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BHOPAL के एक साधारण गांव के ‘Birds विलेज’ बनने की दिलचस्प कहानी

mayankshukla 2 years ago
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अपनी नेचुरल खूबसूरती के लिए मशहूर झीलों की नगरी भोपाल यूं तो इंसानों से लेकर प्रवासी पक्षियों की पहली पसंद है। लेकिन शायद आप ये नहीं जानते होंगे इसी भोपाल की ओट में एक ऐसा गांव भी है जो एक किसान के छोटे से प्रयास के कारण आज Birds विलेज के रूप में अपनी खास पहचान बना रहा है। 

एक किसान के छोटे से प्रयास ने बदल दी पूरे गांव की पहचान

हम बात कर रहे हैं भोपाल की बड़ी झील के दूसरे छोर पर बसे छोटे से गांव बिसनखेड़ी की। कुछ समय पहले तक इस गांव की कोई खास पहचान नहीं थी लेकिन आज इस गांव में देशभर से पर्यटक आते हैं और पक्षियों पर शोध करने वालों का जमावड़ा लगा रहता है। देखने में आम गांव की तरह नजर आने वाला ये गांव आज बर्ड लवर्स की पहली पसंद बन चुका है।

बिसनखेड़ी देशभर में एक बड़े बर्ड कनजर्वेशन सेंटर के तौर पर मशहूर हो रहा है। लेकिन बिसनखेड़ी गांव के बर्ड कनजर्वेशन सेंटर के रूप में विकसित होने की कहानी बेहद ही दिलचस्प और प्रेरणा देने वाली है। वाकया साल 2006 का है, जब बिसनखेड़ी  में रहने वाले किसान सुनील श्रीवास्तव को अपने खेत में सारस क्रेन (दुर्लभ प्रजाति) का एक घायल बच्चा मिलता है। जिसे वो अपने घर ले जाते हैं। कई लोगों से बातचीत के बाद सुनील भोपाल की पक्षी विशेषज्ञ संगीता राजगीर को इसकी जानकारी देते हैं। इसके बाद शुरू होता है सारस क्रेन के घायल बच्चे को बचाने का एक सिलसिला जो आगे जाकर पूरे गांव का मिशन बन जाता है।

सारस विश्व का सबसे बड़ा उड़ने वाला पक्षी है। सारस पक्षी का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक महत्व भी है। दुनिया के पहले ग्रंथ रामायण की पहली कविता का श्रेय सारस पक्षी को जाता है। सारस को प्रेम का प्रतीक माना जाता है। पूरे विश्व में इसकी 8 जातियां पाई जाती हैं। इनमें से चार भारत में पाई जाती हैं। पांचवी प्रजाति साइबेरियन क्रेन भारत में साल 2002 में विलुप्त हो गई।

घायल सारस को इलाज के लिए झील के दूसरी तरफ स्थित वन विहार लाया जाता है। कुछ ही दिनों में घायल सारस ठीक हो जाता है और वन विहार से उड़कर फिर से बिसनखेड़ी में सुनील के खेत पर जा पहुंचता है। उसे फिर वन विहार वापस भेजा जाता है लेकिन वो बार-बार वहां से उड़कर बिसनखेड़ी पहुंच जाता। इस बीच इस बात की जानकारी राजधानी में पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्था भोपाल बर्ड को लगती है। लिहाजा भोपाल बर्ड की टीम गांव वालों से मिलने बिसनखेड़ी जाती है और उनकी पहल पर पूरे गांव वाले मिलकर सारस की रखवाली का जिम्मा उठाते हैं। देखते ही देखते भोपाल बर्ड की पहल और गांव वालों की एक छोटी सी मुहिम रंग लाती है और धीरे-धीरे सारस क्रेन की संख्या बढ़ने लगती है। जो आज 100 से भी ज्यादा हो चुकी है।

पक्षियों के मोह में दे दी करोड़ों की जमीन

बिसनखेड़ी में सारस के साथ-साथ दूसरे दुर्लभ और प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। भोपाल बर्ड संस्था यहां अब  सारस शोध सेंटर संचालित करती है। इस सेंटर के लिए बिसनखेड़ी गांव के ही एक किसान बबलू ने दरियादिली दिखाते हुए अपनी करोड़ों की बेशकीमती जमीन संस्था को मुहैया कराई है। जहां समय-समय पर वाइल्ड लाइफ जागरुकता के लिए शिविर लगाए जाते हैं और बाहर से आने वाले पर्यटकों को भी सारस क्रेन के बारे में समझने का मौका मिलता है। इतना ही नहीं पक्षी विशेषज्ञ मोहम्मद खालिक और डॉ. संगीता ने पक्षी संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उन्हें उनको एक्सपर्ट के रूप में तैयार करना शुरू किया है।तो देखा आपने कैसे घायल सारस के बच्चे को बचाने की एक किसान की छोटी सी कोशिश आज पूरे गांव का मिशन बन चुकी है, जिससे वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ जैसी बड़ी संस्था भी जुड़कर अपना सहयोग दे रही हैं। इस खास मुहिम के चलते आज न सिर्फ बिसनखेड़ी गांव की देश-विदेश में खास पहचान बनी है बल्कि यहां के लोगों को बड़ी मात्रा में रोजगार भी मिला है। बाहर से आने वाले पर्यटकों और शोधकर्ताओं से यहां के लोगों को अच्छी जानकारियां और बातें भी सीखने को मिल रही है। इसके अलावा प्रवासी पक्षियों के लिहाज से ये देश की एक अहम साइट बन गई है क्योंकि सारस क्रेन की जो प्रजाति भारत में साल 2002 में विलुप्त हो गई थी,आज उसी सारस क्रेन का संरक्षण कर बिसनखेड़ी के बाशिंदों ने पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल कायम की और पूरे जमाने को पक्षियों से प्यार करने का संदेश दिया।

 


 

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