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साहस और संघर्ष का दूसरा नाम है ‘अत्री कर’

mayankshukla 4 years ago
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हजारों साल पुरानी इस दुनिया में जाति-धर्म और रंग के अलावा भी एक ऐसा संघर्ष है जो सदियों से चला आ रहा है। ये एक ऐसा संघर्ष है जो इंसान के जन्म से शुरू होता है और उसकी मृत्यु तक चलता रहता है। ये संघर्ष है लिंग की पहचान यानि GENDER IDENTITY का। क्योंकि हमारे प्रजातंत्र में समान अधिकार का प्रावधान हकीकत में सिर्फ महिला और पुरुष के अधिकारों तक ही सिमटकर रह गया है जबकि समाज में एक तीसरा जेंडर भी है। आप जिसे किन्नर या ट्रांसजेडर कहते हैं। ना कोई इनके दिल की आवाज सुनना चाहता है और ना ही इनका दर्द समझना चाहता है। सदियों से मुख्यधारा से बाहर रहे इस तबके को अपने वजूद के लिए भी लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

मिलिए UPSC में शामिल होने वाली देश की पहली ट्रांसजेडर से

देश की सर्वोच्च अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही चार साल पहले ट्रांसजेंडर्स को थर्ड जेंडर का दर्जा देकर एक पहचान और सरकारी नौकरियों के लिए ‘अन्य कैटेगरी’ के तहत आवेदन करने की सुविधा प्रदान कर दी हो, लेकिन हकीकत आज भी कुछ और है. क्योंकि सही तरीके से अनुपालन न होने की वजह से ये तमाम सुविधाएं और अधिकार सिर्फ सरकारी कागजों तक ही सिमटकर रह गए हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो कानूनी लड़ाई जीतने के बाद भी किन्नर समुदाय हमारे सभ्य समाज की आधुनिक सोच के आगे हारा सा महसूस कर रहा है. 

लेकिन आज हम जिस शख्सियत की कहानी बताने जा रहे हैं उन्होंने अपने अदम्य साहस और अथाह संघर्ष के बूते न सिर्फ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी बल्कि अपने अधिकारों को लेकर दिखाया और किन्नर समुदाय के प्रति समाज की पुरानी मानसिकता को तोड़ते हुए बंगाल पीएससी में शामिल होने वाली पहली ट्रांसजेंडर बनीं।

28 साल की अत्री कर हुगली के कुंतीघाट की प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं. लेकिन उनका सपना सिविल सेवक बन देश की सेवा करना था. इसके लिए उन्होंने खूब तैयारी भी की. लेकिन 2017 में यूपीएससी का फॉर्म भरते वक्त अत्री उस वक्त हैरत में पड़ गईं जब उन्होंने देखा कि फॉर्म में जेंडर वाले विकल्प में सिर्फ महिला और पुरुष का ही कालम है. हालांकि इससे पहले साल 2016 में राज्य सिविल सेवा की परीक्षा के दौरान भी ऐसा हो चुका था. जहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद फार्म में थर्ड जेंडर का विकल्प नहीं दिया गया था. लिहाजा परीक्षा में तीसरे लिंग को शामिल करने की मांग को लेकर अत्री ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

अत्री के मुताबिक ह्यूमन राइट लॉ नेटवर्क (एचआरएलएन) की मदद से उसने पहले कोलकात्ता हाई कोर्ट में आयोग के खिलाफ मामला दर्ज किया. कोर्ट ने उन्हें राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (एसएटी) में मामला दायर करने की सलाह दी. जिसके बाद न्यायाधिकरण में मामला दायर हुआ और आखिरकार अत्री को थर्ड जेंडर के तौर पर पीएससी की परीक्षा में बैठने की अनुमति मिली. 

