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मिलिए ‘हुक्का मुक्त हिंदुस्तान’ की बुलंद बुनियाद रखने वाले आनंद सबधाणी से

mayankshukla 2 years ago
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जिंदगी एक सफर है और जवानी इस सफर का सबसे अहम पड़ाव। मगर अफसोस जोश और जुनून से भरपूर ये जवानी आज आसमां की उड़ान भरने की बजाए नशे की गुलामी में जकड़ी हुई है। यंग इंडिया के सारे अरमां हुक्का और सिगरेट के धुएं में धूमिल हो रहे हैं । आज की हाइटेक जिंदगी में हुक्का तो स्टूडेंट्स के बीच स्टेट्स सिंबल बन गया है क्योंकि दौड़ती-भागती इस दुनिया में दिनभर के बिजी शेड्यूल के बीच पैरेंट्स के पास इतना वक्त ही कहां बचा है कि वो अपने बेटे की बुरी आदतों का पता लगा सकें। मगर मेरे शहर में एक शख्स ऐसा है जो हर वक्त इस बुराई को जड़ से मिटाने और हिंदुस्तान को हुक्का मुक्त बनाने की जद्दोजेहद में लगा रहता है। उसने जंग छेड़ रखी है और यंगस्टर्स को नशे की गुलामी से आजाद कराना ही अपने जीवन का मकसद बना लिया है।

”मेरी कोचिंग में एक लड़की पढ़ती थी। सालभर कोचिंग के बाद भी उसकी नौकरी नहीं लग रही थी, मैंने सोचा शायद हमारे पढ़ाने के तरीके में कोई कमी रह गई होगी। हमने अपना डायरेक्शन बदला, पूरी कोशिश की लेकिन फिर भी वो परीक्षा में पास नहीं हो सकी। फिर एक दिन मुझे वही लड़की भोपाल के 10 नंबर मार्केट में दिखी एक दम अलग अंदाज में। कुछ पल के लिए मुझे यकीन नहीं हुआ ये वही लड़की है जो बंद बाल में शूट पहनकर कोचिंग आती है। मैंने उसका पीछा किया,वो एक बिल्डिंग के टॉप फ्लोर पर जा रही थी। उसके पीछे सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते जब मैं छत पर पहुंचा तो वहां का नजारा देखकर मेरी आंखे खुली की खुली रह गई। लाल-लाल डिम लाइट, छोटी-छोटी झोपड़ियां, छोटे-छोटे कमरे और चारों तरफ से हुक्का के गुड़गुड़ाने की आवाज। एक अलग ही दुनिया थी शायद वो। वो लड़की भी अपने ग्रुप (4 लड़के और 3 लड़कियां) के साथ इसी दुनिया में मस्त थी। उनके ग्रुप में एक लड़की शायद नई थी, वो बार-बार हुक्का पीने से मना कर रही थी लेकिन उसके दोस्त उसे जबरन पिलाने पर अड़े थे। खैर उस दिन तो मैं वहां से लौट आया  बिना कुुछ कहे लेकिन अगले दिन अपनी कोचिंग में मैने बच्चों से हुक्का छोड़ने की गुजारिश की तो तीन हजार स्टूडेंट्स में से 2900 ने मेरा विरोध किया और उसे नशा मानने से ही इनकार कर दिया। मैनें भी सोचा मेरा काम तो छात्रों को पढ़ाना है, समाजसेवा नहीं। लिहाजा मैनें छात्रों को समझाने की बजाए खुद को ही समझाकर  फिर से कोचिंग के काम में जुट गया।

इसी बीच एक दिन मीडिया में खबर आई की राजधानी भोपाल के एक हुक्का लांज में  गलत काम करते हुए पांच लड़कियां और कुछ लड़के पकड़े गए हैं। उनमें से एक लड़की वो भी थी (मेरी कोंचिंग में पढ़ने वाली), जिसे मैनें कुछ महीनों पहले ही एक हुक्का लांज में देखा था। इस घटना को सुनकर मैं सहम गया,सवालों का बवंडर अंदर ही अंदर मुझे बेचैन करने लगा, आखिर क्यों उस रोज मैंने उस लड़की को रोका नहीं, गलत रास्ते पर जाते देखने के बाद भी क्यों उसे टोका नहीं, काश ! कम से कम उसके घरवालों को तो बता दिया होता, आखिर कुछ तो किया होता आनंद ”

ये सिर्फ एक घटना नहीं बल्कि एक ऐसा अनुभव था, एक ऐसा अहसास था जिसने आनंद की अंतर्आत्मा को झंकझोर कर उनकी जिंदगी का मकसद ही बदल दिया। एक काश! ने उन्हें नशे के खिलाफ अकेले ही बड़ा आंदोलन खड़ा करने का साहस दिया। यूं तो मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में रहने वाले आनंद  का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है,उनकी सबधाणी कोचिंग का एक लंबा सुनहरा इतिहास है,जिसके हर पन्ने मेहनत,कामयाबी और पीढ़ी दर पीढ़ी समाजसेवा के शब्दों से भरे पड़े हैं।। मगर आनंद के लिए सवाल अब सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा का नहीं रहा, हुक्का के खिलाफ जंग का जुनून अब आनंद का फितूर बन चुका था। कई रसूखदारों ने अपने-अपने तरीके से आनंद को रोकने की कोशिश भी की लेकिन आनंद की लड़ाई जारी रही। शिक्षा के जरिए छात्रों की जिंदगी को  रोशन करने वाले आनंद अब ड्रग्स की अंधेरी दुनिया के दलदल से युवाओं को बचाने के लिए खुलकर सड़क पर उतर चुके थे। 

अगले ही दिन आनंद कलेक्टर से मिलने पहुंचे और शहर में चल रहे 127 से ज्यादा हुक्का लांज की पूरी कुंडली खोलकर कार्रवाई की मांग की। कलेक्टर ने भी आनंद की शिकायत को गंभीरता से लिया और एक ही दिन में तीस से चालीस हुक्का लांज पर छापा मार बड़ी तादाद में हेरोइन जैसे नशीले ड्रग्स बरामद किए। लेकिन आनंद यहीं नहीं रुके उन्हें मालूम था इस बुराई को जड़ से मिटाना इतना आसान नहीं है लिहाजा उन्होने हुक्का लांज पर कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक जागरुकता का भी बीड़ा उठाया। नुक्कड़ नाटक और रैली सभाओं के जरिए शहरभर में लोगों को समझाने की कोशिश की गई। 

शिक्षक दिवस के दिन आनंद ने अपने शिष्यों से गुरू दक्षिणा में नशे को हमेशा के लिए त्यागने का वचन मांगा और उनके साथियों को भी इस नशे से दूर रखने की समझाइश देने का संकल्प दिलाया।


धीरे-धीरे आनंद की मुहिम रंग ला रही,एक खामोश शुरूआत का असर भी साफ दिख रहा है। अब आनंद के साथ हजारों बच्चे और सैकड़ों समाजसेवी संस्थाएं जुड़ चुकी हैं। हाल ही में आनंद ने शव यात्रा निकालकर हुक्के को अंतिम विदाई भी दी। खास बात ये रही कि आनंद ने पहली बार जिस जगह पर उस लड़की को देखा था, जहां से ‘हुक्का मुक्त हिंदुस्तान’ आंदोलन की शुरूआत हुई, वहीं से हुक्के की अर्थी उठाकर उसे अंतिम विदाई भी दी गई।

वाकई किसी ने सच कहा है हिंदुस्तान युवाओं का देश है और यहां के युवा ही इस देश को बदलने का माद्दा रखते हैं। आनंद सबधाणी बदलाव की लौ लेकर चलने वाले उन्हीं विभूतियों में से एक हैं। इस देश की नींव कहे जाने वाले युवाओं को सही राह में लाने के इस सराहनीय प्रयास और समाज सेवा के अद्भुत जज्बे के लिए पॉजिटिव इंडिया आनंद सबधाणी जी को सलाम करता है।


आनंद का एक ही सपना, ‘हुक्का मुक्त हिंदुस्तान’ हो अपना

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