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अभी तक मैनें आपको समाज के कई रियल हिडेन हीरोज और शीरोज की कहानियां सुनाईं। सभी का मकसद एक था, आप  उनसे कुछ सीख सकें।उनके साहस और संघर्ष का सफर मुश्किल वक्त में आपका हौंसला बढ़ा सके,आपको लड़ने की हिम्मत मिल सके। लेकिन जो कहानी मैं आज बताने जा रहा हूं पता नहीं उसे लिखना कितना सही है या गलत,ऐसे विषय पर पहले किसी  ने लिखा या नहीं, पता नहीं। लेकिन मैं इतना जरूर कह सकता हूं कि इस छोटी सी कहानी में जिंदगी का एक सबसे बड़ा सच छिपा है, जिसे आज हम सबको समझने की जरूरत है।

मेडिकल साइंस कहता है He/She will be die soon…उसके शरीर में खून का उल्टा बहाव शुरू हो गया है..उसकी umbilical cord absenct है…वो identical/monozygotic twins है…एक का बचना मुश्किल है…एक तो ठीक है लेकिन वो छोटा वाला वीक है…कमजोर है…मगर वो है कि मानता/मानती ही नहीं..लड़ रहा/रही है किस्मत से…हर रोज…हर सेकंड…हर एक सांस के लिए.वो साइंस को भी हैरान कर रहा/रही है…चमत्कार को भी चुनौती दे रहा/रही है…डॉक्टरों तक ने उम्मीद छोड़ दी लेकिन वो है कि हारने का नाम ही नहीं ले रहा/रही…पिछले 8 महीनों से डटा/डटी है…अभी भी उसकी सांसे चल रही हैं…अब भी उसका संघर्ष जारी है…लेकिन कब तक? शायद ये सवाल ही गलत है…सच कुछ और है…ये वो सच है जिसने मुझे ये स्टोरी लिखने का साहस दिया…क्योंकि ये जिंदगी की वो आखिरी और असल हकीकत है जिसका सामना उस मासूम ने इस दुनिया में आने से पहले ही कर लिया और हम कई बार पूरी जिंदगी जीने के बाद भी इसे समझने का साहस नहीं जुटा पाते…

‘a real time story’


यकीनन संघर्ष और साहस की आपने ढेरो कहानियां पढ़ी या सुनी होंगी लेकिन यकीन मानिए ये कहानी सबसे अलग है। ये एक ऐसे संघर्ष का सफर है जो आपको आखिर में निशब्द कर देगा, आपको जिंदगी की अहमियत बतला देगा, आपको आपके होने का अहसास करा देगा, आपको रुला भी देगा, फिर धीरे से जीने का जज्बा भी जगा देगा। ये कोई फिल्मी कहानी नहीं है, ये इस दुनिया की भी कहानी नहीं है, ये एक जिंदगी के शुरू होने से पहले की अनसुनी कहानी है। ये ‘उसके/उसकी’ संघर्ष की कहानी है जिसने अभी इस संसार में कदम भी नहीं रखा,जो अभी अपनी मां की कोख से बाहर भी नहीं आया, अभी ठीक से उसने आंखें भी नहीं खोली, लेकिन नियति का खेल देखिए उसके संघर्ष का सफर मां के पेट में पहले दिन से ही शुरू हो गया, जो अब भी जारी है।

ये उन दो बच्चों की कहानी है जो अभी इस दुनिया में आने के लिए जंग लड़ रहे हैं…हां ये दो आईडेंटिकल ट्विंस की कहानी है…मेडिकल साइंस की भाषा में कहें तो मां के पेट में एक ही प्लेसेंटा से जुड़े दो बच्चों का केस है जो अमूमन बहुत ही कम देखने को मिलता है…इंटरनेट में मौजूद तमाम जानकारियों से लेकर एक्सपर्ट डॉक्टरों तक का यही मानना है कि ऐसे ज्यादातर मामलो में सिर्फ एक ही बच्चे को इस निर्मोही दुनिया में आने का मौका मिलता है जबकि दूसरे का सफर मां के पेट में ही थम जाता है…इस केस में भी सब यही कह रहे हैं…मगर ये केस अब साइंस की थ्योरी और चमत्कारों की मान्यताओं, दोनों के लिए चुनौती बन गया है… इस कहानी में मेडिकल साइंस का पुराना अनुभव हर दिन उम्मीद की एक-एक किरण को धराशाई करने की पूरी कोशिश करता है तो वहीं दूसरी तरफ वो मासूम भी हर दिन अपने साहस से उम्मीदों को चमत्कार की शक्ल में जिंदा बनाए रखने का प्रयास कर रहा है…लगातार कलर ड्रापलर जैसी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है क्योंकि डॉक्टरों को डर है कि अगर अंदर एक बच्चे को कुछ हो गया तो शायद दूसरे वाले पर भी उसका बुरा असर पड़ सकता है…लेकिन ये सिर्फ डॉक्टरों का डर है जो पिछले 8 महीनों से बरकरार है. क्योंकि वो मासूम इतनी जल्दी हार कहां मानने वाला/वाली है…

कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे वो कह रहा/रही हो ‘ मैने लड़ना भी तो आप से ही सीखा है…मै आपका/आपकी ही तो अंश हूं तो फिर मैं इतनी जल्दी हार कैसे सकता/सकती हूं। मैं आउंगा/आउंगी इस दुनिया में,आपसे मिलने,मां को देखने…बोलने दीजिए जो बोलता है उसे…आप तो सबको उम्मीद बांटते फिरते हो,तो अब खुद निराश कैसे हो सकते हो।

हर बार जांच का समय करीब आते ही शंका के बादल मन को घेर लेते हैं.क्या अब भी सब कुछ सही होगा, उसकी सांसे तो चल रही होंगी ना…बहुत से सवाल उस मासूम से जुड़े सभी लोगों के मन में उठने लगते हैं. दिल सहम सा जाता है…लेकिन वो मासूम खुद हर बार अपनी धड़कती सांसों से इन सवालों का जवाब दे जाता है…डॉक्टर बोलते हैं कि वाकई वो बड़ा बहादुर बच्चा/बच्ची है…जो हर रोज अपनी सांसों के लिए संघर्ष कर रहा है…डॉक्टरों ने तो उसके यहां तक पहुंचने की उम्मीद भी नहीं लगाई थी लेकिन वो किसी तरह अपनी किस्मत से लड़-झगड़ कर यहां तक आ गया है…डॉक्टरों को अब इसी बात की तसल्ली है कि छोटे वाले के संघर्ष का फायदा बड़े वाले को मिल रहा है…फिल्मी भाषा में बोला जाए तो अर्जुन सिर्फ अपने करण को मजबूत बनाने के लिए जी रहा है.वो लड़ रहा/रही है सिर्फ इसलिए कि कम से कम करण इस दुनिया में अच्छे से आ सके.क्योंकि मेडिकल साइंस का कहना है कि बच्चे का जो विकास मां के पेट के अंदर होता है,वो बाहर मशीनों में नहीं हो सकता…इसलिए जरूरी है कि छोटा बेबी थोड़ा और समय आगे निकाल दे ताकि बड़े बेबी को सेफ किया जा सके…अब एक बार फिर अगली तारीख का इंतजार है, जब ताजा रिपोर्ट आएगी…फिर कुछ उम्मीदें बंधेंगी,फिर कुछ चिंताएं सताएंगी या एक बार फिर वो कोई चमत्कार कर सबको हैरान कर देगा/देगी…  

खैर आगे जो भी हो…मगर इस स्टोरी का मकसद तो बस आपको इतना समझाना है कि जब वो मासूम इस दुनिया में आने से पहले ही इतना संघर्ष कर सकता है, अपनी किस्मत से लड़ सकता है, कुदरत से टकरा सकता है, तो हम और आप छोटी-छोटी मुश्किलों में क्यों टूट जाते हैं…क्यों चुनौतियों का सामना करने की बजाए हम अपनी किस्मत को कोसते-कोसते घुटने टेक देते हैं…जरा सी बात पर घबरा कर जिंदगी का साथ छोड़ जाते हैं…जिंदगी में लड़ना सीखिए…अपने रास्ते बनाना सीखिए…मुश्किलों के मुंह में जाकर जीतना सीखिए…अपनी आवाज उठाना सीखिए…अपने कदम बढ़ाना सीखिए…क्योंकि संघर्ष ही जिंदगी का आखिरी सच है…इस मासूम की कहानी भी यही कहती है और सर डार्विन की survival theory भी…

‘याद रखिए हारा वही है जो लड़ा नहीं है’

 story by mayank shukla

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