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मेरठ की ‘अमर मोहब्बत’: Valentine’s Special

mayankshukla 2 years ago
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पिछले 28 सालों से वो अपने पति के सांसो की पहरेदार बनी हुई है। अपनी जिंदगी का हर पल उसने किसी और के लिए जिया है। उसके प्यार की कहानी वहां से शुरू होती है जहां आकर प्यार की सारी परिभाषाएं भी खत्म हो जाती हैं। यकीन मानिए आज की असल जिंदगी में मोहब्बत की ऐसी मिसाल ना आपने कभी देखी होगी ना सुनी होगी। शायद ये प्यार से कहीं ज्यादा त्याग और समर्पण की एक ऐसी कहानी है, जो आज के प्रैक्टिल दौर में कमजोर पड़ते रिश्तों के बीच विश्वास और वचन जैसे शब्दों का वजूद बचाए रखती है।

मिलिए मेरठ की ‘सावित्री’ से

प्रेम कहानियां तो आपने कई सुनीं होगी लेकिन यूपी के मेरठ की आईवी सिंह की कहानी आज के दौर में बेहद खास है। मोहब्बत की ये कहानी एक ऐसी महिला की है जो पिछले 28 सालो से बार-बार अपने पति को मौत के पंजे से बाहर निकाल रही है। ये आईवी सिंह के प्रेम और समर्पण का ही असर है जो सालों से आनंद की उखड़ती सांसों को संजोकर दिल को धड़कने पर मजबूर कर रहा है।आईवी सिंह ने हकीकत की पथरीली राह पर चलते हुए प्रेम कहानियों की किताब में एक एक ऐसा अध्याय जोड़ा है जिसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।बीते 28 साल से बिस्तर पर पड़े आनंद सिंह अगर कुछ बोल पाते तो समर्पण की इस कहानी की गवाही खुद देते। उनकी जवानी की तस्वीरें देखें तो वो किसी फ़िल्म स्टार से कम नहीं लेकिन ये अब पुरानी बात है। भारतीय नौसेना में कार्यरत आनंद की शादी 1989 में आईवी सिंह से हुई। कुछ महीने देहरादून में दोनों साथ रहे, फिर आनंद का तबादला विशाखापट्टनम हो गया। जंगी जहाज आईएनएस विक्रमादित्य पर उनकी तैनाती हुई। इस बीच आईवी सिंह अपने मायके मेरठ लौट आईं और फिर आई एक ऐसी खबर जिसने आईवी की पूरी दुनिया ही बदल दी।


कहते हैं इश्क में पाना क्या और खोना क्या। यहां खोकर भी कोई पा जाता है और कोई पाकर भी खो देता है। दर्द मिले या खुशी, प्यार का हर पल खूबसूरत होता है। मेरठ के आनंद सिंह और आईवी सिंह की कहानी भी इश्क के इसी एहसास को समझाने की एक कोशिश करती है।


ये खबर थी, आनंद के एक्सीडेंट की। दरअसल शादी के कुछ महीने बाद आनंद छुट्टियों के लिए घर लौट रहे थे तभी उनकी मोटर साइकिल दुर्घटना का शिकार हो गई। उनके सिर पर गंभीर चोटें आईं और वो कोमा में चले गए। करीब नौ महीने की मशक्कत के बाद आनंद कोमा से बाहर तो आ गये, लेकिन उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बिस्तर की मोहताज हो गई। वो ना कुछ बोल सकते हैं, ना खा सकते हैं और ना ही चल फिर सकते हैं। डॉक्टरों के मुताबिक उनके फिर से सक्रिय होने की संभावना ना के बराबर है। अब आईवी ही उनकी हाथ-पैर और अकेली उम्मीद थीं।इस हादसे के बाद आईवी ने सबकुछ भुलाकर आनंद की सेवा में खुद को झोंक दिया। तब से 28 साल गुजर चुके हैं। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद आनंद बिस्तर से उठ नहीं पाए लेकिन आनंद की चलती सांसों में खुशबू भरने में आईवी ने कभी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। आनंद आईवी का इशारा समझते हैं। जवाब देने की कोशिश नाकाम हो जाती है, लेकिन दोनों जानते हैं कि प्रेम के इस मुकाम पर शब्द बहुत मायने नहीं रखते।

