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नाउम्मीदी को मात देती छोटू के लंबे संघर्ष और बड़ी कामयाबी की ये कहानी

mayankshukla 3 years ago
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सोचिए किसी भी इंसान के लिए कितने गर्व और सम्मान की बात होगी कि जहां कभी वो एक चपरासी की नौकरी करता था, आज वहीं वो लोगों को पढ़ाता है. एक तिनके से शुरू करके पूरा का पूरा सपनों का शहर बना लेना इतना आसान नहीं होता.लेकिन जुनून एक ऐसी चीज है जिसके आगे कुछ नामुमकिन भी नहीं होता. ये कहानी भी अपनी जिद और जुनून से जिंदगी की हारी बाजी जीतने वाले उस शख्स की है, जिसका नाम तो है छोटू मगर उसने आज कामयाबी का पूरा आसमान अपने नाम कर लिया है.

 

             चंडीगढ़ बेस्ड CS group के फाउंडर & CEO छोटू शर्मा के संघर्ष और सफलता का सफर

19 साल पहले जब हिमाचल के कांगड़ा जिले के नेहरां पुखर गांव से छोटू शर्मा चंडीगढ़ आए थे तब उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वो कंप्यूटर कोचिंग ले सकें.कड़ा संघर्ष करना पड़ा.न जाने कितने दिन और कितनी रातें भूखे पेट सोना पड़ा.आगे बढ़ने की ललक में छोटू ने दिन भर दफ्तर में चपरासी गिरी की लेकिन हिम्मत नहीं हारी.आज वो कंप्यूटर कोचिंग इंस्टीट्यूट के साथ ही एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी का मालिक है जिसका टर्नओवर तकरीबन 10 करोड़ रुपए है.अपनी कंपनी में 150 लोगों को नौकरी देने के अलावा गरीब बच्चों की मदद और समाजसेवा में भी आगे है.


कभी सोए थे भूखे पेट, आज करोड़ों के मालिक, कभी एक-एक पैसे को मोहताज थे,आज खुद की कंपनी में 150 लोगों को नौकरी दे रखी है, नहीं भूले जरूरतमंदों की मदद करना, गरीब बच्चों को देते हैं मुफ्त कंप्यूटर शिक्षा और समाजसेवा के काम में भी बढ़-चढ़कर लेते हैं हिस्सा.


1998 में ढलियारा कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद छोटू के पास कंप्यूटर कोर्स करने के लिए 5000 रुपए भी नहीं थे.कहीं भी काम करने के लिए कंप्यूटर कोर्स बेहद जरूरी था. छोटू शर्मा चंडीगढ़ पहुंच गए.फीस भरने को पैसे नहीं थे लेकिन उनको खाली हाथ अपने घर लौटना नहीं था.वो जानते थे उनका परिवार भी इसमें कोई मदद नहीं कर सकेगा क्योंकि उनके माता पिता की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी.लिहाजा उन्होंने एक कंप्यूटर सेंटर में इस शर्त पर चपरासी की नौकरी कर ली कि उन्हें पगार की बजाए मुफ्त में कम्प्यूटर सिखाया जाए.फिर उसी सेंटर से कंप्यूटर कोर्स किया और माइक्रोसॉफ्ट सर्टिफाइड सॉफ्टवेयर डेवलपर बन गए.

छोटू शर्मा के मुताबिक ‘ इस मुकाम पर पहुंचने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी.पैसे बचाने के लिए एक समय का खाना तक छोड़ दिया. शाम के समय बच्चों को उनके घर जाकर ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. चंडीगढ़ में साइकिल पर निकलता था,अपना कंप्यूटर तक नहीं था’.

साल बीता और एक साथ दो अच्छे काम हुए. एक तरफ छोटू ने माइक्रोसॉफ्ट सर्टिफाइट सॉफ्टवेयर डेवलपर का कोर्स पूरा किया, दूसरी तरफ उसे एपटेक कंप्यूटर सेंटर में ही बतौर फैकल्टी छात्रों को पढ़ाने का प्रस्ताव मिला. शाम के समय छोटू फैकल्टी के तौर पर एपटेक में क्लास लेते और दिन में कई छात्रों के घर जाकर ट्यूशन देते.

2007 में छोटू ने अपने बचत के पैसों से एक बाइक और एक कंप्यूटर खरीदा और दो कमरों के किराए के फ्लैट में सीएस इन्फोटेक के नाम से अपना कंप्यूटर इंस्टीट्यूट खोल लिया. 6 महीनों में ही उनके इंस्टीट्यूट में 80 से ज्यादा स्टूडेंट आने लगे. धीरे-धीरे मेहनत रंग लाने लगी और कम ही समय में डॉट नेट की टीचिंग में छोटू का नाम चंडीगढ़ में छा गया. 2009 में छोटू ने मोहाली में जमीन खरीद कर अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी खोली.

वर्तमान में छोटू शर्मा एडवांस सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट लैंग्वेज की एक हजार युवाओं को शिक्षा दे रहे हैं.उनके छात्रों को माइक्रोसॉफ्ट, एक्सेंचर, टीसीएस और इन्फोसिस जैसी कंपनियों में नौकरी मिली.उनकी फर्म देश-विदेश की बड़ी कंपनियों को सॉफ्टवेयर बनाकर देती है.चंडीगढ़ में छोटू शर्मा को ‘गुरु ऑफ माइक्रोसॉफ्ट टेक्नोलॉजी’ कहकर बुलाया जाता है.वो युवाओं के रोल मॉडल बन गए हैं. उन्हें लुधियाना में एलएमए ट्राइडेंट फॉर यंग इनोवेशन आंत्रप्रेन्योर अवार्ड से नवाजा गया है. छोटू शर्मा के संघर्ष और मेहनत के चलते 2007 में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने उन्हें हिमाचल गौरव पुरस्कार से भी सम्मानित किया था.

छोटू बड़े कारोबारी जरूर बन गए, लेकिन परेशानियों के पुराने दिनों को नहीं भूले.कहते हैं कि दूसरों का दर्द वह व्यक्ति अच्छी तरह समझ सकता है, जिसने खुद परेशानियां झेली हों, अभाव देखा हो. छोटू भी ऐसे ही हैं. वो आज उन बच्चों को मुफ्त कंप्यूटर शिक्षा देते हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं.

परेशानियों के पहाड़ को अपने जुनून के पराक्रम से परास्त करने वाले छोटू की धूप-छांव भरी जिंदगी की कहानी वाकई आज देश के कोने-कोने तक फैलाई जानी चाहिए, हर एक बच्चे को पढ़ाना चाहिए, हर नौजवान को समझाना चाहिए, ताकि मुसीबतों से डरकर कभी कोई जिंदगी का साथ न छोड़े, बल्कि चुनौतियों से लड़ना सीखे और समय के आगे घुटने टेकने की बजाए डटना सीखे.


 

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