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सोनू सोहले,बुरहानपुर

कामयाबी हर महिला के किस्मत में होती है जरूरत है तो बस फौलादी हौसलों के साथ चुनौतियों से जूझते हुए आगे बढ़ने की.जिसका जीता जागता उदाहरण बनीं हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की हेल्थ वर्कर गीता वर्मा,जिन्होंने खतरनाक पहाड़ी ईलाकों में बाइक से सफर कर टीकाकरण अभियान को सफल बनाया.इसके लिए WHO ने न सिर्फ उनका सम्मान किया बल्कि अपने कैलेंडर के पहले पेज में भी जगह दी.लेकिन सिर्फ हिमाचल ही नहीं मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में भी एक ऐसी बहादुर बेटी है जो नन्हे-मुन्हें बच्चों के लिए हर रोज चुनौतियों से दो चार होती है और बेहद कठिन और दुर्गम रास्तों पर फर्राटे से अपनी बाइक दौड़कर टीकाकरण अभियान को सफल बनाने में जुटी हुई है.

मिलिए मध्यप्रदेश की गीता वर्मा यानि मेघा से,जो बच्चों की जान बचाने दुर्गम सड़कों पर दौड़ाती है बाइक

आज लड़कियां किसी मायने में लड़कों से पीछे नहीं है,हर क्षेत्र वों अपने साहस और मेहनत के बूते मर्दों के कंधों से कंधा मिलाकर काम रही हैं.आज हम आपको प्रदेश की एक ऐसी ही बहादुर बेटी से मिलाने जा रहे हैं जिसने वाकई में ये साबित कर दिखाया है कि महिलाओं के लिए आज कोई भी काम मुश्किल नहीं है.

गांव की उबड़-खाबड़ सड़कों और वीरान रास्तों पर फर्राटे से मोटर साइकिल दौड़ाती ये हैं स्वास्थ्य विभाग की जांबाज कार्यकर्ता  मेघा साहू,जो देहात के दूरस्थ इलाकों की तंग गलियों में भी बाइक ऐसे दौड़ाती हैं मानो एंबुलेंस गुजर रही हो.मेघा दुर्गम इलाकों में समय पर पहुंचकर दवाईयां भी बाटती हैं और बच्चों का टीकाकरण भी करती हैं.

 

दरअसल राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के अंतर्गत संपूर्ण और शत प्रतिशत टीकाकरण की जिम्मेदारी महिला स्वास्थ्यकर्मियों की होती है.लेकिन पहाड़ी और दूर दराज के आदिवासी क्षेत्रों में सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में टीकाकरण समेत कई तरह की जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं आज भी दूर की कौड़ी बनी हुई हैं.ऐसे में इन इलाकों में आदिवासी बच्चों की सेहत का ख्याल रखने का बीड़ा उठाया है मेघा साहू नाम की इस बहादुर हेल्थ वर्कर ने.जिन इलाकों में आदिवासी माता-पिता टीकाकरण को लेकर जागरुक नहीं हैं और जिन मजरे-टोले और फालियों में पहुंचना आसान नहीं है,ऐसी जगहों में अकेले जाकर मेघा टीकाकरण अभियान को सफल बना रही हैं.मेघा बतौर महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता बुरहानपुर जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूर धूलकोट क्षेत्र के दवाटिया उपस्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ हैं.इसके अलावा बसाली उपस्वास्थ्य केंद्र का अतिरिक्त प्रभार भी मेघा के पास है.अगर दवटिया की हा बात करें तो दवटिया 27 और बसाली 10 टोले,मजरे एवं फालियों में बटा है.दोनो ही आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंचना काफी कठिन है.इन क्षेत्रों में बस या टैक्सी जैसी कोई यातायात सुविधा भी मौजूद है.यहां तक कि कई जगहों पर तो सड़कों का ही नामोनिशाम नहीं मिलता.फिर भी मेघा अकेले ही अपनी बाइक से इन दुर्गम इलाकों में पहुंचकर टीकाकरण अभियान को सफल बनाने के साथ ही कई मूलभूत सुविधाओं से महरूम आदिवासियों को जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करा रही हैं.

अगर मेघा साहू को बुरहानपुर की गीता वर्मा कहा जाए तो गलत नहीं होगा.क्योंकि पहाड़ी इलाकों में बाइक से जाकर टीकाकरण अभियान को सफल बनाने वाली हिमांचल प्रदेश के मंडी जिले के सपनोत गांव की महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता गीता वर्मा की तस्वीरों ने सोशल मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरी थी.जिसके बाद उन्हें WHO(वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन) द्वारा जारी 2018 के कैलेंडर में जगह दी गई.साथ ही दुनियाभर में अपने काम से देश-प्रदेश का नाम रोशन करने पर राज्य और केंद्र सरकार ने भी प्रशस्ति पत्र देकर सम्मान किया था.

मध्यप्रदेश की मेघा भी गीता की ही तरह दूर-दराज के कठिन इलाकों में न सिर्फ टीकाकरण को सफल बना रही हैं बल्कि दस्तक अभियान,परिवार कल्याण कार्यक्रम,मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम और पल्स पोलियो अभियान में भी सराहनीय काम कर रही है.लिहाजा POZITIVE INDIA की टीम प्रदेश की इस बहादुर बेटी और उसके इस जज्बे को तहे दिल से सलाम करती है.हमें उम्मीद है कि समाज की इस असल नायिका की कहानी दूसरी लड़कियों को भी आगे आने और खुद को साबित करने का साहस देगी.

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