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दुनिया की सबसे ऊंची रणभूमि सियाचीन जहां सांसों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है, ऐसी खतरनाक जगहों पर भी हमारे जवान अपनी जान दांव पर लगाकर वतन की पहरेदारी करते हैं ताकि हम और आप अपने देश में चैन की सांस ले सकें। हमारी सुरक्षा के लिए वो शहादत तक कबूल लेते हैं लेकिन बदले में हम उन्हें और उनके परिवार को क्या देते हैं…कभी सोचा है ? लेकिन मेरे देश में एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने एक अलग तरीके की कुर्बानी देकर न सिर्फ भारत मां के इन बहादुर बेटों की मदद की बल्कि उनका मान भी बढ़ाया।

कुर्बानियां कई तरह की होती हैं। एक वो जो हमारे सैनिक हिंदुस्तान की हिफाजत के लिए सरहद पर देते हैं और दूसरी वो, जो महाराष्ट्र के पुणे में रहने वाली 54 साल की सुमेधा चिताडे जी ने देश के जवानों की मदद के लिए दी है। सुमेधा जी ने बड़े अरमानों से बनवाए अपने सारे गहने-जेवरात सिर्फ इसलिए कुर्बान यानि बेच दिए ताकि सियाचीन जैसे दुर्गम इलाके में 13 हजार फीट की ऊंचाई पर ऑक्सीजन प्लांट बन सके और हमारे जवानों को ऑक्सीजन की अच्छी सुविधा मिल सके।

सुमेधा जी को जब पता चला कि सिर्फ ऑक्सीजन की कमी के कारण हमारे कई जवान सियाचीन में हर साल मरते हैं, तभी से उन्होंने जवानों की मदद को अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया। सबसे पहले उन्होंने ये जाना कि कैसे वो जवानों की मदद कर सकती हैं। इसके बाद सुमेधा ने जवानों के लिए ऑक्सीजन प्लांट लगवाने के बारे में काम करना शुरू किया। अपने पति और अफसरों की मदद से सुमेधा को पता चला कि ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए 1 करोड़ 10 लाख का खर्चा आएगा तो सुमेधा ने इतनी रकम जोड़ने की ठानी। इसके लिए सुमेधा ने सबसे पहले अपने गहने बेचकर सवा लाख रूपए इकट्ठे किए ताकि वो बाकी लोगों को भी बॉर्डर के जवानों की मदद के लिए चंदा इकट्ठा करने के लिए प्रेरित कर सकें। अभी भी सुमेधा इसी कोशिश में है कि जल्द से जल्द रूपए इकट्ठे हो सकें।

दरअसल दुनिया के सबसे ऊंचे जंग के मैदान सियाचीन की बात करें तो वहां ऑक्सीजन की इतनी कमी है कि कई बार सोते हुए भी सैनिकों की जान चली जाती है। वहां ठंड में तापमान शून्य से 55 डिग्री नीचे पहुंच जाता है। बेस कैंप से भारत की चौकी तक सैनिक कमर में रस्सी बांधकर चलते हैं कि अगर कोई बर्फ में धंस जाए तो उसे बचाया जा सके। 20-22 दिनों तक सैनिकों को ऐसे ही चलना पड़ता है। यहां के रास्ते कई हिस्सों में बंटे होते हैं। यहां की सबसे बड़ी परेशानी है ऑक्सीजन की कमी। ऐसे में आम लोगों का भी कर्तव्य बनता है कि वह उनके लिए कुछ करें।54 वर्षीय सुमेधा चिताडे एक स्कूल में शिक्षक हैं। उनके पति योगेश चिताडे सेंकेंड रैंक के रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर हैं और बेटा भी आर्मी में ही हैं। रिटायरमेंट के बाद दंपती ने फैसला किया कि वे सियाचिन में ऑक्सीजन प्लांट लगवाने में मदद करेंगे ताकि दुनिया के सबसे कठिन मोर्चे पर मौजूद जवानों को सांस लेने में आसानी हो। चिताडे दंपत्ति के मुताबिक देश के लिए कुर्बान होने वाले जवानों के प्रति हमारे भी कुछ कर्तव्य बनते हैं। इसीलिए उन्होंने अपनी सारी ज्वेलरी बेचकर जुटाई गई 1 लाख 25 हजार की रकम को सियाचीन में लगभग 1.10 करोड़ की लागत से बनने वाले ऑक्सीजन प्लांट में सहयोग राशि के तौर पर दे दी।

सेना से रिटायर हो चुके योगेश जी बताते हैं कि चंडीगढ़ से ऑक्सीजन सिलेंडर्स को 22,000 फीट की ऊंचाई तक पहुंचाया जाता है। कभी-कभी कोई हेलीकॉप्टर भी नहीं होता है जो वहां तक सिलेंडर पहुंचा सके। लेकिन अगर वहां प्लांट लग जाता है तो परिवहन की लागत भी बचेगी और सैनिकों की मदद भी हो पाएगी।बता दें कि पावर प्लांट की सहायता से ऑक्सीजन सिलेंडर्स को भरा जाता है जिसका लाभ करीब 9,000 सैनिकों को मिलता है।सुमेधा बताती हैं कि वो एक बार किसी काम के सिलसिले में सियाचिन बेस शिविर में थी,इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि सियाचीन की मुश्किल परिस्थितियों में सैनिकों कों ऑक्सीजन तक के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जिसके बाद उन्होंने वहां ऑक्सीजन प्लांट लगवाने की योजना बनाई। वैसे तो सुमेधा जी 1999 से सेना के कल्याण के लिए काम कर रही हैं। इसके लिए उन्होंने पुणे के कुछ लोगों के साथ मिलकर सोल्जर्स इंडिपेंडेंड रिहैबिलिटेशन फाउंडेशन नाम से एक संस्था भी शुरू की है। इस फाउंडेशन का मकसद जवानों के घरवालों और बच्चों को हर संभव मदद देना और लोगों को उनकी मदद के लिए मोटिवेट करना है। सुमेधा जी फाउंडेशन के जरिए हर तीज त्यौहार पर जवानों को बॉर्डर पर घर की बनी मिठाईयां और रक्षा बंधन पर राखियां भेजती हैं। इतना ही नहीं सुमेधा जी युवाओं को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित करने के लिए कॉलेजों और स्कूलों में व्याख्यान भी देती हैं। वहीं उनके पति भी सैनिकों की भलाई के लिए किए जा रहे हर काम में उनका हर कदम पर साथ देते हैं।

पुणे की सुमेधा जी और उनके परिवार के तरफ से शुरू की गई ये पहल आज पूरे देश के लिए एक मिसाल है। जिससे हम सबको सीखने की जरूरत है। बेशक सरहद पर डटे जवानों के हौसलों का कोई मुकाबला ही नहीं और न ही हम कभी उनकी कुर्बानी का जो कर्ज हम पर उधार है,उसे उतार सकते हैं मगर एक छोटी सी मदद के जरिए अपना फर्ज तो निभा सकते हैं ना।


 

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