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2008 में दिल्ली के लक्ष्मीनगर में मेट्रो की साइट पर एक दर्दनाक हादसा हुआ था, उसने कई मज़दूरों की जान ले ली, कईयों को जिंदगीभर का जख्म दे दिया तो किसी की जिंदगी बदल दी। हादसे की जगह जुटी भीड़ में तमाशबीनों के बीच एक ऐसा इंसान भी था, जो घायल मज़दूरों के पीछे-पीछे अस्पताल तक गया। वहां उसने देखा कि मजदूरों को मामूली मरहम-पट्टी करने के बाद ये कह कर वापस भेजा जा रहा है कि दवाएं नहीं हैं, खरीद के लाओ तो ही इलाज होगा। मजदूर मायूस होकर वापस चले गए लेकिन वो इंसान नहीं गया, वो वहीं रह गया और लौटा तो एक बिलकुल नए अवतार में नए संकल्प के साथ एक नया आदमी बनकर।

मिलिए गरीबों के मसीहा दिल्ली के मेडिसिन बाबा से

हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां आज इलाज के नाम पर ‘लीगल वाली’ अंधी लूट मची हुई है। जहां समाज का पैसे वाला तबका तो आसानी से महंगी दवाईयां और इलाज ले सकता है लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर दूसरा तबका बेतहाशा महंगे हो चले इलाज के इस दौर में कई दफा दवाओं के अभाव में दम तोड़ने को मजबूर हो जाता है। समाज के ऐसे ही वर्ग और लाचार लोगों के लिए मसीहा बनकर काम कर रहे हैं दिल्ली के 82 साल के बुजुर्ग ओमकार नाथ शर्मा जिन्हें जमाना अब “मेडिसिन बाबा” के नाम से जानता है।

केसर रंग का कुर्ता पायजामा पहने जब वे सड़कों पर निकलते हैं, तो लोगों के बीच कौतूहल बन जाते हैं। अपने कपड़ों पर बाबा ने गरीबों के लिए मुफ्त में दवा देने के बारे में लिखवा रखा है। कुर्ते पर फोन नंबर और ईमेल आईडी भी है, जिससे लोग उनसे आसानी से संपर्क कर सकें।


उम्र के जिस पड़ाव में अधिकतर लोग दूसरों की मदद के मोहताज हो जाते हैं उस पड़ाव में ओमकार नाथ शर्मा लोगों को मुफ्त जीवनदायिनी दवा बांट रहे हैं। पैरों से 40 फीसद दिव्यांग हैं, फिर भी रोजाना बसों में कई किलोमीटर का सफर करते हैं और सात  किलोमीटर पैदल चलकर लोगों से बची हुई दवा मांगकर इकट्ठा करते हैं और फिर गरीबों और जरूरतमंदो को यह दवा मुफ्त में बाटते हैं ताकि दवा की कमी में कोई जरूरतमंद दम न तोड़े। मेडिसिन बाबा पिछले 10 साल से ये अभियान बादस्तूर चला रहे हैं।

 सेवानिवृत्त ब्लड बैंक तकनीशियन ओंकार नाथ की जिंदगी 2007 में तब बदल गई जब घर वापस जाते वक्त उन्होंने एक एक्सीडेंट का नजारा देखा। उस एक्सीडेंट में कई लोग हताहत हुए और कई घायल ,ओंकार नाथ ने उनमें से कई को हॉस्पिटल पहुंचाया। वहां जाकर उन्हें पता चला कईयों का इलाज इसलिए रुका हुआ है कि दवाएं न हॉस्पिटल में हैं और न ही उन घायल लोगों के पास दवाई खरीदने के पैसे हैं। यह सब देखकर ओंकारनाथ का दिल दहल गया। वे सोच में पड़ गए कि यह कैसी विडम्बना है कि एक तरफ तो ज़रूरतमंद लोग दवाईयो के अभाव में अपनी जान गंवा रहे हैं और दूसरी तरफ अमीर और उच्च मध्यम वर्गीय लोग उन्ही दवाईयों को कूड़ेदान में फेंक रहे हैं।

