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मध्यप्रदेश के छोटे से गांव के किसान को देश का सर्वोच्च सम्मान

mayankshukla 3 years ago
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मिलिए खेती को लोकजीवन से जोड़कर पद्मश्री पाने वाले बघेली बोली के कवि बाबूलाल से

ये हैं मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गांव पिपिथौराबाद में रहने वाले बाबूलाल दाहिया,जिन्हें मिला है देश का सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री। बाबूलाल को यह सम्मान देसी बीजों को सहेजने और नित नए प्रयोग के जरिए जैव विविधता के क्षेत्र में सराहनीय काम करने के लिए दिया जा रहा है। 

परंपरागत धान की विलुप्त होती कई किस्मों को नई जिंदगी देने और खेती को लोकजीवन से जोड़ने वाले बाबूलाल वैसे तो बघेली के जाने माने कवि हैं, लेकिन उन पर देशी बीज बचाने का जुनून कुछ इस कदर सवार हुआ कि उन्होंने प्रदेश के चालीस जिलों की यात्रा कर दो सौै किस्म के देशी बीज को संग्रहित और संरक्षित करने का कारनामा कर दिखाया।बाबूलाल दाहिया 75 साल की उम्र में भी सक्रिय किसान हैं और सोशल मीडिया पर भी बेहद सक्रिय रहते हैं। उनके पास 8 एकड़ जमीन है जिसमें वह जैविक खेती करते हैं। बाबूलाल सरकारी मुलाजि‍म रहे। डाक विभाग में पोस्ट मास्टर थे, लोक साहित्य में भी रुचि थी। उन्हें अहसास हुआ कि जैसे लोकगीत और लोक संस्कृति विलुप्त हो रही है, वैसे ही लोक अन्न भी लुप्त हो रहे हैं, तबसे उन्होंने इन्हें सहेजना शुरू कर दिया। उनके पास अब देशी धान की 130 किस्मों का खजाना है। वो हर साल इन्हें अपने खेत में बोते हैं और उनका अध्ययन करते हैं। 

साल 2015 में केवल 400 मिलीमीटर बारिश हुई और सूखे से फसलें बर्बाद हो गईं, पर बाबूलाल के खेत में लगी लगभग 30 किस्मों पर सूखे का भी कोई असर नहीं हुआ। उनकी पैदावार हर साल की तरह ही रही। इससे आसपास के किसान उनके लोकविज्ञान से खासे प्रभावित हुए, अब 30 गांवों के किसान उनके साथ मिलकर धान और मोटे अनाज (कोदो, कुटकी, ज्वार) की खेती कर रहे हैं। बाबूलाल को यह ज्ञान कहीं बाहर से प्राप्त किया हुआ नहीं है, उनका मानना है कि यह लोकजीवन का विज्ञान है।   

शिवराज सरकार को लौटाया था किसान कर्मठ पुरुस्कार

इससे पहले भी जैव विविधता पर किए गए उत्कृष्ट कामों के लिए बाबूलाल को प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के कई पुरुस्कार मिल चुके हैं। बीते साल तत्कालीन शिवराज सरकार ने उन्हें किसान कर्मठ पुरुस्कार देने का ऐलान किया मगर बाबूलाल ने यह कहते हुए सम्मान लेने इनकार कर दिया कि सूबे के किसान परेशान हैं लिहाजा वो इस सम्मान के हकदार नहीं है। 

बाबूलाल का मानना था कि जिस प्रदेश में किसानों की हालत इतनी ज्यादा खराब हो, वहां ऐसे अवार्ड लेकर क्या हासिल किया जा सकता है ?

 

पद्मश्री सम्मान पाने की खुशी बाबूलाल के चेहरे पर साफ झलकती है। उनकी इस उपलब्धि पर परिवार और गांव के लोग भी खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। वहीं बाबूलाल का कहना है कि किसानों की उन्नति के लिए शासन-प्रशासन को भी ध्यान देना चाहिए।


बाबूलाल को किसानी अपने पिता से विरासत में मिली तो वो अपनी विरासत अपने पोते को देना चाहते हैं। पोता भी दादाजी की राह पर चलने के लिए तैयार है और इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए उसने प्रशिक्षण लेना भी शुरू कर दिया है।

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