। बहुत से लोगों ने कहा कि शर्म नहीं आती, जो ढोल बजा रही है,  कुछ अच्छा कर लेती।

लोगों को लगता है कि ढोल बजाना सिर्फ़ एक तबके या जाति के लोगों का काम है। जब मैं ढोल बजाने कहीं जाती तो लोगों को यही लगता कि मैं भी उसी तबके से आती हूंं और इसलिए मजबूरी में यह काम कर रही हूं। कोई भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि एक अच्छे-खासे घर की लड़की भी ढोल बजाना सीख सकती है।

जहान जब भी कहीं परफॉर्म करने जाती, तो उन्हें बाकी ढोलियों से भी चुनौती मिलती कि क्या वह एक पुरुष-ढोली जितना अच्छा ढोल बजा सकती है। इतना ही नहीं, उनके उस्ताद को भी लोग ताने देते कि उन्होंने अपनी कला, अपना एक गुर, एक लड़की को दिया है। पर जहान की मेहनत और जुनून ने उन्हें कभी भी रुकने नहीं दिया। धीरे-धीरे उनकी एक अलग पहचान बनना शुरू हुई। उन्होंने अपनी परफॉरमेंस के बाद स्टेज पर रंग जमाना शुरू कर दिया। लोगों को अपने बारे में बताया कि ढोल बजाना उनकी मजबूरी नहीं बल्कि शौक है और वो अपनी संस्कृति की शान के प्रतीक ‘ढोल’ को और आगे बढ़ा कर एक नया मुकाम देना चाहती हैं।इसके बाद जहान को कई स्थानीय टीवी चैनल और रेडियो स्टेशन पर बुलाया जाने लगा। उन्हें जोश टॉक, टेड टॉक जैसे इवेंट में भी अपना अनुभव साझा करने का मौका मिला। उन्होंने नेशनल टीवी के रियलिटी शो, ‘एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा’ और ‘इंडियाज़ गोट टैलेंट’ में भी अपने ढोल की छाप छोड़ी है। बहुत से अवॉर्ड्स, पुरस्कार और सर्टिफिकेट्स से उन्हें नवाज़ा गया है। पिछले 7 सालों में जहान ने 300 से भी ज़्यादा समारोह और इवेंट में ढोल बजाया है। सबसे पहले उनके बारे में साल 2011 में ब्रिटेन की एक मैगज़ीन टॉम-टॉम ने लिखा था। जहान भारत की सबसे युवा लड़की ढोली हैं और अब यह उनकी पहचान का एक हिस्सा है।

“मैने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपने शौक और जुनून को भी आगे बढ़ाया। यह करने का हक हर किसी बच्चे को मिलना चाहिए। अगर हमारे समाज में सभी बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ उनकी पसंद से कुछ करने का मौका मिले, तो शायद हमारे हिंदुस्तान का नजरिया काफी बदल जाए”। 

लोगों की ज़िंदगी में बदलाव लाने के उद्देश्य से ही जहान अलग-अलग संगठनों और एनजीओ आदि के साथ मिलकर समाजसेवा का काम भी कर रही हैं। वो ज्यादातर ऐसे इवेंट में परफॉर्म करती हैं, जो किसी नेक काम और किसी बदलाव के लिए रखा गया हो। यहां वो ढोल बजाने के साथ ही अपने मोटिवेशनल स्पीच के जरिए बदलाव लाने की कोशिश करती हैं।

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