वेस्ट बंगाल के हुगली जिले के त्रिवेणी में रहने वाली अत्री कर का सफर कभी इतना आसान नहीं रहा. वर्धमान यूनिवर्सिटी में पोस्ट ग्रेज्युएशन से लेकर सरकारी प्राइमरी स्कूल में टीचर बनने तक अत्री ने जिंदगी के हर मोड़ पर कड़ा संघर्ष किया…भेदभाव के चलते कॉलेज का कोर्स बीच में ही छोड़ना पड़ा. उसके बाद टीचर्स एबिलिटी टेस्ट में पास होकर एक स्कूल ज्वाइन किया लेकिन सेक्स आइडेंटिटी के कारण यहां भी उन्हें मैनेजमेंट के द्वारा परेशान किया जाने लगा…हर दिन अपनों के बेगानेपन को झेलना पड़ा…हर सेकंड समाज की विकृत सोच से दो चार होना पड़ा…न जाने कितनी फब्तियां सुनी, कितना विरोध झेला…कई बार साहस ने भी जवाब दे दिया मगर वो कभी रुकी नहीं, दकियानुसी सोच के आगे झुकी नहीं और ना ही अपनी लड़ाई कभी अधूरी छोड़ी. 

अत्री बंगाल की पहली ट्रांसजेंडर हैं जिसे सिविल सर्विस एग्जाम में बैठने का मौका मिला है. साथ ही वो 2018 की यूपीएससी की सिविल सर्विस प्रीलिम्स की परीक्षा में भी शामिल होने जा रही हैं. लेकिन अपने अधिकारों के लिए अत्री की कानूनी लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई. इसके बाद शुरू हुआ रेलवे की परीक्षा में बैठने के लिए अत्री के संघर्ष का सफर.

अत्री के फेसबुक वाल से ली गई उनकी ये तस्वीर बहुत कुछ बयां करती है।

अत्री ने रेलवे में भी एक पद के लिए फॉर्म भरा था, जिसमें महिला और पुरुष के साथ ‘अन्य’ का भी विकल्प था. बावजूद इसके उन्हें जनरल कैटेगरी में रख दिया गया. जिसके खिलाफ वो कोर्ट पहुंची. कोर्ट ने रेलवे चयन बोर्ड को फटकार लगाते हुए कहा कि अत्री को आरक्षित वर्ग में रखा जाए. अत्री रेलवे की परीक्षा देने वाली देश की पहली ट्रांसजेंडर हैं.

अपने हक की लड़ाई लड़ने के साथ-साथ अत्री ने टीचर होने की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई.उन्होंने अपने संघर्ष का असर कभी स्टूडेंट्स की पढ़ाई में नहीं पड़ने दिया. कोर्ट पहुंचने के लिए उन्हें पांच घंटे का सफर करना पड़ता था और स्कूल को भी देखना पड़ता था. अत्री इंग्लिश ऑनर्स में ग्रैजुएट हैं. एक कोचिंग संस्थान ने उन्हें मुफ्त में सिविल सर्विस की कोचिंग कराने का भी वादा किया था, लेकिन कानूनी लड़ाई के बीच में वह भी छूट गया. अत्री कहती हैं कि अगर एक पढ़े लिखे इंसान को अपने हक के लिए इतना संघर्ष करना पड़ता है तो बिना पढ़े-लिखे ट्रांसजेंडर्स को किन हालातों में जीना पड़ता होगा,इसका अंदाजा भी आसानी लगाया जा सकता है.

यह एक बानगी है…यह सच है कि जिद से जिंदगी बदली जा सकती है… जिद से जहां बदला जा सकता है… जिद से सपने बुने जा सकते हैं और साकार किए जा सकते हैं…अत्री कर एक ऐसी ही शख्सियत हैं जिन्होंने एक जिद ठानी और उसे पूरा कर दिखाया…अत्री के संघर्ष की कहानी आज कईयों की जिंदगी बदल सकती है, किन्नर समुदाय की पहचान और उनके प्रति समाज की सोच बदल सकती है…

 story by mayank shukla

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