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वैसे तो हिंदुस्तान में भक्तों की कमी नहीं हैं, लेकिन देशभक्ति के असल मायने क्या हैं? सच्चा देशभक्त कौन है? सिर्फ सोशल मीडिया में वंदे मातरम लिख देना ही देशभक्ति है या फिर साल में सिर्फ एक बार झंडा फहराकर शहीदों की फोटो पर फूलमाला चढ़ाना ही राष्ट्र प्रेम का पैमाना है? अगर यही देशभक्ति है तो फिर आप उस शख्स को क्या संज्ञा देंगे जिसने हजारों शहादत को आज भी जिंदा रखा है।   

हिंदुस्तान आज आजाद है और हर ओर आजादी की 71वीं वर्षगांठ का जश्न है। लेकिन क्या आपको पता है इस जश्न के पीछे मातम की अनगिनत कहानियां दफ्न हैं। आपको और सरकार को तो शायद ये भी नहीं पता होगा कि जिन शहीद सैनिकों के कारण आप आज आजाद हैं, उनके घरवाले किन मुसीबतों के जाल में कैद हैं। लेकिन इस देश में एक ऐसा शख्स है जो बीते 19 बरसों से देश के लिए कुर्बान हुए शहीदों के परिजनों का ख्याल रख रहा है और खत लिखकर वतन की खातिर मर मिटने वाले वीर सपूतों के प्रति आभार व्यक्त कर रहा है। इस सच्चे देशभक्त के पास तकरीबन 38,000 शहीदों का ब्यौरा है, जिनमें उनके नाम, यूनिट नंबर, उनका पता आदि  की डिटेल मौजूद है।यही नहीं, वो शहीद हुए सैनिकों के परिवार को अब तक चार हजार से ज्यादा खत भी लिख चुके हैं।

मध्यमवर्गीय परिवार और सीमित आमदनी होने के कारण यह इतना आसान नहीं है। मेरा परिवार सोचता है कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन मैने भी यह दृढ-संकल्प कर लिया है कि जब तक सांस चलेगी, तब तक अपने शहीदों को याद करता रहूंगा और उनके परिवार को पत्र लिखता रहूंगा।

ये शब्द और ये संकल्प है 38 वर्षीय जितेंद्र सिंह का, जो सूरत के एक निजी फर्म में सुरक्षा गार्ड हैं। जितेंद्र पिछले उन्नीस सालों से देशभर में शहीदों के परिजनों का शुक्रिया अदा करने के लिए पोस्टकार्ड लिखते हैं, ताकि देश के लिए न्यौछावर होने वाले सूरवीरों को श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें, साथ ही उनके घरवालों को यह अहसास दिला सकें कि कोई है, जो उनके बारे में सोचता है। वो अपने पत्रों में कबूल करते हैं कि अगर इस देश के नागरिक अमन चैन से हैं, तो उन शहीदों की वजह से हैं।

शहीदों के परिवार को खत लिखते हुए इस देश-भक्त को लगभग 18 साल हो चुके हैं। पोस्टकार्ड सहित अन्य खर्च भी वह अपनी जेब से ही करते हैं। कभी-कभी उनकी महीने की 10,400रु की सैलरी महीने भर भी नहीं चल पाती, लेकिन उनका पोस्टकार्ड खरीदकर शहीदों की फैमिली को चिट्ठी लिखने का सिलसिला कभी नहीं रुकता। उनको इन पत्रों के बदले में जवाब भी आते हैं, जो जितेंद्र के लिए किसी मुराद पूरी होने से कम नहीं है।

जितेंद्र का एक ही मकसद है कि वह उन लोगों तक अपना आभार पहुंचा सकें जिन्होनें भारत और भारतीयों के लिए अपना बेटा, पति या पिता खोया है।

जितेंद्र राजस्थान के भरतपुर जिले के कुटखेड़ा गांव से हैं। उनके परिवार की कई पीढ़ियों ने भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा की है लिहाजा वो भी आर्मी में जाना चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं हो सका तो उन्होंने राष्ट्र की सेवा का दूसरा रास्ता चुन लिया। दरअसल कारगिल वॉर के वक्त जितेंद्र के पिता भी आर्मी में थे और वो उस वक्त शहीद हुए अपनी कंपनी के लोगों की कहानी जितेंद्र को सुनाया करते थे। यहीं से जितेंद्र की रगों में राष्ट्रप्रेम का लहू दौड़ने लगा और उन्होंने शहीद जवानों के परिवारवालों को लेटर लिखने का सिलसिला शुरू किया। 

जितेंद्र ने अपने बेटे हरदीप का नाम भी साल 2003 में जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों से लड़ते-लड़ते शहीद हुए सैनिक हरदीप सिंह से प्रेरित होकर रखा है। जितेंद्र शहीद हुए सैनिकों के परिजनों को फोन करके यह याद दिलाते रहते हैं कि भले ही देश और सरकार उनके बेटे की शहादत को भूल जाए लेकिन गुजरात में एक शख्स है जो आपके बेटे के बारे में हमेशा सोचता रहता है। वाकई जितेंद्र की ये पहल आंख खोलने वाली है और उनके इस महान काम के लिए पॉजिटिव इंडिया उन्हें तहे दिल से सलाम करता है।

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