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‘पैसे पेड़ में लगते हैं क्या’…ये वाक्य जीवन में हर इंसान ने शायद हजारों बार सुना होगा और मेरी तरह ही हर किसी ने इसका जवाब न में दिया होगा। लेकिन पॉजिटिव इंडिया आपको आज एक ऐसी शख्सियत से मिलाने जा रहा है जिससे मिलने के बाद आपको भी यकीन हो जाएगा कि पेड़ों से पैसे उगाए जा सकते हैं।

रामचंद्र अप्पारी की अनसुनी कहानी

पॉजिटिव इंडिया की कोशिश हमेशा आपको हिंदुस्तान की उन गुमनाम हस्तियों से मिलाने की रही है जिन्होंने अपने नए तरीके से बदलाव को एक नई दिशा दी हो और समाज के सामने संभावनाओं की नई राह खोली हो।  इसी सिलसिले में आज हमको एक ऐसे पर्यावरण प्रेमी से मिलाने जा रहे हैं जिसने न सिर्फ पेड़-पौधों और हरियाली को उजड़ने से बचाने का स्थाई और  करिश्माई तरीका ढूंढा बल्कि पर्यावरण के बचाव को बिजनेस की शक्ल देकर करोड़ों का एम्पायर भी खड़ा किया।  हमारा भारत बदल रहा है, नए-नए एक्सप्रेस-वे, नई-नई सड़कें,चम-चमाते शहर विकास की कहानी बयान कर रहे हैं। लेकिन तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण ने हमारे सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया है। हम शहर के विकास को प्राथमिकता दें या पेड़ों को बचाएं? क्या विकास और अच्छा पर्यावरण एक साथ नहीं मिल सकता? 

हैदराबाद में रहने वाले रामचंद्र अप्पारी ने इन तमाम सवालों के जवाब तलाश लिए हैं। अब फ्लाईओवर या अपार्टमेंट के निर्माण के लिए पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं हैं क्योंकि अप्पारी ने पेड़ों को काटने की बजाए उन्हें रिलोकेट करने का नया रास्ता निकाला है। अपनी इस तकनीक को उन्होंने  ‘ट्री ट्रांसलोकेटिंग’ नाम दिया है। जिसके जरिए पेड़ों को काटने की बजाए जड़ समेत एक जगह से दूसरी जगह जैसे का तैसा शिफ्ट कर दिया जाता है। रामचंद्र अप्पारी इसी तकनीक की मदद से हैदराबाद में अब तक 7 हजार से अधिक पेड़ों को रिलोकेट कर चुके हैं।

38 साल के रामचंद्र अप्पारी की यह तकनीक पेड़ों को नया जीवन दे रही है।  उनकी कंपनी ‘ग्रीन मॉर्निग हॉर्टीकल्चर’ साल 2009 से ही पेड़ों को रिलोकेट करने के काम में लगी है। अप्पारी का मानना है कि शहरीकरण के लिए पेड़ों को हटाने की बजाए रिलोकेट किया जाना चाहिए।

रामचंद्र ने एग्रीकल्चर में मास्टर डिग्री लेने के बाद एग्री बिजनेस में एमबीए किया लेकिन कैंपस प्लेसमेंट में उनकी नौकरी एक प्राइवेट बैंक में लग गई। इस कंपनी में उन्होंने 4 साल काम किया लेकिन उनका मन यहां नहीं लगा और उन्होंने नौकरी छोड़ दी। कुछ नया और अलग करने की आग उन्हें अंदर ही अंदर जलाए जा रही थी। साल 2009 में रामचंद्र हैदराबाद से विजयवाड़ा जा रहे थे,तब उन्होंने देखा कि एक सड़क को चौड़ी करने के लिए हजारों हरे-भरे पेड़ों की हत्या की जा रही है। उन्होंने सोचना शुरू किया,कोई तो तरीका होगा इन पेड़ों को कटने से बचाने का। इसके बाद उन्होंने ट्रांसलोकेशन के बारे में पढ़ा,रिसर्च की और अपने ऑस्ट्रेलिया के एक दोस्त से भी इसके बारे में समझा। ट्रांसलोकेशन यानि पेड़ों को काटने की बजाए इसे दूसरे स्थान पर शिफ्ट करना एक विकल्प है क्योंकि शिफ्टिंग से एक ओर जहां पेड़ कटने से बच जाएंगे, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण संतुलन भी बना रहेगा।

मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए मिला पहला काम

हैदराबाद मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के अंतर्गत जब काम शुरू हुआ तब रामचंद्र की कंपनी ने प्रस्तावित ट्रैक पर आड़े आने वाले पेड़ों को काटने की बजाए रिलोकेट करने के लिए कहा। इस दौरान उनकी कंपनी ने 800 पेड़ों को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह लगाया। रामचंद्र बताते हैं कि उनकी कंपनी 90 प्रजातियों के 7000 पेड़ों को स्थानांतरित कर चुकी है। 

ट्री ट्रांसलोकेशन कोई नया तरीका नहीं है। मिस्र में 2000 ईसा पूर्व भी ये तरीका अपनाया जाता था। इस विधा में जिन पेड़ों को स्थानांतरित करना होता है उन्हें पहले छांट दिया जाता है। पेड़ की लगभग 80 फीसदी पत्तियां, तना और बाकी हिस्सा काटा जाता है। इसके बाद पेड़ के चारो ओर एक खाई को खोदा जाता है। इस खाई की गहराई पेड़ की उम्र के हिसाब से तय होती है। इसके बाद पेड़ की जड़ों में कुछ केमिकल्स लगाए जाते हैं और उन्हें टाट के बोरे में लपेटा जाता है। इसके बाद क्रेन से वह पेड़ उठाया जाता है और उसे ट्रेलर पर रख दिया जाता है। यहां से वह उस जगह पहुंचाया जाता है जहां उसे दोबारा लगाना हो। इसके बाद पेड़ को फिर से एक खाई में रखा जाता है और उसमें केमिकल्स डाले जाते हैं।

रामचंद्र के मुताबिक पेड़ को एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करने के दौरान काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। पेड़ के चारों ओर एक मीटर के दायरे में तीन फीट गड्ढा खोदा जाता है और पेड़ को जड़ सहित निकालकर दूसरी जगह ले जाकर लगाया जाता है। इस दौरान पेड़ की जड़ों पर ‘रूट प्रमोटिंग हार्वेस्ट’ केमिकल लगाया जाता है, ताकि पेड़ अपनी नई जगह पर पल-बढ़ सके।रामचंद्र कहते हैं कि एक पेड़ को शिफ्ट करने की कॉस्ट पेड़ की साइज, दूसरी जगह पेड़ को शिफ्ट करने की दूरी आदि फैक्टर्स पर निर्भर करती है। हालांकि इसकी शुरुआत 6 हजार रुपए से होती है, लेकिन हम एक पेड़ के लिए डेढ़ लाख रुपए भी चार्ज करते हैं। उनकी कंपनी सरकारी संस्थानों के लिए काम तो करती ही है साथ ही अगर कोई व्यक्तिगत रूप से ये काम कराना चाहे तो कंपनी उसके लिए भी तैयार रहती है। व्यक्तिगत रूप से काम कराने वाले ज्यादातर लोग पेड़ों को अपने फार्महाउस में ट्रांसलोकेट कराते हैं। ऐसा नहीं है कि ये कंपनी सिर्फ हैदराबाद में ही काम करती है, रामचंद्र का बिजनेस देश भर में फैला है। । पेड़ों को ट्रांसलोकेट करने का काम दिल्ली, बेंगलुरू, विशाखापट्टनम और देश के बाकी कई शहरों में भी होता है।

8 साल में खड़ा किया 2.5 करोड़ का कारोबार, हर महीने लगभग 5 लाख की कमाई

2009 में शुरू हुई रामचंद्र अप्पारी की कंपनी का बिजनेस अब करोड़ों में हो गया है। पिछले साल यानि 2017 में कंपनी का टर्न ओवर 2.5 करोड़ रुपए था। रामचंद्र कहते हैं कि टर्नओवर पर 25% तक प्रॉफिट हो जाता है। उनका दावा है कि इस तरह का बिजनेस देश में शुरू करने वाले वो पहले शख्स हैं।

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