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Story by Neha Yadav

कहते हैं किसी को रुलाना आसान है मगर हंसाना मुश्किल, वो भी आज के भागते दौर में जहां इंसान के पास खुद के लिए ही समय नहीं है। मगर हमारी इसी दुनिया में आज भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनके हाथ हमेशा दूसरों की मदद के लिए उठते हैं, वो दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझते हैं, अपनी पूरी जिंदगी इंसानियत के नाम कर देते हैं और दूसरों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरना ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लेते हैं। दिल्ली में रहने वाली शीतल अग्रवाल भी इन्हीं में से एक हैं।

मिलिए ‘नेक दिल जोकर’ शीतल अग्रवाल से

कहते हैं कि हंसी से हर मर्ज का इलाज होता है यही वजह है कि दिल्ली के चाचा नेहरु बाल चिकित्सालय में हजारों बच्चों को उनकी बीमारी में डॉक्टरों की दवा के साथ-साथ क्लाउनसलर्स हंसी का डोज भी देते हैं। इसमें उनकी मदद कर रही हैं शीतल अग्रवाल, जो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे बच्चों को हंसाकर एक नई उम्मीद पैदा कर रही हैं।

जोकर के भेष में मुस्कान और ख़ुशियां बिखेर कर किए जाने वाले इलाज को मेडिकल क्लाउनिंग या क्लाउन थेरेपी कहा जाता है। इसे 1980 के दशक में अमेरिका में शुरू किया गया था।

डीयू से एंथ्रोपॉलोजी में एमफिल करने वाली शीतल अग्रवाल चाचा नेहरु बाल चिकित्सालय में क्लाउन गर्ल के नाम से मशहूर हैं। शीतल और उनकी टीम (क्लाउनसलर्स) हर शनिवार सुबह अस्पताल पहुंचकर उदास और बीमार बच्चों के चेहरों पर हंसी लाने के काम में जुट जाती है। क्लाउनसलर्स के इस ग्रुप में कई वॉलंटियर हैं जो अपनी जॉब छोड़कर या उससे समय निकालकर हर शनिवार को अस्पताल आते हैं। ये लोग (क्लाउनसलर्स) एक चेन बनाकर गाना गाते और डांस करते हुए पूरे अस्पताल में जाते हैं और बीमार बच्चों को हंसाते और गुदगुदाते हैं। शीतल अपने एक्सपीरियंस शेयर करते हुए  बताती हैं कि कुछ समय पहले एक बच्ची बीमारी की वजह से न खाना खा रही थी और न ही किसी से बात कर रही थी लेकिन 15 दिन बाद जब हम उससे मिले तो हमारी कोशिशों की वजह से वो हंसने लगी और जल्द ही ठीक भी हो गई।

दिल्ली में मेडिकल क्लाउनिंग के जरिए बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने का सफ़र साल 2016 में शीतल अग्रवाल ने शुरू किया था। आज यह थेरेपी कई बीमार बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने का काम कर रही है। 

दिल्ली में मेडिकल क्लाउनिंग के जरिए बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाने का सफ़र साल 2016 में शीतल अग्रवाल ने शुरू किया था। लेकिन सरकारी नौकरी में बड़े ओहदे पर काम कर रही शीतल के लिए ये सब इतना आसान नहीं था। शीतल बताती हैं कि वो सरकारी नौकरी में रिसर्चर की पोस्ट पर थी। पक्की नौकरी और बंधा-बंधाया रुटीन। पहली बार मेडिकल क्लाउनिंग के बारे में सुना तो सुनती ही रह गई, जोकर होना, अस्पताल जाकर बीमार बच्चों को गुदगुदाना !शीतल बताती हैं कि मैनें नौकरी छोड़ देने के बाद अपने इस फैसले के बारे में सबको बताया जिसके बाद पहला रिएक्शन था ”दिमाग तो नहीं खराब हो गया ! मोटी कमाई वाली नौकरी छोड़ना और वो भी जोकरगिरी के पेशे के लिए…बहुतों ने टोका अच्छी-खासी लड़की हो, क्या होगा जोकर बनकर, कुछ नहीं मिलेगा तो किसी ने सोसायटी में बदनामी और जगहंसी की दुहाई दी। लेकिन मेरे जुनून के आगे किसी की नहीं चली और आखिरकार मैंने अपने दिल की सुनी और निकल पड़ी इस नए सफर के लिए। पूरा एक साल मैंने सेविंग्स पर निकाला, बैंक अकाउंट खाली हो रहा था बावजूद इसके जोकर बनने का मेरा जुनून और परवान चढ़ता गया।

इंसानियत तो आज भी जिंदा है, ये रहा सबूत…

शीतल के मुताबिक जब साल 2016 में मैने मेडिकल क्लाउनिंग यानि अस्पताल में जोकर का काम करने का इरादा किया, उस वक्त तक दिल्ली में किसी ने इसका नाम तक नहीं सुना था लिहाजा इसके लिए मुझे सरकारी अप्रूवल चाहिए था। सबसे पहले हेल्थ मिनिस्ट्री को चिट्ठी लिखी, कुछ हफ्तों बाद मीटिंग के लिए बुलावा आया। मीटिंग में सवालों की झड़ी लगा दी गई जिनके जवाब मैने बखूबी दिए क्योंकि मैं पूरी तैयारी के साथ गई थी। रिसर्चर होने का भी फायदा मिला।इसके बाद मुझे पहला सरकारी अस्पताल मिला चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय। मुलाकात के बाद वहां प्रयोग की तरह इजाजत मिल गई लेकिन शर्त थी कि अकेले नहीं, जोकरों का पूरा जत्था साथ होना चाहिए। इसके लिए मैंने फेसबुक का सहारा लिया जिसके बाद 33 लोगों ने इस काम के लिए हां कहा और आखिर मेंहम 5 लोगों ने अपनी पहली परफॉर्मेंस दी।

जोकर बनकर अस्पताल में इस तरह से बच्चों को हंसाने का चलन पश्चिमी देशों में पहले से है। बच्चों के इलाज में इस तरह की थेरेपी काफी फायदेमंद होती है। ज्यादातर बच्चे अपने बीमारी या दर्द को भूल जाते हैं जिससे वो जल्दी ठीक हो पाते हैं।

पुराने दिनों को याद करते हुए शीतल कहती हैं कि जोकर बनकर बेहद मुश्किल काम है। शुरुआत में मेरे लिए भी ये काफी मुश्किल था लेकिन मैंने खूब प्रैक्टिस की गिरने की, उठने की, चेहरे पर हरदम मुस्कान रखने की। कई बार परेशान बच्चों के मां-बाप झल्ला उठते हैं, डॉक्टर गुस्से से देखते हैं कि जब दवाएं अपना काम कर रही हैं, तो फिर अस्पताल में जोकर का क्या काम, तो कई बार नर्सिंग स्टाफ चिड़चिड़ाए चेहरों से हमारे पुता चेहरे और रंगीन बाल को घूरता है।

सर्कस में जोकर बार-बार कुछ करने की कोशिश करते हैं और बार-बार नाकामयाब होते हैं.कोई सामान उठाने जाते हैं तो धड़ाम से गिर जाते हैं. गिरे साथी को उठाने की कोशिश में खुद गिर जाते हैं. खाते हैं तो सेब मुंह की बजाए नाक में घुस जाता है. वो ‘फेल’ होते हैं और लोग हंसते हैं.असल में वो लोगों को हंसाने के लिए ही बार-बार फेल होते हैं.

शीतल आगे कहती हैं कि सर्कस में लोग हंसने के लिए आते हैं। अस्पताल का माहौल अलग रहता है। हमें देखकर कई बार लोग भड़क जाते हैं। ऐसे में हम चुपचाप चले जाते हैं। बच्चा बहुत दर्द में हो तो उसके आसपास भी नहीं रहते। कई बार मैंने बच्चों को अपने सामने दम तोड़ते देखा तो बहुत बार बच्चों के ठीक होकर घर लौटने की हमने मिठाई भी खाई है। हॉस्पिटल में जाने के लिए शीतल और उनकी टीम ने कई नियम बना रखे हैं। जैसे एक है नो-टच रूल यानि हम बच्चों से हाथ मिलाने के अलावा उन्हें कहीं भी छू नहीं सकते। ये उन्हें इंफेक्शन से बचाने के लिए है। दूसरा कायदा है वॉल्यूम कंट्रोल, हम बेआवाज गाते हैं। कोशिश रहती है कि सिर्फ बच्चों की हंसी गूंजे, शोर नहीं। ढेर सारी एक्टिविटीज करते हैं। 

आखिर में शीतल कहती हैं कि शायद ही कोई अंदाजा लगा सकता है कि अस्पताल के उदास कमरे में किनारे पर लेटे एक बीमार बच्चे के सामने हंसना कितना मुश्किल है। लेकिन जब बॉल उठाने की कोशिश में बार-बार गिरते जोकर को देख वही बच्चा हंसता है तो जो सुकून मिलता है, वो हर मुश्किल भुला देता है क्योंकि हमारे लिए उनकी हंसी से बड़ी कोई खुशी नहीं है।

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2 Comments

  1. Avadhesh February 19, 2019

    Good information and nice article

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  2. Shiva Nishad February 19, 2019

    Bahut khub shital ji, keep it up 👏👏👌👌

    Reply

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