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मिलिए पाताल से पानी निकाल लोगों की प्यास बुझाने वाली रेगिस्तान की ‘मीराबाई’ से

mayankshukla 4 years ago
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अभी तक आपने कृष्णभक्ति में डूबी मीरा बाई की भक्ति की शक्ति की कहानी तो सुनी होगी,लेकिन आज हम आपको राजस्थान की एक ऐसी मीरा से मिलाने जा रहे हैं जिन्हें कलयुग की “भागीरथ” कहा जाए तो कम नहीं होगा क्योंकि कलयुग की इस मीरा ने रेगिस्तान में पाताल से पानी निकाल प्यासे गले को तर करना ही अपनी जीवन का मकसद बना लिया है.

राजस्थान के पाडुना गांव की ये मीराबाई पेशे से एक मैकेनिक हैं जो उदयपुर जिले के दूर दराज गांवों में लगे हैंडपंपों की मरम्मत का काम करती हैं, वो भी उबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों को तय करते हुए.आदिवासी समाज से ताल्लुक रखने वाली मीराबाई का अपने काम के प्रति जुनून इस कदर है कि वो न तो खतरनाक पथरीले रास्तों की परवाह करती हैं और न ही सर्दी-गर्मी और बरसात के मौसम की मार का उन पर कोई फर्क पड़ता है.उनका मकसद सिर्फ एक ही है, राजस्थान की सूखी धरती में किसी का कंठ सूखा न रह जाए और आसपास के गांव के लोगों को जिंदा रहने के लिए पीने का साफ पानी मिल सके.अपने जलसेवा के इस अनोखे काम के कारण आज मीराबाई को मेवाड़ की जीवनदायिनी के नाम से भी पुकारा जाता है.

मुसीबतों से भरा रहा ‘मीराबाई’ के जीवन का सफर

आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाली मीराबाई की जिंदगी हमेशा काफी मुश्किलों भरी रही.शादी के चार साल बाद ही उनके पति की मौत हो गई.इसके बाद तो उन पर मानो विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा.इस बीच पानी की किल्लत ने गांव वाले के जीवन को ही नर्क बना दिया.पूरा गांव पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसने लगा.वैसे तो पाडुना गांव की दूरी उदयपुर से महज 42 किलोमीटर ही है.मगर इस गांव में विकास के पहियों ने कभी दस्तक ही नहीं दी.मूलभूत सुविधाएं तक यहां के लोगों को मयस्सर नहीं हुई.इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी इस गांव की ज्यादातर आबादी बीस रूपये रोज पर गुजारा करती है.गांव में छोटी सी डिस्पेंसरी है, जिसमें एक ही स्टाफ है.वहीं बिजली की किल्लत भी है.आधारभूत ढांचे के नाम पर न तो कोई अच्छा स्कूल है, न ही अस्पताल और न ही पीने के साफ पानी का कोई इंतजाम.

 

जल बिन तड़पती जिंदगी को देखते हुए मीरा बाई ने चट्टानों सी मुसीबतों को तोड़कर कलयुग की “भागीरथ” बनने यानि जलसंकट से निपटने का बीड़ा उठाया.पानी को परेशानी दूर करने के लिए उन्होंने हैंडपंप मैकेनिक बनने की ठानी और सरकार द्वारा कराई जा रही ट्रेनिंग पूरी की,वो भी तब जब साथी महिलाओं ने इस ट्रेनिंग से पल्ला झाड़ लिया.

वो दिन था और आज का, मीराबाई लगातार अपने जुनून को जी रही हैं. हाथ में मरम्मत के लिए जरुरी औजार थामे मीराबाई  मीलों का लंबर सफर रोज पैदल ही तय करती हैं.सर्दी, धूप, बरसात, जंगल, उबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते भी न तो उनके हौंसले को कम कर पाए और न ही उनके सफर को रोक पाए.मीरा बाई लोगों की प्यास बुझाने के इस काम को आज भी पूरे शिद्दत से निभा रही हैं.तभी तो गांव के बच्चे उन्हें प्यार से ‘पंप वाली बुआ’ के नाम से पुकारते हैं.और हर वक्त लोग उनकी मदद को तैयार रहते हैं.

मुश्किल से मुश्किल हालात में भी मीराबाई अपने दम पर पांच गांव के लोगों की प्यास बुझाने का काम करती है. इसके लिए जरुरत पड़ने पर वो दिन रात भी नहीं देखती.गर्मी,सर्दी, बरसात जब गांव वाले बुलाते हैं तो मीराबाई अपने काम में जुट जाती हैं.

वाकई मेवाड़ की मीराबाई महिला सशक्तिकरण की अनोखी मिसाल हैं,जो रेगिस्तान में वीरान हो चली जिंदगी की प्यास बुझाने का मुश्किल काम भी बखूबी निभा रही हैं.मीरा बाई के संघर्ष की कहानी आज घोर अंधियारे में टिमटिमाते दीपक की लौ की तरह ही जो साबित करती है कि अगर मन में कुछ करने का संकल्प और जेहन में दुनिया बदलने की जिद्द हो तो संसाधनों की कमी भी कभी आड़े नहीं आ सकती.

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