वो घर की तरफ चल दिए लेकिन दिमाग में दवाओं की कमी के इलाज की दवाई खोजने की जुगत लगातार चल रही थी। घर पहुंचते-पहुंचते ओंकार नाथ से मेडिसिन बाबा बनने का सफर शुरू हो चुका था। उन्हें इस बात का इल्म अच्छी तरह से था कि लोग इस्तेमाल के बाद बची हुई दवाएं और उपकरण कचरे में फेंक देते हैं। अगर वो दवाएं जरूरतमंदों तक पहुंच जाएं तो इस समस्या का स्थाई समाधान हो सकता है।अब सबसे बड़ा चैलेंज लोगों तक जाकर दवाएं इकट्टठा करने का था। इसका बीड़ा भी उन्होंने खुद उठाया। उन्हें पता था काम मुश्किल है और विरोध भी होगा। ऐसा ही हुआ, विरोध की आवाज घर से ही आई और पत्नी ने नाराजगी जताई। कहा कि अब आप घर-घर जाकर भीख मांगेंगे? ओंकार नाथ ने ध्यान नहीं दिया और झोला लेकर दवाएं मांगने निकल पड़े। अगल-अलग मोहल्लों में जाकर सामान बेंचने वालों की स्टाइल में दवाएं दान करने के लिए आवाज लगाना शुरू किया। कई ने अनसुना कर दिया तो कुछ ने इस अजूबे इंसान को रोक कर उसके काम-काज को टटोला। 

ओंकारनाथ के परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटा, एक बेटी और एक पोती भी है। दिल्ली जैसे शहर में सिर्फ ओंकारनाथ की पेंशन से पूरे परिवार का गुजारा बड़ी मुश्किल से हो पाता है लेकिन फिर भी 82 साल के ये समाजसेवी लोगों की मदद करने के लिए न रुकते हैं न थकते हैं।

तब से बाबा रोज़ सुबह एक भगवा कुर्ता पहनकर मंगलापुरी के अपने घर से निकलकर शहर के अलग अलग इलाकों में जाते हैं और आवाज़ लगा-लगा कर लोगों से वो दवाएं उन्हें दे देने को कहते हैं, जो उनके लिए बेकार हैं। बाबा के कुर्ते पर आगे हिंदी में और पीछे अंग्रेजी में ‘चलता-फिरता मेडिसिन बैंक’ लिखा होता है। साथ में उनके नंबर भी कि कोई दवाएं देना या फिर लेना चाहे तो उन तक पहुंच सके। बाबा मेट्रो में कम चलते हैं क्योंकि महंगी है, वो डीटीसी बस में चलते हैं अपना सीनियर सिटीजन पास लिए। जहां बस नहीं पहुंचती वहां पैदल जाते हैं।शुरू में लोगों को उन पर भरोसा नहीं हुआ। तरह-तरह के सवाल पूछे जाते थे। कुछ ऊल-जलूल तो कुछ हौसला तोड़ने वाले। डॉक्टर उनकी दवाओं से बचते थे। ड्रग कंट्रोल डिपार्टमेंट वालों ने कार्रवाई की धमकी दी कि बिना लाइसेंस दवाएं बांटते हो, अंदर कर दिए जाओगे। लेकिन बाबा लगे रहे और धीरे-धीरे सब पटरी पर आने लगा। लोग साथ आने लगे और अब उनके नाम से एक पूरा ट्रस्ट खड़ा हो गया है। इसी काम से जुड़े और एनजीओ भी उनके साथ काम करने लगे हैं। बाबा के काम पर इतना भरोसा किया जाने लागा है कि कई डॉक्टर अब बाबा से दवाएं लेकर लोगों को देते हैं।

मेडिसिन बाबा की ये दवाईयां बड़े-बड़े अस्पतालों जैसे कि AIIMS, डॉक्टर राम मनोहर लोइया अस्पताल, दीन दयाल उपाधयाय अस्पताल, लेडी इरविन मेडिकल कॉलेज और कई आश्रमो में भी दान की जाती है। ओंकारनाथ के मुताबिक़ वे एक महीने में कम से कम 4 से 6 लाख तक की दवाईयां बांटते है।

