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संघर्ष से अपनी जिंदगी में सफलता की रेखा खींचने वाली रेखा त्यागी की कहानी

mayankshukla 4 years ago
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जिंदगी एक कहानी है.हर कहानियों में रंग.कहीं फीके तो कहीं गाढ़े रंग.उदासी और उत्साह के रंग.ये हम सबकी जिंदगी में होता है.हम चलते हैं,गिरते हैं,उठते हैं और जिंदगी आगे बढ़ती जाती है.बस फर्क इतना होता है कि कुछ लोग जिंदगी में आई मुश्किलों से टूट जाते हैं तो कुछ मुसीबतों की आंखों में आंखे डाल भिड़ जाते हैं.विपरीत हालातों में भी अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के जरिए वो जीत जाते हैं और उदाहरण बन जाते हैं हम सभी के लिए.दुनिया ऐसी कहानियों से भरी पड़ी है.हमारे ही इर्द-गिर्द न जाने कितने ही ऐसे लोग हैं,जिन पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा,मदद के सारे दरवाजे बंद हो गए लेकिन वो रुके नहीं बल्कि आगे बढ़ते गए.दरअसल दुनिया को ऐसे लोगों ने ही गढ़ा है.ऐसे लोग ही जिंदगी को ज्यादा मायनेदार बना रहे हैं.और आज हम मध्यप्रदेश की एक ऐसी ही शख्सियत से आपको मिलाने जा रहे हैं जिन्होंने असल मायने में जिंदगी को एक नई पहचान दी है।


 

जिंदगी में आने वाली तमाम चुनौतियों को मात देकर कामयाबी का इतिहास लिखने वाली इस शख्सियत का नाम है रेखा त्यागी.जी हां मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के जलालपुर गांव में रहने वाली महिला किसान रेखा त्यागी ने अपनी जिंदगी में संघर्ष को हथियार बना विपदाओं के पहाड़ को फोड़कर सफलता का एक ऐसा सफर तय किया है जो सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को मुश्किल समय में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाएगा.रेखा त्यागी ने कृषि उत्पादन के क्षेत्र में ऐसी कामयाबी हासिल की है जो बड़े-बड़े किसान और जमीनदार भी नहीं कर पाते हैं.रेखा बाजरे की खेती में बम्पर पैदावार करने वाली मध्यप्रदेश की पहली महिला किसान हैं.उनके इस संघर्ष और कामयाबी पर पीएम नरेन्द्र मोदी ने खुद उनका सम्मान किया.

मेहनत से मुश्किलों को दी मात

एक आम महिला की तरह रेखा त्यागी का भी जीवन सामान्य तौर पर चल रहा था. रेखा के पति किसानी करते थे और पांचवी तक पढ़ी-लिखी रेखा घर में अपने तीन बच्चों को एक कुशल गृहिणी की तरह संभालती थी. लेकिल दस साल पहले रेखा के जीवन में उस वक्त दुखों को पहाड़ टूट पड़ा जब अचानक उनके पति का देहांत हो गया. पति की मौत के बाद रेखा की जिंदगी बेहद कठिन हो गई. उनके सामने घर चलाने के लिए आर्थिक संकट खड़ा हो गया.खेत तो थे, लेकिन खेती में लगाने के लिए न तो रेखा के पास पैसे थे और न ही खेती करने और कराने का कोई एक्सपीरियंस.पति के जिंदा रहते हुए रेखा ने कभी भी अपने खेत में कदम तक नहीं रखा था. लेकिन अब उसके सामने खुद की और अपने तीन बच्चों की परवरिश की कठिन चुनौती थी.

 

अपने जेठ और देवरों की आर्थिक मदद से रेखा ने मजदूरों से खेती कराना शुरू किया. ये सिलसिला कई सालों तक यूं ही चलता रहा.रेखा ने खेती में सालों तक नुकसान उठाया. खेती का लागत मूल्य निकालना भी मुश्किल हो रहा था. ऐसे में रेखा के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि अपनी कृषि योग्य 20 हेक्टेयर जमीन को ठेके पर किसी और किसान को दे दिया जाए या फिर इस नुकसान के व्यवसाय को लाभ में बदला जाए.

हार ने दिखाया जीत का रास्ता

खेती में लगातार होने वाले नुकसान से उबरने के लिए रेखा ने अपने खेतों में नई किस्म की फसल लगाने के बारे में सोचा. इसके लिए उन्होंने अनुभवी किसानों के साथ-साथ जिला कृषि अधिकारी से भी संपर्क किया. अधिकारियों की सलाह पर रेखा ने अपने खेत में बाजरे की फसल लगाई.बाजरे की फसल लगाने के लिए रेखा ने परंपरागत पद्धति को छोड़कर नई वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल किया. नई नस्ल के बीज और मिट्टी की जांच कर खेतों में खाद-पानी दिया गया. खेतों में सीधे तौर पर बाजरा बोने के बजाए पहले बाजरे का छोटा पौधा तैयार किया गया.

पौधा तैयार होने के बाद इसे अपनी जगह से उखाड़ कर खेतों में लगाया गया.इस तरह सघनता पद्धति से रोपे गए बाजरे की खेती में रेखा ने रिकार्ड तोड़ उत्पादन हासिल किया.आमतौर पर परंपरगत तकनीक से की गई बाजरे की खेती में प्रति हेक्टेयर 15 से 20 क्विंटल बाजरे का उत्पादन होता है, लेकिन सघनता पद्धति से की गई खेती में रेखा ने एक हेक्टेयर खेत में लगभग 40 क्विंटल बाजरे की पैदावार की. रेखा द्वारा बाजरे की ये रिकार्ड तोड़ पैदावार प्रदेश सहित पूरे देश के लिए अभूतपूर्व है. इस तरह रेखा ने बाजरा उत्पादन करने वाले किसानों के साथ-साथ सरकार का भी ध्यान अपनी ओर खींचा.

रेखा जी का कहना है कि “अब मैं किसानों को खेती में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देने के लिए जागरुक करने का काम करूंगी.”

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