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‘पहाड़ों’ की गुमनाम पुरोधा

mayankshukla 4 years ago
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ये कहानी एक ऐसी जुनूनी महिला की है जिसने अकेले अपने दम पर पहाड़ों की बंजर भूमि को हरे-भरे जंगलों में तब्दील करने का कठिन काम भी बखूबी कर दिखाया है। ये कहानी एक ऐसी नारी शक्ति की है जो सब सुख सुविधाएं छोड़कर बीते पचास बरसों से जंगलों को सहेजने में जी-जान से जुटी हुई है लेकिन उन्हें वो पहचान अब तक नहीं मिली जिसकी वो हकदार हैं। इसलिए पॉजिटिव इंडिया आज उत्तराखंड की इस वन लेडी की कहानी आप सबके सामने लेकर आ रहा है।


पहाड़ों की बंजर जमीन पर खुद का जंगल उगाने वाली प्रभा देवी की कहानी

हिमालय जितना अडिग है, उतने ही अडिग यहां के निवासी भी हैं. जो हिमालयी सभ्यता के साथ आज भी खुद हिमालय के हिमायती बनकर रचे-बसे हैं. केदारघाटी के पसालत गांव में रहने वाली प्रभा देवी सेमवाल ऐसी ही एक शख्सियत हैं जिन्होंने अपने हौंसलों से साबित किया है कि पहाड़ी महिलाएं भी हिमालय सी बुलंद और मजबूत हैं. प्रभा देवी सेमवाल हिमालय की उन अडिग हस्तियों का प्रतिनिधत्व करती हैं जो हिमालय को बचाने, उसे खूबसूरत बनाने और उसकी आभा को अविरल बनाने में जुटी हुई हैं. 66 साल की इस महिला का आज अपना खुद का जंगल है, जिसे इन्होंने खुद उगाया, पाला पोसा और सहेजा है. उम्र के इस पड़ाव में भी बुजुर्ग प्रभा देवी की दिनचर्या अपने खेत, जानवरो और पेड़ो के ही इर्द गिर्द घूमती है.

उत्तराखंड के लोगों का जल, जंगल और पर्यावरण से अटूट प्रेम सदियों से रहा है, यहां के आम लोगो की जिंदगी से जुड़े अधिकतर कार्य जंगलो से ही जुड़े हुए होते है। जंगल यहां की आवश्यकता भी हैं और रोजमर्रा के जीवन से जुडी एक प्रयोगशाला भी।

Junge planted by Prabha Devi

प्रभा देवी बताती हैं कि सालों पहले गांव में अवैध कटाई और भूस्खलन के कारण जंगल से रोजमर्रा की जिंदगी को मिलने वाले संसाधनो में कठिनाई आने लगी.सिमटते जंगल और कम होती हरियाली का असर न सिर्फ वहां रहने वाले लोगों पर पड़ने लगा बल्कि जानवरों के लिहाज से भी परिस्थितियां बिगड़ने लगीं. ऐसे में उन्होंने अपने रोजमर्रा के जीवन में जंगल की उपयोगिता को समझते हुए वनों को सहेजने का संकल्प लिया और अपने खेतों फसल बोने की बजाए कई पेड़ लगाकर इसकी शुरूआत की.

प्रभा देवी ने दूर-राज स्थित अपने खेतों के समूह में जंगल उगाना शुरू किया. पहले अपने जानवरों के लिए घास उगाई और फिर धीरे-धीरे पेड़ों को उगाना शुरू किया.देखते ही देखते प्रभा देवी की मेहनत रंग लाने लगी और उनके खेत एक हरे-भरे जंगल में तब्दील हो गए.

आज उनके द्वारा उगाये गए जंगल में पेड़ो की संख्या पांच सौ से भी अधिक है. जिसमें अलग-अलग तरह के पेड़ है. प्रभा देवी ने इमारती लकड़ियों से लेकर जानवरों को घास में देने वाले पेड़ों समते रीठा, बांझ, बुरांस, दालचीनी और कई स्थानीय पेड़ों को लगाया है

प्रभा देवी का कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी में आज तक किसी पेड़ को जड़ से नहीं कटा. उनके हाथों से लगाए गए ज्यादातर पेड़ उग जाते हैं चाहे वह किसी भी परस्थिति में लगाये गए हों.

जंगलों को बचाना ही जीवन का उद्देश्य

प्रभा देवी के तीन बेटे और तीन बेटियां हैं. आज उनके बेटे-बेटियां देश-विदेश में अपने-अपने कामो में  लगे हैं और अच्छी तरह सेटल हैं. लेकिन उनके कई बार बुलाने के बाद भी प्रभा देवी ने कभी पहाड़ नहीं छोड़ा. उम्र के जिस पड़ाव में हर इंसान किसी अपने का सहारा चाहता है ताकि बाकी की जिंदगी सुकून से कट जाए, उस अवस्था में भी प्रभा देवी पर्यावरण के प्रति समर्पित हैं.यहां तक कि औलादों के साथ रहने की एक मां की चाहत भी कभी  पहाड़ों और वनों के प्रति उनके प्रेम को कम नहीं कर पाई.

प्रभा देवी की कहानी को अगर समझा जाए तो पता चलता है कि पहाड़ों के इस समृद्ध इलाके में जंगलों की हरियाली लोगों के घर-परिवार और जीवन में खुशहाली भी ला सकती है। प्रभा देवी के दिखाए आइने में आज रोजगार के लिये पलायन करते नौजवानों और नीतिकारों के लिए विकास की ठोस रणनीतियां छुपी हैं। जरूरत है इस आइने पर बरसों से पड़ी धूल को साफ कर इसे पढ़ने, समझने और समझकर जमीन पर कुछ ठोस कर दिखाने की ताकि जगंलों को बचाकर यहां के जनजीवन और धरती को आने वाली प्राकृतिक आपदाओं और विनाश से भी बचाया जा सके। 

 story by abhishek garg 

 

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