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मिलिए ‘प्लास्टिक मैन OF इंडिया से’

mayankshukla 4 years ago
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 हमारे देश को अतुल्य भारत (incredible india) यूं ही नहीं कहा जाता है। भारत में ऐसे-ऐसे महान लोग जन्म ले चुके हैं जिनकी खोज और अविष्कार का दुनियाभर में डंका बजता है। विभिन्नताओं से भरे भारत में गजब का जुगाड़तंत्र चलता है। एक से बढ़कर एक खोज होती हैं।देश के किसी कोने में रह रहा कोई साधारण शख्स कभी भी अपने असाधारण कारनामों से जमाने को चौंका देता है,और दुनिया को दिखा देता है आगे चलने का एक नया रास्ता। आज हम आपको एक ऐसी ही शख्सियत से रूबरू कराने जा रहे हैं जिन्होंने गुमनाम रहकर भी बड़ा मुकाम पाया और आज पूरा देश उन्हें Plastic man of india के नाम से जानता है।

अपने अविष्कार को दुनिया को बेचने की बजाए मुफ्त में भारत सरकार के नाम करने वाले प्रोफेसर राजगोपालन की कहानी

हमारे देश की दो बड़ी समस्याएं हैं सड़क और सफाई। ज्यादातर शहरों में आप भी देखते होंगे किस कदर चारों तरफ प्लास्टिक के कचरे का ढेर लगा रहता है, जो कई बीमारियों का कारण भी बनता है। कचरे से आगे बढ़ें तो दूसरी सबसे बड़ी समस्या है सड़क। कभी-कभी अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो जाता है कि सड़क में गड्ढा है या गड्ढे में सड़क। भारत में सड़कें महंगी बनने के बावजूद एक बारिश से ज्यादा टिक ही नहीं पाती। लेकिन हमारे देश में एक ऐसा शख्स है जिसने इन दोनों समस्याओं का एक परमानेंट इलाज ढूंढ़ निकाला है। 

जी हां हम बात कर रहे हैं मदुरै के इंजीनियरिंग कॉलेज में केमेस्ट्री के प्रोफेसर राजहोपालन वासुदेवन की, जिन्होंने प्लास्टिक के कचरे से लंबे समय तक चलने वाली सड़क बनाने का अनोखा कारनामा करके दिखाया है। प्रोफेसर राजगोपालन ने अपने इस इनोवेशन के जरिए न सिर्फ प्लास्टिक के कचरे से पैसा बचाया बल्कि पर्यावरण को सुरक्षित रखने के साथ-साथ देश की कमजोर सड़कों की समस्या का पुख्ता समाधान भी किया।

प्लास्टिक के कचरे से सड़क बनाने की बात सुनकर आप भी आश्चर्यचकित हो गए होंगे ना। मगर ऐसा काम एक पर्यावरण प्रेमी और शिक्षित व्यक्ति ही कर सकता है। देखिए तस्वीरों में कैसे सड़कों पर फैला कचरा अब सड़क बनाने के काम आ रहा है।

ऐसे आया आईडिया

प्रोफेसर राजगोपालन के मुताबिक एक बार उन्होंने टीवी में देखा कि प्लास्टिक के कई खतरनाक नुकसान बताए जा रहे हैं और भारत में प्लास्टिक के कचरे का निष्पादन सबसे बड़ी समस्या है। लिहाजा वो इस समस्या का समाधान निकालने में जी-जान से जुट गए और प्लास्टिक के कचरे के सदुपयोग के लिए प्रयास शुरू किए।

इस इनोवेशन के लिए राजगोपालन वासुदेवन को 10 सालों तक कड़ी मेहनत करनी पड़ी। उन्होंने सबसे पहले 2002 में अपनी तकनीक से त्यागराजार कॉलेज के परिसर में प्लास्टिक के कचरे से रोड का निर्माण किया, इसके बावजूद उन्हें अपनी तकनीक को मान्यता दिलाने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। आखिर साल 2004 में तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता को अपना प्रोजेक्ट दिखाने के बाद कामयाबी मिली।

