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जिंदगी को रोशन करती रौशन की अनसुनी कहानी

mayankshukla 4 years ago
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10 साल पहले एक ट्रेन हादसे में दोनों पैर गंवा चुकी रौशन एमबीबीएस की परीक्षा पास कर डॉक्टर बन चुकी हैं। मुंबई के एक सब्जीवाले की बेटी रौशन उर्दू मीडियम से पढ़ीं, मुफलिसी के तमाम रंग देखे, लेकिन कुछ भी इन्हें अपने ख्वाबों तक पहुंचने से नहीं रोक सका। इनका मानना है कि हर वो आवाज, जो आपको कुछ अच्छा करने से रोके, उसे आप अपनी जीत के बाद की तालियों की तरह सुनें और आगे बढ़ते रहें।

मजबूत इरादों की अनसुनी कहानी

मुंबई की लोकल यूं तो शहर को रवानगी देती है, लेकिन रौशन की जिंदगी इसी लोकल से गुजरते हुए मानो थम सी गई। साल 2008 के अक्टूबर महीने में जोगेश्वरी के पास भीड़ भरी लोकल से रौशन गिर पड़ी। हादसे में दोनों पैर चले गए। जैसे पैरों के साथ ही उसके सपने भी टूट गए। हादसा अपने आप में भयावह होता है, लेकिन पैसों की तंगी के साथ उसकी शक्ल और बिगड़ जाती है। घर का माहौल बदल चुका था। मुलाकाती आते तो संवेदना जताने के लिए थे, लेकिन हर बार और भी ज्यादा तोड़ जाते थे। कोई कहता कि पैर कटने से अच्छा मैं मर ही जाती। सब मजाक उड़ाते कि एक तो लड़की, उस पर दोनों पैर कटे हुए। 

इतने पर भी रौशन हार नहीं मानी और विकलांग कोटे से पूरे महाराष्ट्र में कॉमन एंट्रेस टेस्ट (CET) में तीसरे नंबर पर रही. हालांकि कॉलेज चुनने की बारी आने पर पैनल ने रौशन को लेने से इनकार कर दिया। पैनल की दलील थी कि रौशन 88% से ज्यादा विकलांग हैं और डॉक्टरी के पेशे के लिए ठीक नहीं हैं। इसमें लैक्चर, मरीज देखना, ओपीडी, इमरजेंसी जैसे कितने ही भागदौड़ वाले काम होते हैं,रौशन ये सब नहीं कर सकेगी।

23 साल की रौशन के पिता सब्जी का ठेला लगाते हैं। 2008 में जोगेश्वरी में ट्रेन हादसे में उसने अपने दोनों पैर गंवा दिए थे। रौशन का सपना डॉक्टर बनने का था। हादसे के बाद सिर्फ विकलांगता ने ही उसकी राह में रोड़े नहीं अटकाए बल्कि अफसरशाही और तमाम नियम-कानूनों ने भी उसके डॉक्टर बनने की राह में मुश्किलें पैदा कीं। नियम के मुताबिक, 70 % तक विकलांगता होने पर ही मेडिकल की पढ़ाई की जा सकती है लेकिन रौशन 88% तक विकलांग हो चुकी थी। मेडिकल एग्जाम पास करने के बाद भी जब उसे प्रवेश नहीं मिला तो उसने इस नियम को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी।

कॉलेज के इस जवाब से रौशन मायूस तो हुई लेकिन उन्होंने फिर सोचा जब दोनों पैर खोने के बाद वो मेडिकल में इतने मार्क्स ला सकती हैं, तो ये कोई बड़ी चीज नहीं है। लिहाजा उन्होंने हाईकोर्ट में केस किया, आखिरकार फैसला भी हक में हुआ और यहां से शुरू हुआ रौशन की जिंदगी का एक नया सफर।

रौशन बताती हैं कि ”मेडिकल कॉलेज का हर दिन मुझे और भी ज्यादा मजबूत बनाता गया। वहां लैक्चर्स के बीच थकती तो याद आता कि अब मुझे मरीजों के लिए इससे भी ज्यादा दौड़ना है। जब हार मानने को होती तो हाईकोर्ट की अपनी जीत और घरवालों का चेहरा याद आ जाता। पढ़ाई में अटकती तो याद आता कि कैसे ट्रेन मेरे धड़ से कुछ ही इंच दूरी पर दौड़ रही थी और मैं फिर भी जिंदा रही। ये याद आते ही डर, थकान सब छोड़कर मैं फिर से दौड़ पड़ती”।

रौशन कहती हैं पहले मेरा ख्वाब डॉक्टर वाला सफेद कोट पहनना था। अब इसमें एक और सपना जुड़ गया है, अपने जैसे लोगों का हौसला बनना और उनकी मदद करना। 

संघर्षों से उपजे सपने किसी पैर के मोहताज नहीं होते। ट्रेन हादसे में दोनों पांव गंवा चुकी रौशन के नाम के साथ डॉक्टर जुड़ना इसी का सबूत है।

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