LOADING

Type to search

Share

ये जिंदगी एक दौड़ है। कोई शोहरत के लिए दौड़ता है तो कोई दौलत के लिए, दौड़ते सब हैं लेकिन सिर्फ अपने मतलब के लिए। मगर हमारे बीच ही एक ऐसी शख्सियत मौजूद हैं, जो दौड़ीं मगर एक नेक मकसद के लिए। भारतीय संस्कृति और परिधान को प्रमोट करने के लिए वो उम्र की तमाम बेड़ियां तोड़कर दौड़ीं। वो भारतीय नारी की पहचान साड़ी को खास पहचान दिलाने के लिए ऐसा दौड़ीं कि देखने वाले भी देखते रह गए।


मिलिए साड़ी की शान बढ़ाने वाली भारतीय महिला से

जब हम अपने दम पर जमाने की सोच बदलने की कोशिश करते हैं तो हमें दूसरो पर प्रभाव छोड़ने के लिए लीक से हटकर कुछ अलग  करने की जरुरत होती है। ऐसा ही एक कारनामा कर दिखाया है हैदराबाद में रहने वाली जयंती कुमार संपत ने। जयंती ने कुछ ऐसा कर दिखाया है,जो देश के लिए महिला सशक्कतीकरण का एक बिरला उदाहरण है। जयंती ने हैंडलूम साड़ी पहनकर मैराथन में 42 किलोमीटर की दौड़ पूरी कर उन लोगों को गलत साबित किया जिन्हें  लगता है कि साड़ी में काम करना मुश्किल है या इसे पहनना असहज है।

जयंती संपत ने 9 मीटर की साड़ी पहनकर 4 घंटे 57 मिनट 44 सेकेंड में 42 किमी की मैराथन पूरी की और बन गई साड़ी पहनकर दुनिया में सबसे तेज दौड़ने वाली पहली महिला धावक।

दरअसल तेलंगाना की राजधानी में आयोजित फुल मैराथन में करीब 20 हजार लोगों ने हिस्सा लिया था। लेकिन पूरे मैराथन में एक महिला आकर्षण का केंद्र रही, जिसने पैरों में चप्पल और साड़ी पहनकर 42 किलोमीटर की लंबी दौड़ पांच घंटे से कम समय में पूरी की, वो कोई और नहीं 44 साल की जयंती संपत थी। जिन्होंने हथकरघा उद्योग के प्रति अपने प्रेम और लोगों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए अनोखा रास्ता चुना। जयंती के मैराथन में साड़ी पहनने के पीछे हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के साथ-साथ एक और उद्देश्य था। वह बताना चाहती थीं कि साड़ी में काम करना या इसे पहनना असहज नहीं बनाता।

एक अखबार में बिजनेस सूट में मैराथन दौड़ने वाले इंसान की खबर पढ़कर, हैदराबाद की रहने वाली माइक्रोसॉफ्ट में बतौर आईटी मैनेजर काम करने वाली जयंती ने ठान लिया कि अगर वह ऐसा कर सकता है, तो साड़ी में दौड़ना भी असंभव नहीं है। यहीं से जयंती के लक्ष्य की शुरुआत हुई।

पिछले 9 साल से मैराथन की तैयारी कर रही संपत के लिए यह सब करना इतना आसान नहीं था। लेकिन अपने लक्ष्य को पूरा करने की ठान चुकी जयंती ने पीछे हटने से मना कर दिया। उनके इस सफर में उनके पति और बच्चों के साथ-साथ, माता-पिता का समर्थन भी मिला। इस नए सफर की शुरूआत उन्होंने अपने एक दोस्त की मदद से नौ मीटर की साड़ी पहनकर पांच किलोमीटर की दौड़ लगाकर की। मैराथन में भाग लेने के लिए उन्होंने वाकायदा ट्रेनिंग ली। पहले साड़ी को महाराष्ट्रियन स्‍टाइल में बांध कर दौड़ने का प्रयास किया। इस स्टाइल में दौड़ने में परेशानी हुई, साड़ी पैरों में फंस जाती। इस दौरान वो कई बार फ‍िसल कर गिरी भी, लेकिन फिर उठीं और इसी महाराष्ट्रियन स्टाइल में साड़ी बांधकर ऐसा दौड़ीं कि देखने वाले भी दंग रह गए।

जयंती कहती हैं

क्या कभी आपने हाथों से कपड़े बुनने वाले कारीगरों को देखा है? कपडे़ के एक-एक धागे को कैसे हाथों से पिरोया जाता है।  यह उन हस्तशिल्पी कारीगरों की अथक मेहनत को दर्शाता है जो अपने हाथों से इन सुंदर कपड़ों को तैयार करते हैं लेकिन अफसोस की बात है कि इन्हें उतनी ख्याति नहीं मिलती, जिसके ये असल हकदार हैं।

गौरतलब है कि हथकरघा वस्‍त्र और हथकरघा बुनकर भारत की समृद्ध संस्‍कृति, विरासत और परंपरा का एक अभिन्‍न अंग है। दुनियाभर में हाथ से बुने हुए कपड़े का 95 प्रतिशत भारत से आता है। हथकरघा उद्योग देश के वस्‍त्र उत्‍पादन में करीब 15 प्रतिशत का योगदान करता है और देश की निर्यात आय में भी सहयोग करता है, लेकिन इस कारीगरी की महानता से अभी भी लोग अनजान हैं। हथकरघा उद्योग केवल भारत का गौरव ही नहीं है, बल्कि देश में सैकड़ों लोगों के लिए रोजगार का एक स्रोत भी है।   इसी चीज को बढ़ावा देने के लिए जयंती ने इस अनोखे काम को अंजाम दिया है। पॉजिटिव इंडिया सलाम करता है  उनकी सशक्त सोच और दमदार जज्बे को।

Tags:

You Might also Like

1 Comments

Leave a Reply

%d bloggers like this: