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90 साल की लतिका जी से सीखिए क्या कहलाता है पैशन !

mayankshukla 4 years ago
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कहते हैं मजबूत इरादों पर उम्र की दीमक नहीं लगती। अगर ठान लें तो कुछ भी नामुमकिन नहीं है, फिर उम्र तो महज एक आंकड़ा भर है और इस बात को सच साबित किया है 90 साल की लतिकाजी ने। जिन्होंने उम्र की परवाह किए बगैर अपने संजोए सपनों में हकीकत के रंग भरते हुए एक ऑनलाइन शॉप खोली है। जहां वो पुराने कपड़ों से खूबसूरत बैग बनाकर बेचती हैं। बैग खरीदने वाले उनके ग्राहक विदेशों तक फैले हैं। लतिका जी अपने पैशन को पूरा करने की तमन्ना रखने वाले लोगों के लिए आज सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। 

नब्बे की हो चलीं लतिका जी अपनी 64 साल पुरानी सिलाई मशीन की मदद से पुरानी साड़ियों व कपड़ों को आकर्षक हैंडबैग या  पोटली बनाकर नई कहानियां गढ़ रही हैं। डिजिटल दुनिया में नई-नई लतिका की अपनी खुद की वेबसाइट है जिसका नाम है, ‘लतिकाज बैग्स’।  इस वेबसाइट के जरिए उन्हें न्यूजीलैंड, ओमान और जर्मनी जैसे देशों से बैग्स के ऑर्डर मिल रहे हैं। कई बार तो उन्हें इतने बैग्स के ऑर्डर मिल जाते हैं कि वह उसे पूरा नहीं कर पातीं। लतिका जी द्वारा बनाए जाने वाले पोटली बैग की खासियत यह है कि इनकी कीमत बहुत अधिक नहीं होती और इसे 500 से लेकर 1500 रुपये के बीच खरीदा जा सकता है।


 लतिका जी के पति और बेटे, दोनों की ही नौकरी ऐसी रही कि उन्हें देश के ज्यादातर शहरों को देखने का मौका मिला। भारत के अधिकतर कोनों को जानने-समझने की यात्रा उनके जीवन का हिस्सा रही। अपने जीवन की इसी यात्रा में उन्होंने हर जगह से खूबसूरत साड़ियाँ, कुर्ते, और अलग-अलग तरह के कपड़ों के रूप में यादें संजोयी हैं और हर एक याद की बहुत ही अलग सी कहानी हैं उनके पास। वो कहती हैं ये वो कपड़े हैं, जिनमें सालों की विरासत है।


जिंदगी के 90वें पड़ाव में पहुंचकर भी पूरी तरह से सक्रिय जीवन जीने वाली लतिकाजी का जन्म असम के धुबरी जिले में हुआ था। उनके पति कृष्ण लाल चक्रवर्ती सर्वे ऑफ इंडिया में अधिकारी थे। इस नौकरी में उन्हें कई सारे राज्यों में जाना पड़ता था। इसी बहाने लतिका भी कई जगहों पर हो आती थीं। बहुत ज्यादा सफर करने की वजह से लतिका ने कई जगहों के कपड़ों को एक्सप्लोर किया और शौकिया तौर पर सिलाई की शुरुआत की। लेकिन बदलते वक्त के साथ बच्चे बड़े होते गए और उनका सिलाई का शौक थम सा गया। इसी बीच उनके पति कृष्ण उनका साथ छोड़ गए और लतिका अकेली हो गईं। इसके बाद वो अपने बेटे के साथ रहने लगीं जो कि इंडियन नेवी में कैप्टन है। जब बेटा ड्यूटी पर होता था तो लतिका जी घर पर अकेली होतीं। उन्होंने सोचा कि क्यों न फिर से सिलाई शुरू की जाए।कुछ साल पहले ही लतिका जी ने छोटे-छोटे पोटली बैग बनाने शुरू किए। पुराने कपड़ों जैसे साड़ियां औऱ कुर्तों से बनाए गए ये छोटे बैग जरूरत में तो काम आते ही हैं साथ ही इसे एथनिक कपड़ों के साथ एसेसरीज के साथ भी रखा जा सकता है। शुरूआत में लतिका जी ऐसे बैग्स बनाकर अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को देती थीं। अभी तक उन्होंने 500 से भी ज्यादा ऐसे बैग्स बना लिए हैं।


इस बढ़ती उम्र में लतिका साड़ियों से खुद बैग्स बनाती हैं और दुनिया तक पहुंचाती हैं। बैग के साथ-साथ वो पोटली भी बनाती हैं, जिनमें पुरानी साड़ियों व कुर्तों का इस्तेमाल होता है। उनकी ऑनलाइन शॉप पर बिकने वाली सभी सामग्री लतिका द्वारा ही बनी होती है।


लतिका जी की ऑनलाइन साइट, उनके पोते जॉय चक्रवर्ती का आइडिया था। जिसने अपनी दादी के हाथों की कलात्मकता को और भी लोगों तक पहुंचाने के बारे में सोचा। लिहाजा ‘लतिकाज बैग्स’ नाम से एक वेबसाइट और ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी शुरू की गई। जहां लतिका जी के हाथों से बनाए गए बैग और माडर्न पोटली को देखा व खरीदा जा सकता है। आज देश के अलग-अलग भागों से लोग उनके काम को सराह रहे हैं और उनके बनाये पोटली बैग खरीद रहे हैं।उम्र के आखिरी पड़ाव पर अपनी इन यादों को कला के जरिये बांट रहीं लतिका जी को हमेशा से ही सिलाई करने का शौक रहा है। वो हमेशा से पुरानी चीज़ों पर क्रियात्मक डिज़ाइन करके उन्हें नया रूप देती रही हैं और आज उन्होंने अपनी इसी प्रतिभा को फिर से सहेजने की सोची है। बेशक, इस उम्र में भी लतिका जी का अपनी कला और शौक के प्रति प्यार काबिल-ए-तारीफ़ है।

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