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मिलिए नक्सलियों के गढ़ में ज्ञान की गंगा बहाने निकले वर्दी वाले गुरूजी से

mayankshukla 4 years ago
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एक खौफनाक इलाका, जहां लाल आतंक की तूती बोलती है। आए दिन हत्याएं और मुठभेड़ की घटनाएं। हालात ऐसे कि लोग घरों से निकलने में भी घबराते हों, जहां लोगों को बुनियादी सुविधाएं तक मयस्सर न हों सोंचिए वहां शिक्षा की क्या खाक अलख जलती होगी। लेकिन यहां तैनात एक वर्दी वाले से इलाके के बच्चों की अज्ञानता देखी नहीं गई। वर्दी उसने लोगों की हिफाजत के लिए पहनी थी मगर उसे  नौनिहालों के उजड़ते भविष्य की भी चिंता थी, लिहाजा उसने एक साथ दो जिम्मेदारी निभाने का फैसला लिया और नक्सलियों के गढ़ में खुलेआम वर्दी पहनकर निकल पड़ा ज्ञान की गंगा बहाने।


वर्दीवाले ने जीता सबका दिल

जमशेदपुर के घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्र गुड़ाबांधा में पुलिस की वर्दी से खौफ खाने वाले लोग इन दिनों एक दरोगा (एएसआई) पर फिदा हैं। बच्चों के बीच शिक्षा की मशाल जला कर सबके दिल का चहेता बन चुका यह पुलिसवाला ड्यूटी से समय निकाल वर्दी में ही बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल पहुंच जाता है। तर्क है कि बच्चे पढ़ेंगे तो खुद नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। इस एएसआई का नाम है प्रमोद पासवान…जी हां प्रमोद पासवान…पूर्वी सिंहभूम जिले के नक्सल प्रभावित गुडाबांदा क्षेत्र के बीहड़ और पहाड़ी इलाके में प्रमोद किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। ग्रामीण इलाके के लोग उन्हें वर्दीवाले गुरुजी कहकर पुकारते हैं। बच्चे उन्हें देख कर बेहद उत्साहित नजर आते हैं, क्योंकि स्कूल में प्रमोद के पढ़ाने का अंदाज अन्य शिक्षकों से जुदा है। बच्चों के अनुसार, वे गणित के फार्मूले इस तरह समझाते हैं कि बच्चों को याद रखने में आसानी होती है।

ग्रामीण महेश नायक बताते हैं कि अमूनन इस क्षेत्र के लोग पुलिस को ‘गुंडा’ मानते रहे हैं, लेकिन इस वर्दीवाले ने सबका दिल जीत लिया है। पुलिसवालों के प्रति लोगों का नजरिया बदल रहा है। अच्छा लगता है कि एक पढ़ा लिखा पुलिस अफसर उनके बच्चों को पढ़ा रहा है।

प्रमोद के मुताबिक गुड़ाबांदा प्रखंड के इन बच्चों को उनके परिजन गरीबी के कारण उच्च शिक्षा नहीं दिला सकते हैं। बच्चों को ट्यूशन भी नहीं पढ़ा पाते हैं। स्कूल में जो कुछ पढ़ाया व सिखाया गया, बस उसी पर बच्चे निर्भर रहते हैं। इसलिए अपनी ड्यूटी निभाते हुए उन्हें जब कभी भी वक्त मिलता है, किसी न किसी स्कूल में जाकर पढ़ाना शुरू कर देते हैं। यही नहीं ड्यूटी के दौरान भी यदि किसी स्कूल के पास से गुजरते है तो एकबार स्कूल जाकर बच्चों को कोई ना कोई ट्रिक देना नहीं भूलते हैं। 

‘मुझे विश्वास है कि अगर मेरे इलाके का हर एक बच्चा शिक्षित होगा, तो नक्सलवाद की समस्या खत्म हो जाएगी’

प्रमोद कहते हैं करीब दो हफ्ते पहले की बात है, मेरे थाना क्षेत्र के दो स्कूलों के विलय के विरोध में कुछ ग्रामीण दो दिन से हड़ताल पर बैठे थे। उनकी मांग थी कि यह विलय रोका जाए, जिससे कुल 88 विद्यार्थियों को अपने घर से दूर जाकर न पढ़ना पड़े। मुझे लोगों से बात करने के लिए विभाग की ओर से धरना स्थल पर भेजा गया। विभागीय काम निपटाने के बाद मैंने वहां उपस्थित कुछ बच्चों को प्यार से अपने पास बुलाया और उनसे उनकी पढ़ाई के बारे में कुछ पूछताछ की।  मुझे आश्चर्य हुआ कि वे अपनी कक्षा के हिसाब से कुछ नहीं जानते थे, खासकर गणित में वे बहुत कमजोर थे। मैंने वहीं उन बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। धरना प्रदर्शन कवर करने वाले पत्रकारों की नजर इस नजारे पर पड़ी, तो लोगों को पता चला कि इस पुलिस इंस्पेक्टर के अंदर एक मास्टर भी बसता है।

मुझसे पढ़ने वाले बच्चे मेरे सामने बहुत सहजता से पेश आते हैं। मेरी वर्दी में उन्हें संरक्षक की छवि नजर आती है। मुझे लगता है कि हमारे पास जो भी काबिलियत है, हमें उसे दूसरे लोगों को सिखानी चाहिए। इससे हमारी काबिलियत की सार्थकता और भी बढ़ जाती है। वैसे तो नक्सलवाद अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है, लेकिन मुझे विश्वास है कि अगर मेरे इलाके का हर एक बच्चा शिक्षित होगा, तो नक्सलवाद की समस्या पूरी तरह खत्म हो जाएगी।

मैं मूलतः झारखंड के गोड्डा जिले का रहने वाला हूं। नब्बे के दशक में अविभाजित बिहार की सरकार ने पुलिस की नौकरी दे दी।सौभाग्य से मैं हमेशा से ही गणित का उम्दा विद्यार्थी रहा हूं। लेकिन जब मैं पुलिस विभाग में चयनित हो गया, तो पुलिसिया कामकाज में मुझे अपने गणितीय ज्ञान की कोई खास जरूरत नहीं रह गई। मगर मन के एक कोने में गणित के प्रति मेरी दिलचस्पी हमेशा जिंदा रही।

वाकई आज समाज को प्रमोद पासवान जैसे असल नायकों की बेहद जरूरत है, जो नक्सल प्रभावित क्षेत्र में अपनी ड्यूटी के साथ-साथ समय निकालकर  बच्चों के बीच शिक्षा की मशाल जला रहे हैं। प्रमोद वर्दी की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ अपना  सामाजिक उत्तरदायित्व भी बखूबी निभा रहे हैं। पॉजिटिव इंडिया उनके इस सराहनीय कदम को तहे दिल से सलाम करता है।

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