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सोच से परे, सपनों के सच होने की एक अनसुनी कहानी

mayankshukla 4 years ago
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सपनों की कीमत और अहमियत क्या होती है, अगर आपको समझना है तो मिजोरम के चम्फाई जिले के एक छोटे से गांव न्यू रुआईकॉन के प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले 73 साल के इस स्टूडेंट से बस एक बार मिल लीजिए। उम्र, हालात और किस्मत का रोना भूलकर अपनी मेहनत के बूते सपनों को सच की सूरत में कैसे ढाला जाता है,आप बखूबी समझ जाएंगे। बचपन में पढ़ाई का मौका न मिल पाने को इसने अपने अनपढ़ रहने का ‘एक्सक्यूज’ नहीं बनने दिया। जिंदगी के जिस पड़ाव में आकर लोग जीने की उम्मीद छोड़ देते हैं, उम्र के उस नाजुक दौर में इसने अपने अरमानों को पूरा करके दिखाया।

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सपने,हसरतें और ख्वाहिशें, उम्र की मोहताज नहीं होती, इसे सच साबित करके दिखाया है 73 साल के लालरिंगथारा ने। अपने जीवन में लालरिंगथारा ने बहुत ही संघर्ष भरे समय को देखा है, दो वक्त की रोटी के लिए पूरा जीवन निकाल दिया, लेकिन हजारों कठिनाई आने के बाद भी उनकी पढ़ने की चाह खत्म नहीं हुई। उन्होंने उम्र के इस दौर में अपने सपनों को पूरा करने की ठानी और गांव की प्राइमरी स्कूल में दाखिला लिया। वो रोज सुबह स्कूल जाते हैं, स्कूल में पीटी भी करते हैं और फिर घर आकर अपना होमवर्क भी पूरा करते हैं।

अपने सपने को पूरा करने के लिए 73 साल के लालरिंगथारा दिन में स्कूल जाते हैं और रात में चर्च में चौकीदारी का काम कर घर चलाते हैं।


लालरिंगथारा का जन्म 1945 में भारत-म्यांमार बार्डर के करीब खुआंगलेंग गांव में हुआ। दूसरे बच्चों के साथ बचपन जी पाते, उससे पहले ही पिता का साया सिर से उठ गया, उस वक्त लालरिंगथारा महज 2 साल के थे। पिता के जाने के गुजरने के बाद वो अपनी मां का अकेला सहारा बन गए। उनकी उम्र के बाकी बच्चे जब खेलते थे, स्कूल जाते थे तब वो घर चलाने में मां की मदद करते थे। घर के कामों से लेकर खेतों में काम करने तक, वो मां को अकेला नहीं छोड़ते थे। पिता की मौत के बाद घर की परिस्थितियों ने उन्हे शिक्षा से दूर कर दिया. और लालरिंगथारा की पढ़ाई का सपना, सपना बनकर ही रह गया।घर चलाने के लिए नौकरी की तलाश में लालरिंगथारा जिंदगीभर इधर-उधर भटकते रहे, उनका कोई स्थाई ठिकाना नहीं होता। कुछ साल पहले वो अपना गांव छोड़कर न्यू रुआईकॉन गांव में हमेशा के लिए बस गए। यहां वो एक चर्च में चौकीदार की नौकरी तो करने लगे पर पढ़ाई करने का उनका सपना उन्हें सोने नहीं देता था। अपने सपने को पूरा करने के लिए आखिरकार वो गांव के एकमात्र प्राइमरी स्कूल में एडमिशन के लिए पहुंचे, लेकिन किसी को उनकी इस बात पर यकीन नहीं हुआ पर लालरिंगथारा अपनी बात पर अड़े रहे। उनकी जिद्द को देखते हुए स्कूल प्रशासन ने उन्हें अगले साल आने को कहा क्योंकि स्कूल में उस समय एडमिशन बंद हो गए थे।

अगले साल लालरिंगथारा फिर लौटे और फिर से एडमिशन की मांग की, जिसके आगे स्कूल प्रशासन को भी झुकना पड़ा और आखिरकार लालरिंगथारा को एडमिशन मिल ही गया। वो रोज सुबह स्कूल जाते हैं, स्कूल में बाकी बच्चों के साथ उसी फुर्ती से पीटी करते हैं। जब बाकी बच्चे सो रहे होते हैं, 73 साल का ये बच्चा जागकर अपना होमवर्क पूरा कर रहा होता है।

अपने से 60 साल छोटे बच्चों के साथ क्लासरूम साझा करने में बेशक लालरिंगथारा को थोड़ा अजीब लगता है, पर अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने इस हिचक को भी दूर कर लिया है। बचपन में स्कूल नहीं जा पाने का एक बोझ उनके कांधों पर है, अब लालरिंगथारा उसी कांधे पर स्कूल बैग ढोकर इस बोझ को उतार रहे हैं। वो गांव ही नहीं देश और दुनिया के लिए भी जीती जागती मिसाल हैं।

लालरिंगथारा के स्कूल में पढ़ने के सपने के पीछे एक खास वजह है, यूं तो वो स्थानीय भाषा में लिख-बोल लेते हैं, लेकिन वो अंग्रेजी पढ़ना चाहते हैं। अंग्रेजी किताबें उन्हें बचपन से लुभाती रहीं और इंग्लिश लिट्रेचर उनका पसंदीदा सब्जेक्ट रहा है। यही कारण है कि 73 की उम्र में वह अपना अंग्रेजी पढ़ने का सपना पूरा करना चाहते हैं।

Editor’s word 

सपनों की कोई सीमा नहीं होती, तमाम तोहमतों के बावजूद हसरत कभी कम नहीं होती। अड़चनों की आधीं और तकलीफों के तूफान को भी हुनर और हौसलों की बयार के आगे अपना रुख बदलना पड़ता है। लालरिंगथारा के जीवन संघर्ष की कहानी इन लाइनों को शब्द दर शब्द सच साबित करती है। इस कहानी को सामने लाने का मकसद भी सिर्फ यही है कि आज देश के युवा इस 73 साल के बुजुर्ग से सीख सकें कि जिंदगी के पथरीले सफर में सपनों का पीछा कैसे किया जाता है।


 

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