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मिलिए…बच्चों के ‘मन की बात’ पढ़ने वाले टीचर से

mayankshukla 4 years ago
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ठंड का मौसम था। सर्द हवाएं चल रही थीं, मगर पढ़ना भी जरूरी था। ऊपर से सरकारी स्कूल, जहां न ढंग से बैठने की व्यवस्था न कोई सुविधा। फिर भी अपने भविष्य को संवारने के खातिर बच्चों ने स्कूल जाना नहीं छोड़ा। बर्फ सी गलती जमीन पर टाटपट्टी बिछाकर,बिना किसी से कुछ कहे वो अपने बुने हुए सपनों को साकार करने की कोशिश कर रहे थे। तो दूसरी तरफ वहां एक ऐसा टीचर भी मौजूद था जो बच्चों के बिना कुछ बोले सब कुछ समझ गया था। ठंड के मौसम में जमीन पर टाटपट्टी बिछाकर पढ़ते स्कूल के बच्चों की पीड़ा उनके टीचर ने पढ़ ली थी।

उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर के बहादुरगंज प्राथमिक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति पहले कुछ ऐसी ही थी। जहां सर्दी के मौसम में  कुछ इसी तरह ठंडी जमीन पर बैठकर ठिठुरते हुए बच्चे पढ़ाई करते थे। लेकिन उनकी ये स्थिति उनके एक टीचर से देखी नहीं गई। लिहाजा उन्होंने अपने पिताजी की बरसी पर भोज न देकर उन पैसों से स्कूल में बच्चों के बैठने के लिए फर्नीचर बनवाने का फैसला लिया। बहादुरगंज की शासकीय प्राइमरी स्कूल में अपनी क्लास के छात्रों को तालीम दे रहे इस टीचर का नाम इमरान सईद है। इमरान के पिता भी शिक्षक थे,उनकी मृत्यु 1997 में मृत्यु हो गई। अपने पिता की जगह पर ही उन्हें शिक्षक के पद पर नौकरी मिल गई। इस साल इमरान के परिवार ने उनके पिता की बरसी करवाने का निर्णय लिया, जिसमें दान और भोज के आयोजन में 25 से 30 हज़ार रुपये खर्च आना था। तभी इमरान को ख्याल आया कि उनके स्कूल के बच्चों को भी ठंड के दिनों में पढ़ाई के लिए काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। फिर क्या था इमरान ने पिता की बरसी के लिए जमा किये गए पैसों से स्कूल के बच्चों के लिए फर्नीचर बनवाने का फैसला लिया।

इमरान का मानना है की जिन बच्चों की वजह से उनके परिवार का गुज़ारा होता है उनके लिए फर्नीचर बनवाना उनके शिक्षक पिता के लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।


टीचर के इस कदम से उत्साहित स्कूल के बच्चे उनका शुक्रिया अदा कर रहे हैं। कक्षा के ही एक छात्र ने कहा कि अपने टीचर के इस काम से सभी खुश हैं क्योंकि इससे पहले वो सर्दी में ठंडी जमीन पर पढ़ते थे लेकिन आज उन्हें फर्नीचर पर बैठकर पढ़ने का मौका मिल रहा है। वहीं इमरान के इस जज्बे से खुश होकर शिक्षा अधिकारी उन्हें सम्मानित करने की बात कर रहे हैं।

इमरान का कहना है कि वो हर साल अपने पिता की बरसी मनाते थे और रिश्तेदारों को दावत देते थे लेकिन अब उन्होंने फैसला किया है कि वो हर साल बरसी पर खर्च होने वाले पैसों को अपने क्लास के बच्चों की जरूरतें पूरी करने के लिए खर्च करेंगे। 

इमरान सईद जैसे शिक्षकों के चलते ही भारत को कभी विश्व गुरू का दर्जा प्राप्त था और आज भी इमरान जैसे शिक्षकों के जज्बे और समर्पण के कारण ही इस देश के किसी कोने में गुरू-शिष्य परंपरा अपने जीवित स्वरूप में दिखाई देती है, जहां गुरु सबसे पहले अपने शिष्यों के भलाई के बारे में सोचते थे। वाकई इमरान की ये पहल सराहनीय है। आज जरूरत उनसे प्रेरणा लेने की है ताकि देश के बाकी शिक्षक भी शिल्पकार की भूमिका में इस देश के भविष्य को गढ़ सकें और सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब बच्चों की मदद के लिए आगे आ सकें।

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