दरअसल प्रोफेसर वासुदेवन उस शहर से वास्ता रखते हैं जहां हर दिन तकरीबन 400 मीट्रिक टन कचरा कलेक्ट किया जाता है। प्रोफेसर साहब ने इन्हीं कचरों के ढेर में एक सुनहरा मौका ढूंढ निकाला। उन्होंने आम प्लास्टिक(जिसमें ग्रोसरी बैग्स और रैपर शामिल हैं) को डामर  में कोलतार के लिए उपयोग में लाने के लिए रूपांतरित किया। प्रयोगशाला में जब बेकार प्लास्टिक को डामर के साथ गरम किया गया और उसे पत्थरों के ऊपर डाला गया तो उत्साहजनक रिजल्ट सामने आया।प्रोफेसर वासुदेवन ने पहले बेकार प्लास्टिक को मशीन के द्वारा कतरनों तब्दील किया। फिर कंकर या बजरी को 165 डिग्री पर गर्म किया और इसके बाद दोनों को एक मिक्सिंग चैंबर में डाल दिया। तापमान की वजह से प्लास्टिक पिघलने लगता है और फिर इसमें 160 डिग्री पर गर्म डामर को मिलाया जाता है और सड़कों पर फैलाया जाता है। डामर के मुकाबले प्लास्टिक से निर्मित सड़क ज्यादा मजबूत होती है,जो बारिश और गर्मी दोनों से खराब नहीं होती है।ये सड़कें 10 सालों तक खुरदुरी नहीं होती, न तो इनमें  दरार पड़ती है और न ही गड्ढे होते हैं। इसलिए इन सड़कों के रखरखाव में ज्यादा खर्च नहीं आता और ये सस्ती पड़ती हैं।


प्रोफेसर राजगोपालन ने बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए प्लास्टिक के कचरे से सड़क बनाने की खोज की और कामयाब हुए। अब तक उनके फार्मूले के आधार पर 11 राज्यों में प्लास्टिक कचरे से 1 लाख किलोमीटर सड़क तैयार की जा चुकी है और आगे भी काम जारी है।

प्रोफेसर राजगोपालन की तकनीक को लेकर कई लोगों ने सवाल भी उठाए। कहा गया प्लास्टिक के कचरे से बनी सड़क गर्म होने पर जहरीली गैस छोड़ेगी, जो नुकसानदेह होगी। लेकिन प्रोफेसर साहब ने इसका तोड़ भी पहले ही ढूंढ निकाला था। जहरीली गैस छोड़ने के सवाल पर राजगोपालन का कहना है कि इस तकनीक में 1400 डिग्री सेल्सियस का इस्तेमाल करते हैं, जबकि 2700 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान के बाद ही इसमें से गैस निकल पायेगी।

कम खर्च, दोगुनी मजबूती

राजगोपालन के मुताबिक उनकी तकनीक से सड़क में तारकोल की खपत 10 फीसदी कम हो जाती है और सड़क की मजबूती भी दोगुनी हो जाती है।आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कई बड़ी-बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों ने राजगोपालन वासुदेवन को पेटेंट खरीदने का ऑफर दिया। लेकिन पैसों का मोह छोड़ उन्होंने भारत सरकार को यह टेक्नोलॉजी मुफ्त में दी। उनकी इस तकनीक से अबतक हजारों किलोमीटर से अधिक पक्की सड़कें बन चुकी हैं। उनके इनोवेशन से जहां एक तरफ कम खर्च में मजबूत सड़क का निर्माण हो रहा है वहीं पर्यावरण के लिए सबसे खतरनाक माने जाने वाले प्लास्टिक का सदुपयोग भी हो रहा है। राजगोपालन वासुदेवन ने अपनी खोज से पर्यावरण के दुश्मन प्लास्टिक को बेहद उपयोगी बना दिया जिसके लिए उन्हें भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ जैसे सम्मान से नवाजा।

Pozitive India सलाम करता है देश को उन्नत बनाने वाले ऐसे महान लोगों को, जो पैसों का लालच छोड़कर सिर्फ अपने देश की तरक्की और विकास के लिए जी रहे हैं।

story by mayank shukla

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1 Comments

  1. lucky sharma April 24, 2018

    inspirational story,सबको पढ़नी चाहिए

    Reply

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