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मिलिए दुश्वारियों से जीतकर देश के पहले दिव्यांग DJ बने वरुण खुल्लर से

mayankshukla 4 years ago
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मन में उमंग हो और जीवन में कुछ करने की ललक हो तो अपंगता की अड़चन भी प्रगति में आड़े नहीं आ पाती। इस क्रम में अवरोध तब पैदा होता है, जब निजी अक्षमता को लेकर इंसान अपनी सामर्थ्य को कम करके आंकना शुरू करता है, पर सच्चाई यह है कि उसकी असमर्थता शारीरिक कम, मानसिक ज्यादा होती है और इसे साबित करती देश के पहले दिव्यांग डीजे वरुण खुल्लर की अद्भुत कहानी। 

‘संघर्ष की स्याही से जो लिखते हैं इरादों को, उनके मुक़द्दर के पन्ने कोरे नहीं होते’

दिल्ली के द्वारिका पुरी में रहने वाले 26 वर्षीय वरुण खुल्लर भारत के पहले और दुनिया के दूसरे दिव्यांग आर्टिस्ट डिस्क जॉकी हैं। तीन साल पहले एक सड़क हादसे में इनके शरीर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह से पैरालिसिस हो गया था। वरुण को अपनी मेहनत पर पूरा भरोसा था। ढाई साल बिस्तर पर रहने के बाद आज भारत के जाने माने क्लब ‘किट्टी सू’ में काम कर रहे हैं।

लोग कहते थे खुद तो नाच नहीं पाएगा ये लोगों को क्या नचवाएगा, उनकी बात भी सही थी, लेकिन मैं एक दिन सबको जवाब देना चाहता था। जब मैं ढाई साल बिस्तर पर रहा तो लगातार लैपटॉप पर म्यूजिक की बारीकियां सीखता रहा।

वरुण कहते हैं कि “ये हमारे हिन्दुस्तान की समस्या है कि हमारे जैसे किसी भी साथी को देखते हैं तो सबसे पहला शब्द उनका बेचारा होता है, जिससे सामने वाला आधा तो ऐसे ही निराश हो जायेगा। वो बेचारा नहीं है ये हादसा तो किसी के साथ भी सकता है, कोई मुझे इसलिए काम दे कि मैं व्हीलचेयर पर बैठा हूँ, ये मुझे पसंद नहीं था, मैं अपने टैलेंट के दम पर काम पाना चाहता था और मैंने पाया भी।” वरुण अपनी मेहनत और लगन की वजह से भारत के पहले और दुनिया के दूसरे दिव्यांग डीजे हैं। जबकि अमेरिका के सर पॉल जॉनसन दुनिया के पहले दिव्यांग डीजे हैं।

वरुण सात जून 2014 को अपने दोस्तों के साथ कार से मनाली जा रहे थे। उसी समय एक सड़क हादसे में वरुण के शरीर के नीचे का हिस्सा पैरालाइज़्ड यानी लकवाग्रस्त हो गया। डॉक्टरों ने यहां तक कह दिया कि उनका अच्छे से उठ बैठ पाना भी मुश्किल है और वो अब कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाएंगे। वरुण की दुनिया कमरे की चारदीवारी के भीतर सिमटकर रह गई और उन्हें डिप्रेशन में ले गई।

अनचाही संवेदना, बेहद सख़्त कमेंट्स, लोगों की घूरती हुई निगाहें कभी वरुण की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन गईं थीं।


वरुण बताते हैं, “ढाई साल तक मुझे दो लोग बिस्तर से व्हीलचेयर पर उठाने-बैठाने के लिए रहते थे। हर दिन दो से तीन घंटे फीजियोथेरेपी और अभ्यास करने के लिए अस्पताल जाना पड़ता था, बाकी के समय मेरी अंगुलियां सिर्फ लैपटॉप पर रहती थी।” वरुण और इनके परिवार वालों ने कभी एक दूसरे को ये आभास नहीं होने दिया कि कोई हादसा भी हुआ है। वरुण के एक्सीडेंट के कुछ दिन पहले ही उनके पिता का देहांत हुआ था। इस हालत में अपने बेटे को देखकर उनकी मां काफी व्यथित थीं, लेकिन उन्होंने अपनी मां से बड़ी बहादुरी से कहा कि वे सब संभाल लेंगे।

वरुण अंदर से टूटकर रोते थे, लेकिन उन्होंने अपनी मां के सामने बहादुरी से कहा कि वे अपने सपने को पूरा करना चाहते हैं। वह नहीं चाहते थे कि लोग उन्हें किसी भी तरह से अक्षम मानें।  वरुण हमेशा मुस्कुराते रहते थे और इनके घर के लोग इनकी हंसी में खुश रहते थे। वरुण का बचपन से ही डीजे बनने का सपना था, इसलिए अपना सपना वो इस हालात में भी भूल न सके और अवसाद से बाहर आने की कोशिश करने लगे।

वरुण के भीतर अपने सपनों को पूरा करने का जज्बा था। डिप्रेशन से उबरने के दौरान उन्होंने तीन सालों तक म्यूज़िक प्रोडक्शन  (प्रोफेशनल कोर्स) सीखा साथ-साथ उस बारे में खूब पढ़ा और यू-ट्यूब पर वीडियो देखे। लंदन के पॉइंट ब्लैक म्यूजिक स्कूल से म्यूजिक के बारे में ऑनलाइन पढ़ाई की उसके बाद आईएलएम एकेडमी गुड़गांव को ज्वॉइन किया। म्यूजिक सीखने के दौरान वरुण ने कभी ये अहसास नहीं किया कि वे पैरालाइज़्ड हैं। उन्हें कभी भी खुद की स्किल्स पर शक नहीं रहा। खुद पर यही यकीन उन्हें वहां तक ले गया, जिस मुकाम पर वे जाना चाहते थे।

डीजे आमिश के नाम से लोकप्रिय वरुण कहते हैं कि जिस समाज में हम रहते हैं वहां लोग नए प्रयोग करने में काफी घबराते हैं और कभी रिस्क नहीं लेना चाहते, लेकिन वो म्यूजिक प्रोड्यूसर और डिस्क जॉकी बन ना केवल समाज के बने बनाए बंधनों को तोड़ रहे हैं बल्कि म्यूजिक की दुनिया में अपना मुकाम भी बना रहे हैं।

 वरुण जाने माने क्लब किट्टी सु में अपने काम को लेकर अनुभव साझा करते हुए बताते हैं,  “पहले मैं इस क्लब में एक ग्राहक की तरह जाता था, धीरे-धीरे अपने काम को दिखाया, तीन महीने वालेंटियर का काम करने के बाद मुझे परमानेंट जॉब मिल गयी। उस समय ये एकलौता ऐसा क्लब था जिसने हमे बेचारा समझकर काम नहीं दिया, बल्कि हमारे काम को देखकर हमें मौका दिया।”वरुण किट्टी सू के अलावा ग्रीष्म उत्सव और कई सोशल जगहों पर भी परफॉर्म कर चुके हैं। वो अपनी आशाओं के पंख फैलाकर पूरे जहां में उड़ने को बेकरार हैं। वे अपने काम से पहचाना जाना चाहते हैं, न कि शारीरिक कमज़ोरी से।

वरुण सभी दिव्यांग साथियों को एक सन्देश देना चाहते हैं, जो भी दिव्यांग हैं वो घर से बाहर निकलें, उन्हें अपनी लड़ाई खुद से लड़नी होगी। अगर आपको किसी सार्वजनिक स्थल पर व्हीलचेयर पर बैठने की या चढ़ने की सुविधा नहीं है तो सवाल करें लिखित रूप से मांगे। सरकार का दिव्यांगों के लिए अगर करोंड़ों का बजट आता है तो वो कहां जाता है। वरुण आगे कहते हैं  कि जिंदगी मे रिस्क लेना शुरू करें,खुद को बेचारा न समझें तभी आप आगे बढ़ सकते हैं।

 वरुण आज उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं, जो अपने साथ हुए किसी हादसे के बाद खुद को टूटा हुआ मानते हैं और सपनों को अधूरा छोड़ देते हैं। वहीं वरुण की कहानी साबित करती है कि दिव्यांगजन भी अपनी ज़िंदगी खुद जी सकते हैं और वो भी अपनी ज़िंदगी में ऐसी कामयाबियां और उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं, जो पहले किसी ने हासिल नही की है।

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