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न आयरनमैन न ही सुपरमैन, जिंदगी की तंग गलियों में घूमता ये है मटका मैन

mayankshukla 3 years ago
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कहते हैं कि जब-जब धरती पर इंसान परेशान हुआ है कोई न कोई सुपर हीरो जरूर आया है। कभी बैटमैन, कभी आयरन मैन तो कभी सुपरमैन लेकिन हिंदुस्तान की धरती में प्रचंड गर्मी से लोगों को राहत दिलाने के लिए आया है ‘मटका मैन’…जी हां मटकामैन,उसके पास अपनी मटका वैन है और वो दिल्ली की सड़कों पर अपने मटका वैन में 700 लीटर पानी लेकर प्यासों के गले को तर करता है।

पढ़िए मटका मैन की बेहद दिलचस्प कहानी

ये कहानी है बेंगलुरू के अलगरत्नम नटराजन की। 70 साल के नटराजन फिलहाल दिल्‍ली में रहते हैं। लंदन में अपना बिजनेस छोड़कर वो भारत लौटे और साउथ दिल्‍ली के कई इलाकों में गरीब और जरूरतमंद लोगों की प्‍यास बुझाते हैं। इसके लिए उन्होंने अलग-अलग इलाकों में सैकड़ों मटके लगवाए हैं। ये लोगों को पानी मुफ्त में पिलाते हैं। नटराजन खुद को कोई सोशल वर्कर मानकर ये काम नहीं करते बल्कि इसे मानवता के प्रति जिम्मेदारी मानकर करते हैं।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम भूल गए हैं कि पानी जैसी चीजें तो हमारे लिए सुलभ होनी चाहिए। आलम ये है कि आज अगर किसी के जेब में पैसे न हों तो उसे प्यास से तड़पना पड़ सकता है लेकिन लोगों की प्यास की तड़प को शांत करने के लिए दिल्ली का एक 70 साल का इंसान हर रोज सुबह 4.30 बजे उठता है और फिर दक्षिणी दिल्ली समेत कई इलाकों में रखे 100 से ज्यादा मटकों में पानी भरता है।

नटराजन ने अपनी जिंदगी के 40 साल लंदन में बिताए हैं। वो अपनी बहन के साथ टूरिस्ट वीजा पर यूके गए थे और फिर काम मिलने पर वहीं बस गए। वहां पर उन्होंने बिजनेस शुरू कर दिया। दस साल पहले पता चला कि उन्हें कैंसर है। इसके बाद वो  वापस भारत लौट आए। उनका कैंसर तो ठीक हो गया लेकिन इसके बाद उन्हें लगा कि दिल्ली के लिए कुछ करना चाहिए। उन्होंने कैंसर अस्पताल और अनाथालयों में जाकर लोगों की सेवा की। फिर चांदनी चौक में भूखों को खाना खिलाया। जिन लोगों के पास अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं होते थे नटराजन ने उन्हें पैसे दिए। 2014 की गर्मियों में उन्हें अहसास हुआ कि राह चलते काफी लोगों को प्यास लगती है, लेकिन ऐसा कोई इंतजाम नहीं है जहां से वो अपनी प्यास बुझा सकें। उन्होंने सोचना शुरू किया कि कैसे लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। नटराजन ने शुरू में दक्षिणी दिल्ली के पंचशील पार्क, ग्रीन पार्क, आईआईटी, चिराग दिल्ली जैसी जगहों में 15 मटका स्थापित किए और रोज सुबह वो उनमें जाकर पानी भरने लगे। वो तीन प्राइवेट बोरवेल से पानी भरते हैं, जिनके मालिक उनके काम से काफी प्रभावित हैं और मुफ्त में पानी देते हैं।इस काम को बढ़ाने के लिए नटराजन ने एक कार खरीदी और उसे मोडिफाई करवाकर उसमें जेनरेटर लगवाया और 500 और 200 लीटर के दो टैंक भी फिट करवाए। अब वो अपने वॉलेन्टियर के साथ दिन भर में चार से पांच चक्कर लगाते हैं और सभी मटकों में पानी भरते हैं। उनके इस काम में हाउस हेल्प, बगीचे की देखभाल करने वाले जैसे लोग रहते हैं। वो मटकों पर अपना नंबर भी लिख के रखते हैं, ताकि खाली होने पर लोग उन्हें फोन करके सूचना दे सकें। सूचना मिलने के बाद वो खाली मटकों को तुरंत भरवाते हैं। इन मटकों में हर रोज लगभग 2,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।

