LOADING

Type to search

‘जिंदगी’ को जीने के मायने सिखाती सिंगल मदर की ‘रंगभूमि’

mayankshukla 4 years ago
Share

ये एक सिंगल मदर की कहानी है…जिसमें सपने हैं, संघर्ष है…रिश्तों की रुसवाई है, रोज-रोज के धक्के हैं…अकेलेपन की कसक है, जमाने से लड़ने का जज्बा है…सफलता से भरे खुशियों के हसीन पल हैं तो समुंदर सी दर्द की गहराई भी…दुनिया के ताने हैं तो मातृत्व की ताकत भी…ये कहानी एक ऐसी दमदार शख्सियत की है जिन्होंने अपनों से मिले अनगिनत जख्मों के बावजूद अपने हौंसले और हुनर के बूते जिंदगी की ‘रंगभूमि’ में शून्य से शिखर तक का सफर तय किया।

मिलिए अपनी कला के जरिए बेरंग जिंदगी को रंगीन बनाने वाली सिंगल मदर चेतना मेहरोत्रा से

किसी भी मां की मेहनत और संघर्ष का कोई सानी नहीं होता लेकिन, मां जब सिंगल मदर की भूमिका में हो तो ये संघर्ष पहाड़ों को अकेले फोड़कर नया रास्ता बनाने सा मुश्किल हो जाता है। उसे अकेले ही सब कुछ करना होता है क्योंकि बेटे की देखभाल से लेकर दिनभर चलने वाली औपचारिकताओं में कोई और साथ नहीं होता। ये जिंदगी की ऐसी कड़वी हकीकत है जो इंसान को अंदर से तोड़कर रख देती है। मुंबई में रहने वाली चेतना मेहरोत्रा की जिंदगी भी इसी हकीकत के इर्द-गिर्द घूमती है। 12 साल तक घरेलू हिंसा का शिकार होने के बाद उन्होंने अपने पति से अलग होने का फैसला लिया। जिस रात उन्होंने जुल्म और सितम की जिंदगी से बाहर निकलने के लिए घर छोड़ा, उस वक्त उनके पास सिर छुपाने के लिए एक छत तक नहीं थी, ऊपर से एक मासूम सी जिंदगी को संवारने की बड़ी जिम्मेदारी, मगर चेतना अब हर हाल में जहन्नुम हो चली अपनी जिंदगी से मुक्ति पाना चाहती थीं। लिहाजा उन्होंने तय किया कि वो अब और घरेलू हिंंसा (DOMESTIC VIOLENCE) बर्दाश्त नहीं करेगी बल्कि एक नई जिंदगी की तलाश करेंगी।चेतना ने जब पति का घर छोड़ा तो वो चाह कर भी नौकरी नहीं कर सकती थीं क्योंकि उनका बेटा उस वक्त काफी छोटा था। शायद इसीलिए चेतना ने तय किया कि वो अपने हुनर के जरिए अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाएंगी। प्रशिक्षित कत्थक डांसर रह चुकी चेतना मेहरोत्रा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की डिग्री लेने के बाद नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से समर एप्लिकेशन प्रोग्राम किया था। लिहाजा उन्होंने डांस और थिएटर को अपना करियर बनाया। इस तरह साल 2011 में उन्होंने अपने स्टार्टअप ‘रंगभूमि ए हैप्पी प्ले ग्राउंड’ की नींव रखी।

चेतना जानती हैं कि इरादे पक्के और कदम मजबूत हों तो आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। वो मुंबई में रंगभूमि नाम से अपना स्टार्टअप चला रही हैं। इसके जरिए उनकी कोशिश युवाओं को थिएटर से जोड़कर रोजगार के नए अवसर मुहैया कराना है। मुंबई, पुणे और दूसरे कई शहरों के स्कूल और कॉर्पोरेट सेक्टर में रंगभूमि युवाओं और महिलाओं को जोड़ने का काम करता है। इसके जरिए जहां युवाओं में छिपी कला को निखारा जाता है, वहीं महिलाओं में ये भरोसा पैदा किया जाता है कि उनके पास भी मर्दों की तरह बड़े फैसले लेने का अधिकार है।

‘रंगभूमि’ में युवाओं को अपनी भाव-भंगिमाओं के इस्तेमाल से कैसे किरदार को निभाया जाता है, इसका हुनर सिखाया जाता है। ‘रंगभूमि’ बच्चों को सिखाता है कि कैसे हर पल थियेटर के माध्यम से अपने आप को अपने अंदर जाकर समझ सकते हैं और अपने को दूसरों के सामने कैसे बेहतर तरीके से पेश कर सकते हैं। इसके पीछे ‘रंगभूमि’ का मकसद किरदारों को रोजमर्रा के जीवन से उठाकर उसे स्टेज में प्रेजेंट करना है। यही वजह है कि चेतना ‘रंगभूमि’ को केवल थियेटर कहने की बजाए ‘ड्रामा फॉर लर्निग एन्ड रिफ्लेक्शन ऑफ लाइट’ (Drama for Learning and Reflection of light) कहती हैं।

चेतना कहती हैं: रंगभूमि में हम कविता की शैली में थियेटर करते हैं। आमतौर पर जो भी थियेटर होता है वो स्क्रिप्ट पर आधारित होता है जबकि रंगभूमि में हम सीधे दर्शकों को साथ में जोड़ते हैं और उनकी भागीदारी के साथ हमने इंटरनेशनल थियेटर शैली जैसे प्लेबैक थियेटर,थियेटर ऑफ ऑपरेट, थियेटर इन एजुकेशन जैसी आर्ट शैली की शुरूआत की है।

पति का घर छोड़ने से लेकर रंगभूमि की नींव रखने तक का चेतना का ये सफर इतना आसान नहीं रहा। निराशा और अवसाद की काली रात, हर तरफ मुश्किलें और हार का भय। चुनौतियां मुंह बाए अपने विकराल रूप में खड़ी रहीं, लेकिन इन सबसे बेखबर वो अपने हुनर और अदम्य साहस के साथ जुटी रहीं काली रात को भोर में बदलने के लिए। कई बार ऐसा लगा कि नहीं, शायद अब और नहीं मगर तभी उन्हीं अंधेरों के बीच से जिंदगी ने कहा कि देखो उजास हो रहा है। 

चेतना ने जब रंगभूमि की शुरूआत की तो घरेलू हालात के अलावा उन्हें आर्थिक चुनौतियों से भी दो-चार होना पड़ा। सिंगल मदर होने के कारण बच्चे की परवरिश के साथ-साथ रंगभूमि का सारा कामकाज भी उन्हें ही देखना पड़ता था। शुरू-शुरू में उनके लिए लोगों को इस आर्ट शैली की उपयोगिता समझाना भी मुश्किल हो गया। वो लोगों से गुजारिश करती थीं कि उन्हें एक बार मौका दिया जाए कि कैसे युवाओं पर, कम्यूनिकेशन और लीडरशिप स्किल पर भी थिएटर के जरिए काम किया जा सकता है। कई सालों तक उन्होंने बिना किसी फीस के ही काम किया। फिर धीरे-धीरे लोगों को समझ में आने लगा कि रंगभूमि एक अलग तरीके की शैली है जो सही मायने में जीने का मकसद सिखाती है।फिलहाल चेतना ‘रंगभूमि’ के जरिए मुंबई के पांच स्कूलों के अलावा पुणे, बेंगलुरू और हैदराबाद के स्कूलों में भी अपनी इस अनूठी कला को बिखेर रही हैं। इन स्कूलों में थिएटर भी सिलेबस में शामिल है। जिस तरह बच्चे स्कूलों में गणित, साइंस और दूसरे विषय पढ़ते हैं उसी तरह वो थियेटर भी पढ़ते हैं। ‘रंगभूमि’ का सिलेबस क्लास वन से 12th तक के बच्चों के लिए डिजाइन किया गया है।‘रंगभूमि’ कई कॉरपोरेट सेक्टर की महिलाओं के साथ भी काम कर रहा है। ‘रंगभूमि’ महिलाओं को थियेटर के जरिए बताता है कि वो कैसे अपने जीवन में खुद फैसले लेकर आगे बढ़ सकती हैं। करीब तीन साल तक अकेले काम करने के बाद आज चेतना की टीम में 48 लोग हैं। इनमें 5 कोर टीम मेंबर हैं। समाज में जागरूकता लाने के मकसद से उन्होने कैंसर अस्पताल, स्लम इलाकों, जेल और अनाथ आश्रमों में भी थियेटर किया है। इस दौरान बच्चे भी उनके साथ थे। चेतना की योजना ‘रंगभूमि’ को देश भर के स्कूलों तक ले जाने की है। इसके बाद वो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसे ले जाना चाहती हैं।सिंगल मदर हमारे समाज का वह हिस्सा हैं, जो रात-दिन खुद जल कर अपने बच्चों के जीवन में उजाला भरती हैं और चेतना मेहरोत्रा जैसी सिंगल मदर अपने आप में ही एक मिसाल हैं। जिनकी कहानी साबित करती है कि मुश्किलों से घबराकर उसके सामने घुटने टेक देना और जिंदगी भर घुट-घुट के जीना कोई अक्लमंदी नहीं होती। कंडीशन चाहे जितनी भी खराब और आपके खिलाफ क्यों न हों, हमें अपना संघर्ष हमेशा जारी रखना चाहिए ,क्योंकि हालातों से लड़ना, लड़कर गिरना और फिर उठकर संभलना ही जिंदगी है, शायद  चेतना की रंगभूमि भी यही कहती है।


 

Tags:

Leave a Reply

%d bloggers like this: