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नियति को मात देती भोपाल के ध्रुव की कहानी

mayankshukla 4 years ago
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हमारे पास जो है उसे कमतर मानना, उसमें कमियां निकालना आसान होता है। जो नहीं है उसके लिए रोना और जो है उसका मोल न समझना, कभी न कभी ऐसा हम सब करते हैं। पर हमारी और आपकी इसी दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो उनके हिस्से है, उसी में दुनिया-जहां की ख़ुशियों को पाने का जरिया ढूंढ निकालते हैं। Pozitive india आज आपको एक ऐसे ही अद्भुत व्यक्तित्व से मिलाने जा रहा है, जो तमाम चुनौतियों और कमजोरियों के बावजूद न सिर्फ जिंदगी के हर रंग को जीने की कोशिश कर रहा है बल्कि बीतते समय के साथ समाजसेवा की नई इबारत भी लिख रहा है।

किसी ने सच ही कहा है मौत से ज्यादा बड़ी चुनौती है अपनी कमजोरियों के साथ जिंदगी जीना 

यकीनन ये जिंदगी तमाम चुनौतियों से भरी है, जिसके सामने कई बार आम इंसान भी टूट जाता है फिर तो ध्रुव डाउन सिंड्रोम का शिकार था। डॉक्टरों ने उसके चलने-फिरने यहां तक कि बोलने की भी उम्मीद छोड़ दी थी। मगर ध्रुव टूटा नहीं, बिखरा नहीं, शारीरिक कमजोरियों के बावजूद वो अपनी कला के जरिए जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तों को रंगीन बनाने में जुटा रहा। सबसे बड़ी बात ये रही कि ध्रुव ने ये समझ और स्वीकार कर लिया था कि वो नॉर्मल बच्चों की तरह नहीं है,लिहाजा उसे हर काम सीखने और करने के लिए आम बच्चों से दोगुनी मेहनत करनी पड़ी। 

ध्रुव को असल जिंदगी का सितारा बनाने में सबसे बड़ा योगदान उनकी मां आरती तिवारी का रहा। जब डॉक्टर ने पहली बार उन्हें ध्रुव के डाउन सिंड्रोम के बारे में बताया तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। सारे ख्वाब बिखर चुके थे,सामने एक ऐसी सच्चाई थी जिसका सामना करना इतना आसान नहीं था। मगर आरती जी ने हार नहीं मानी, उन्होंने ध्रुव को इस धरती पर शहर-समाज के बीच खुलकर बराबरी से जीने की  कला सिखाने का निश्चय किया और फिर इसे अपनी जिंदगी का फितूर बना लिया। 

 

भारत में 1000 में से 1 बच्चा डाउन सिंड्रोम के साथ पैदा होता  है। 4 लाख से ज्यादा भारतीय डाउन सिंड्रोम से पीड़ित हैं फिर भी हमारे देश में जागरुकता की कमी है।


ध्रुव के लिए आरती जी ने सिर्फ मां की ही भूमिका नहीं निभाई बल्कि एक डॉक्टर, थेरेपिस्ट, नर्स, शिक्षक और विदूषक बनकर, वक्त और जरूरत के हिसाब से हर तरह के रोल निभाए। कई बार तो ध्रुव के अधिकारों की वकील भी बनना पड़ा। इसकी एक वजह ये भी है कि हमारी सोसायटी में आज भी डाउन सिंड्रोम से प्रभावित लोगों के पैरेंट्स को रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं है या फिर यूं कहें कि इसे लेकर भारत में आज भी जागरुकता की कमी है।हर इंसान की अपनी खूबी होती है,ध्रुव ने भी अपनी रचनात्मक कला की खूबी को बखूबी निखारा है। ध्रुव अपने हांथों से एक से बढ़कर एक डेकोरेटिव्स तैयार करता है। शायद उसे रंगों से खेलना पसंद है तभी तो वो अलग-अलग रंगों से सजावट की ऐसी चीज बनाता है,जिसे देखकर आप भी मंत्र मुग्ध हो जाएंगे।इतना ही नहीं ध्रुव कम्प्यूटर का मास्टर भी है, जो काम बड़े-बड़े आईटी और साफ्टवेयर एक्सपर्ट नहीं कर पाते वो काम ध्रुव चुटकियों में कर देता है। ध्रुव ने 10th तक रेग्युलर पढ़ाई की है। उसे कविता लिखने और गाने का भी शौक है। ध्रुव खुद के पैरों पर खड़ा होना चाहता है ना की किसी पर बोझ बनना। इसके लिए ध्रुव ने कबाड़ से जुगाड़ का रास्ता निकाला है। घर की कई बेकार चीजों को सहेजकर ध्रुव उन्हें एक आकर्षक डिजाइन देता है और फिर होली और दीवाली के मौके पर घर में हीं प्रदर्शनी के जरिए इन्हें सेल करता है।ये आरती जी की मेहनत और परवरिश का ही नतीजा है कि आज ध्रुव न सिर्फ खुद पढ़ लिख सका बल्कि वो समाज के कमजोर तबके के बच्चे-बच्चियों को मुफ्त में तालीम भी दे रहा है। आरती जी अपने एनजीओ दिव्य अभिकरण के जरिए कई तरह से समाज सेवा का काम करती हैं और ध्रुव समाजसेवा के इस काम में उनके कदम से कदम मिलाकर चल रहा है। चाहे बात गरीब बच्चों को पढ़ाने की हो, उनके स्वास्थ्य परीक्षण की हो, जरूरतमंदों को कपड़े वितरित करने की हो या फिर झुग्गी में रहने वाली महिलाओं को प्रशिक्षण देकर स्वाबलंबी बनाने की हो, ध्रुव समाजसेवा के इन कार्यों में अपनी मां का बराबर साथ देता है।साइंस ने जो बात कही थी आरती जी ने उसे प्रैक्टिल करके दिखाया है। मेडिकल साइंस में कहा गया है कि डाउन सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे का पूरा इलाज मुमकिन नहीं है,प्यार ही इसका इलाज है और सकारात्मक रवैया इसकी दवाएं। वहीं ध्रुव की कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी की जंग सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक शक्ति के दम पर भी जीती जा सकती है। अगर आप में  हौसला है तो किस्मत को भी मात दी जा सकती है। कुदरत और किस्मत ने भले ही ध्रुव का साथ न दिया हो मगर उसने अपने हौंसले और जुझारूपन के दम पर तमाम कठिनाइयों का सामना कर जिंदगी में आगे बढ़ने का हुनर सीख लिया है।

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