मटकों के अलावा नटराजन ने जगह-जगह 100 साईकिल पंप भी लगवा रखे हैं ताकि गरीब लोग 24 घंटे हवा भरवा सकें। उनकी बेबसाइट के अनुसार वो गरीबों और मजदूरों में हर हफ्ते 40 से 50 किलो फल भी वितरित करते हैं। नटराजन अपनी जिंदगी के पन्नों को पलटते हुए कहते हैं कि 

मैं लंदन में एक खुशहाल जिंदगी गुजार रहा था, तभी मेरी लाइफ में एक ऐसा मोड़ आया और मैं सबकुछ छोड़कर अपने देश वापस आ गया। ये उन दिनों की बात है, जब मैं लंदन में रहता था। एक अच्‍छी जिंदगी गुजार रहा था। बिजनेस बहुत अच्‍छा चल रहा था। गिफ्ट और नॉवेल शॉप थी मेरी। दिन भर काम और शाम को पत्‍नी और बेटी के साथ वक्‍त बिताता था। कह सकते हैं कि मैं एक ऐसी लाइफ जी रहा था, जिसे जीने की लोग ख्‍वाहिश रखते हैं। मगर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि मैंने दोबारा अपने देश वापस आने के बारे में सोच लिया। दरअसल मुझे कोलेन कैंसर हो गया था। उसके बाद तेज रफ्तार वाली जिंदगी अचानक थोड़ी ठहर सी गई। एक लंबा वक्‍त इलाज में गुजरा। उसके बाद ही मैंने तय कर लिया मुझे वापस अपने देश लौटना है लेकिन यहां आकर मैं अपने शहर बेंगलुरु में नहीं रहा, बल्‍कि अपनी पत्‍नी के घर यानि कि दिल्‍ली आ गया। साउथ दिल्‍ली में मैं पत्‍नी और अपनी सास के साथ रहने लगा था। एक ठीक-ठाक सेविंग्‍स की वजह से लाइफ बहुत आराम से चल रही थी। एक दिन की बात है, मैं लोधी रोड से गुजर रहा था, मैंने स्‍काउट हाउस के बाहर वाटर कूलर से एक रिक्‍शे वाले को पानी पीते हुए देखा बस यहीं से देखकर मेरे दिमाग में एक आइडिया कौंधा कि क्‍यों न लोगों की प्‍यास बुझाने के लिए मैं कुछ करूं। इसलिए मैंने अपने घर के बाहर एक वाटर कूलर लगा दिया ताकि उस रास्ते से गुजरने वाले राहगीर अपनी प्यास बुझा सकें। फिर धीरे-धीरे घर के बाहर से शुरू हुआ ये सफर रफ्तार पकड़ने लगा। ये सब देख कर मेरे परिवार वाले बहुत खुश थे हालांकि पत्‍नी थोड़ी डरी हुईं थी कि ये सब मैं क्‍या कर रहा हूं लेकिन उन्‍होंने भी मुझे कभी रोका नहीं।

मेरी इस पहल को और मजबूती तब मिली, जब एक बार मेरे वाटर कूलर से पानी भर रहे एक गार्ड से मैंने पूछा कि वह पानी लेने के लिए इतनी दूर यहां क्यों आया है, जहां काम करता है वहां क्यों नहीं पानी लेता है। उसने बताया कि वहां उसको पीने के लिए पानी नहीं दिया जाता है। ये जवाब सुनकर मैं स्‍तब्‍ध रह गया कि कैसे लोग अच्‍छा और साफ पानी पीने के लिए तरस रहे हैं, बस इसके बाद से ही मैंने अपने इरादों को लेकर खुद को और मजबूत किया। 

मगर वाटर कूलर लगवाने में बहुत खर्चा आता,  मैंने इसका रास्‍ता निकाला कि मिट्टी के मटके रखवा देता हूं। मैंने जब यह काम शुरू किया था तब लोगों को लगता था कि सरकार ने उन्हें इस काम के लिए नियुक्त किया है लेकिन मुझे न तो सरकार से और न ही किसी संस्था से इस काम के लिए मदद मिलती है। अपनी जेब से ही पूरा खर्च उठाता हूं। इस काम को देखकर अब कुछ लोग मेरे साथ जुड़ चुके हैं और मदद कर रहे हैं।

नटराजन ने matkaman.com नाम से एक वेबसाइट भी बना रखी है। उनका मानना है कि हमें जीवन में दूसरों की मदद करते रहना चाहिए। अगर हम किसी की मदद नहीं कर सकते तो हमें किसी को चोट तो बिल्कुल नहीं पहुंचाना चाहिए। 


 

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