जब ये दुर्घटना हुई तब आईवी के हाथ की मेंहदी पूरी तरह छूटी भी नहीं थी, ख्वाबों और उमंगों के दिन थे। मगर एक पल में ही उनके सपनों का सारा संसार उजड़ गया। आईवी बताती हैं, हम केवल छह-सात महीने ही साथ रहे वह भी लगातार नहीं, क्योंकि आनंद की नौकरी ही ऐसी थी और फिर यह दुर्घटना हो गई। आनंद की सेवा में कब जवानी ढल गई, पता ही नहीं चला।

इन 28 वर्षों में आनंद की हर ज़रूरत आइवी सिंह ने पूरी की है। आनंद के नाक में ट्यूब डली हुई है, खाने के लिए वो टयूब का और खिलाने के लिए आइवी का सहारा लेते हैं। जिस कमरे में आनंद दिन-रात लेटे रहते हैं, वह किसी अस्पताल के कमरे से कम नहीं है। एक अलमारी दवाइयों से भरी हुई है और उसमें ज़रूरत का सारा सामान मौजूद है, इंजेक्शन की सिरिंज से लेकर नेबोलाइज़र ट्यूब तक। आइवी खुद एक प्रशिक्षित नर्स से कम नहीं हैं।आईवी को शुरू में दूसरी शादी कर लेने की सलाह मिली लेकिन आईवी के लिए आनंद से बढ़कर दूसरा कोई आनंद नहीं हो सकता था। लिहाजा उन्होंने दूसरी शादी करने से पहले एक शर्त रखी, ये शर्त थी कि उनके जीवन में जो भी दूसरा व्यक्ति आएगा उसे आनंद को भी स्वीकार करना होगा। हां, आईवी ने 13 साल पहले अनाथालय से भूमिका नाम की एक बच्ची को गोद जरूर लिया।भूमिका को भी अपने पिता आनंद से बेहद प्यार है, जिनकी तकलीफ वो बिना कहे समझ जाती है। पिता को इंजेक्शन से लेकर आक्सीजन तक देने में भूमिका की भूमिका रहती है। इस बच्ची ने अपने जीवन का रास्ता भी तय कर रखा है, बड़े होकर वह डॉक्टर बनना चाहती है ताकि न्यूरोलॉजिस्ट बनने के बाद अपने पापा का इलाज कर सके।आज आईवी अपनी जिंदगी के 48 बसंत पार कर चुकी हैं और इस घटना को 28 साल बीत चुके हैं, बावजूद इसके आईवी के संघर्ष में कोई कमी नहीं आई है। आनंद की हालत बीच में काफी नाज़ुक हो गई थी। उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा था। सभी पूरी तरह नाउम्मीद हो चुके थे लेकिन आईवी के प्यार और लगन ने बुझती जा रही जिंदगी की लौ को फिर तेज कर दिया। आईवी ने एक बार फिर, दरवाजे पर खड़े यमदूतों को वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया ताकि अमरप्रेम के इस किस्से में कुछ और रंग भर सकें।

वाकई मेरठ की आईवी सिंह की ये दास्तां मोहब्बत के असली मायने बताती है। लेकिन क्या जो प्यार और देखभाल आनंद को मिली है, आज के जमाने वो कितने लोगों को मिल पाती होगी? कितने लोग आईवी सिंह की तरह आज भी अपना पूरा जीवन क़ुर्बान करने का जज़्बा रखते होंगे। ये सवाल आप सबसे है,पूरे समाज से है और आधुनिक भारत की उस युवा पीढ़ी से भी है, जो आज रिश्तों को भी प्राइवेट नौकरी की तरह  ज्वाइन और रिजाइन देने का खेल समझ बैठी है।

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