अब अगली चुनौती थी इनका हिसाब-किताब रखने की। ओंकार नाथ ने एक डायरी तैयार करनी शुरू कर दी। इसका मजमून था – किससे कितनी दवाएं कब लीं और किसको कौन सी दवाएं कब दीं। जैसे-जैसे मिशन बढ़ता गया चैलेंज कई गुना बढ़ता गया। जिंदगी सुबह से शाम तक दवाओं को कलेक्शन के बाद बांटने में गुजरने लगी। सुबह उठ कर दोनों कंधों पर झोले लेकर कलेक्शन के लिए दिल्ली की अलग-अलग गलियों में घूमकर दवाएं इकट्टठा करना और घर आकर उनका हिसाब किताब रखना। इतना काफी नहीं रहा तो रात में इमरजेंसी में आई मदद की गुहार के लिए उठ कर बताए हुए हॉस्पिटल पहुंच जाना। बस मिशन इतना था कि दवाई के अभाव में किसी की जान न जाए।दवाएं जमा करने के लिए उन्हें दर दर भटकना पड़ता है लेकिन बांटने के लिए उनके पास अपना एक दफ्तर है। दरअसल दक्षिण पश्चिम दिल्ली के मंगलापुरी में स्थित एक बस्ती में मेडिसिन बाबा का घर है। और यहीं एक छोटे से किराए के कमरे से वे अपना दफ्तर भी चलाते हैं। उनका छोटा सा कमरा दवाओं से भरा पड़ा है। रोजाना शाम चार बजे से लेकर रात के आठ बजे तक वो गरीब और जरूरतमंदों को मुफ्त में दवा बांटते हैं। बाबा ज़्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन अपने काम को पूरे पेशेवर ढंग से करते हैं। हर रोज़ दिन के आखिर में इकट्ठा दवाइयों को बाकायदा कैटेलॉग करते हैं जिसमें दवाओं के बैच नम्बर से लेकर उनकी एक्सपायरी डेट तक सारी ज़रूरी जानकारी होती है। किसी को दवा देने से पहले वो डॉक्टर का प्रेस्क्रिप्शन भी देखते हैं।

मेडिसिन बाबा ने कई साल तक खुद ही फोन या खुद जाकर लोगों तक अपनी पहुंच बनाई। एक हितैषी ने उन्हें राय दी कि वेबसाइट और फेसबुक पेज बनाएं जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक उनकी पहुंच हो सके और ज्यादा दवाएं उन तक पहुंचें। दान के कंप्यूटर पर वेबसाइट और फेसबुक चलाने के लिए मोहल्ले का ही एक ग्रेजुएट लड़का शमीम वॉलेंटियर कर रहा है। वह मेडिसिन बाबा के काम से काफी प्रभावित है। फिलहाल बाबा को तकनीक की जानकारी इतनी ही है कि वो कंप्यूटर ऑपरेट कर सकें इसलिए वो शमीम को डायरेक्शन देकर हर काम करवाते रहते हैं। अगर लोगों के दिए पैसे से कुछ बच जाता है तो वो इन पैसों से अन्य चिकित्सीय उपकरण जैसे कि ऑक्सीजन टैंक, अस्पताल के बेड इत्यादि खरीदकर दान करते है। इतना ही नहीं किसी गरीब मरीज की किडनी फेल है या कैंसर पीड़ित है तो बाबा खुद से दवाएं खरीदकर भी देते हैं। हर महीने 40 हजार से ज्यादा की दवा खरीदते हैं। बाबा कहते हैं कि दवाइयों की कीमत बाजार में बहुत ज्यादा है। कई परिवार दवा खरीदने में ही तबाह हो जाते हैं। ऐसे में जेनेरिक दवाओं के प्रचलन को बढ़ाना जरूरी है।

यदि इनसे पूछा जाए कि यह सब करके उन्हें क्या मिलता है तो उनका जवाब होता है, “मेरी दवाईयो से ठीक होकर जो लोग घर जाते है उन लोगो की मुस्कान ही मेरी पूंजी है। मेडिसिन बाबा ऐसे कई गरीब मरीज़ों के लिए वरदान है जो डॉक्टर की बतायी महंगी दवाईयां नहीं खरीद सकते। वाकई बाबाओं के इस देश में ‘मेडिसिन बाबा’ की कहानी अनोखी और प्रेरणादाई है क्योंकि अगर ओंकारनाथ चाहते तो किसी भी बुज़ुर्ग सेवानिवृत्त व्यक्ति की तरह आराम से अपनी बाकी की जिंदगी गुज़ार सकते थे। लेकिन वो उन लोगो में से नहीं थे जो मुश्किलो को देख कर आंखे मूंद लेते हैं। उन्होंने देश की देश की सबसे मुश्किल समस्या का हल निकाला और अकेले ही गरीबों के लिए एक मेडिसिन बैंक बनाने के मिशन पर निकल पड़े।

मेडिसिन बाबा की पहचान उनकी नारंगी रंग की कमीज है, जिस पर उनका फ़ोन नंबर और मिशन बड़े बड़े अक्षरो में लिखा हुआ है। इसी नारंगी कमीज को पहने, दिल्ली की गलियो में घूमते मेडिसिन बाबा आज कई लोगो की उम्मीद बन चुके हैं। 

आप भी ओंकारनाथ जी से फेसबुक पर Medicine baba नाम के पेज के जरिए जुड़ सकते हैं। उनके बारे में पूरी जानकारी www.medicinebaba.com पर मिल सकती है।

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