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मनाली के आगे दुर्गम पहाड़ों के ठंडे रेगिस्तान में, समुद्र तल से लगभग 14 हजार फीट की ऊंचाई पर जहां दूर-दूर तक सिर्फ सन्नाटा पसरा होता है, इस वीराने में इंसान को तलाशती आंखे भी जब जबाव दे जाती हैं, ऐसे में बर्फबारी और खराब मौसम में फंसे सैलानियों के लिए फरिश्ते का काम करता है देश का सबसे दुर्लभ और अद्भुत ‘चंद्रा ढाबा’। 

मनाली से 114 किलोमीटर दूर स्पीति और लाहुल को जोडऩे वाले कुंजुम दर्रे पर घोर एकांत में बना ये ढाबा राहगीरों और पर्यटकों के लिए किसी पांच सितारा होटल से कम नहीं है। 13084 फीट की ऊंचाई पर बना ये ढाबा लजीज व्यंजन के लिए नहीं बल्कि लोगों की जान बचाने के लिए जाना जाता है। बातल के काजा और कोकसर के बीच बने इस चंद्रा ढाबे को 65 साल के दोरजे बोध अपनी पत्नी हिशे बोध के साथ मिलकर चलाते हैं। चाचा-चाची के नाम से मशहूर ये दंपति उस जगह तिरपाल लगाकर रहते हैं जहां सर्दी-गर्मी में जीना मुश्किल होता है। कोई भी मुसीबत हो, यहां सबकी मदद के लिए 65 साल के दोरजे ही सबसे पहले आगे आते हैं। ये उन लोगों के लिए जीवनरक्षक हैं, जो बर्फबारी और खराब मौसम में यहां फंस जाते हैं। ये उन्हें खाने-पीने से लेकर मुफ्त में दवा और रहने के लिए जगह भी देते हैं। पिछले 45 सालों से इस सूनसान और वीरान इलाके में ढाबा चला रहे दोरजे और हिशे अब तक सैकड़ों भूले-भटके लोगों की जान बचा कर उन्हें नई जिंदगी दे चुके हैं।दोरजे बताते हैं कि वो अपनी पत्नी के साथ हर साल अप्रैल महीने में मनाली से पैदल ही बातल के लिए निकल जाते हैं और सबसे पहले यहां आकर रहना शुरू कर देते हैं। उनके पास राेजाना मनाली और काजा घूमने आने वाले टूरिस्ट अपनी कई दिक्कतें और बीमारियां लेकर आते हैं, जिन्हें वो जरूरत के हिसाब से मदद और मौजूद दवाएं देते हैं।

दोरजे बौद्ध और उनकी पत्नी हिशे का छोटा सा चन्द्रा ढाबा बीते 45 साल से नाउम्मीदी के पहाड़ों के बीच उम्मीद का दीपक जलाए हुए है। दोरजे बौद्ध और उनकी पत्नी न केवल पर्यटकों को चाय-खाना देकर उनकी थकान दूर करते हैं बल्कि सुलझे हुए गाइड की भूमिका में मुफ्त में उन्हें सही राय भी देते हैं। बर्फबारी के दौरान कुंजुंम दर्रे में फंसने वाले सैलानियों व राहगीरों के लिए यह दम्पति किसी फरिश्ते से कम नहीं है।


बड़ा शिगरी ग्लेशियर के आसपास वाले इस इलाके में सैलानियों की राह आसान नहीं है। लेकिन दोरजे और हिशे पिछले 45 सालों से इस वीरान इलाके में राहगीरों की राह आसान बनाने का काम कर रहे हैं। दोरजे कहते हैं कि लोगों की मदद करके उन्हें सुकून  मिलता है।

दोरजे मौसम की सटीक जानकारी रखते हैं। कब बर्फ गिरेगी और कब धूप खिलेगी, वे सिर्फ बादल देखकर ही बता देते हैं। समाजसेवा की भावना से भरी ये दंपत्ति कुंजुम दर्रे में अचानक होने वाली बर्फबारी में फंसने वाले सैलानियों को सहारा देना अपने जीवन का मकसद मान चुकी है। जिसके चलते उन्हें कई बड़े अवार्ड भी मिल चुके हैं।

1998 में बचाई थी 106 पर्यटकों की जान

कुंजुम दर्रा मनाली से करीब 120 किलोमीटर दूर है। वर्ष 1998 में बातल पर अचानक हुई बर्फबारी में 106 पर्यटक फंस गए थे। इनमें 37 विदेशी पर्यटक भी शामिल थे। उस वक्त 4 फुट से अधिक बर्फबारी हुई थी, जिसके चलते कई सैलानियों की जिंदगी खतरे में पड़ गई थी। मुसीबत की इस घड़ी में दोरजी और हिसे ने सैलानियों को मौत के मुंह से बाहर निकालकर 6 दिनों तक अपने पास रखा। उनके खाने से लेकर दवाईयों तक का इंतजाम किया और मौसम खुलने के बाद ही सकुशल वापस रवाना किया।इसी तरह जून, 2010 में कुंजुंम दर्रे पर 45 पर्यटक 8 दिनों तक फंसे रहे थे। इन पर्यटकों की भी इस दंपत्ति ने पूरी सहायता की थी। पर्यटकों को 8 दिन तक अपने पास रखा और फिर हेलिकॉप्टर से रेस्क्यू करवाकर यहां से वापस भेजा। 

दोरजे और हिशे को इस नेक काम के लिए कई सम्मान भी मिल चुके हैं। गोडफ्रे फिलिप्स ब्रेवरी की ओर से माइंड ऑफ स्टील स्पेशल अवॉर्ड, पल्स ऑफ इंडिया का ब्रेवरी अवॉर्ड, राजस्थान रॉयल्स क्लब और विदेशी क्लब से अवॉर्ड मिल चुके हैं।


नीचे देखें पहाड़ों के छोर पर बसे चाचा-चाची के नाम से मशहूर चंद्रा ढाबे की कुछ मनमोहक तस्वीरें

ढाबे के अंदर की तस्वीर

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