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पूजा के बासी फूलों ने इस युवा को कैसे बनाया बिजनेस का बादशाह,जानना चाहेंगे आप?

mayankshukla 5 years ago
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जहां एक तरफ मंदिरों में पूजा में चढ़ाए गए फूलों को बासी समझकर कचरे के ढेर में फेंक दिया जाता है, ऐसे में एक बेहद ही आम युवा ने  पूजा के इन बासी फूलों से करोड़ों कमाने का कारनामा कर दिखाया है.पूजा के इन्हीं बासी फूलों के जरिए उसने आज ना सिर्फ खुद का करोड़ों का बिजनेस एम्पायर खड़ा किया बल्कि कमाई के साथ-साथ मंदिरों में सफाई का संदेश भी दिया.

पूजा के बासी फूलों से जिंदगी की बाजी जीतने वाले युवा निखिल गम्पा की कहानी

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस से ग्रेजुएट निखिल गम्पा अपने स्टार्टअप ‘ग्रीन वेव’ नाम से एक ऐसी कामयाबी अपने नाम कर चुके हैं जो किसी को भी चौंका सकती है. उनका यह स्टार्टअप लोगों को प्रोत्साहित करने के साथ ही यह भी बताता है कि एक बार जो मन में ठान लो वह पूरा न हो ऐसा हो नहीं सकता.मुंबई के रहने वाले निखिल ने अपने नए आईडिया से कचरे में फेंके गए फूलों से सुगंधित अगरबत्ती तो बनाई ही साथ ही कई गरीब महिलाओं को रोजगार भी मुहैया कराया.मंदिरों और तीर्थस्थलों के बाहर डस्टबीनों में जमा किए पूजा के बासी फूलों से निखिल की कंपनी हर महीने लगभग साठ-सत्तर किलो अगरबत्तियां बना रही है.

ऐसे मिला आईडिया

 टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में पढ़ाई के दौरान निखिल को फील्ड वर्क के लिए मध्यप्रदेश के कई गांव जाना पड़ा लेकिन वहां बिजली और पानी की काफी दिक्कत थी.लिहाजा निखिल ने गांव के एक मंदिर में रात गुजारने की सोची क्योंकि उस मंदिर में बिजली की सुविधा मौजूद थी.इस दौरान निखिल ने देखा कि मूर्तियों के आसपास भारी मात्रा में बासाी फूल कूड़े-कचरे की तरह फेंका गया है.इतना ही नहीं इसकी वजह से निखिल भी मलेरिया की चपेट में आ गए और उन्होंने इस समस्या को हल करनी की ठानी. उसी पल उनके दिमाग में एक ऐसा आइडिया आया, जिससे भविष्य की एक बड़ी योजना ने मन ही मन उनके भीतर आकार ले लिया.निखिल ने सोचा कि इस तरह तो देश के सभी मंदिरों से रोजाना न जाने कितनी मात्रा में फूल फेंक दिए जाते होंगे. क्यों ना इनकी रिसाइकिलिंग कर कोई नया सामान तैयार किया जाए.साथ ही निखिल ने यह भी तय किया कि इस काम में गरीब महिलाओं को जोड़कर उन्हे इनकम का एक जरिया दिया जा सकता है.

ऐसे शुरू हुआ सफर
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस से सोशल आंत्रेप्रेन्योरशिप में मास्टर निखिल गम्पा ने सबसे पहले इस बारे में  विशेषज्ञों से सम्पर्क किया और उनके सहयोग से मुम्बई में ‘ग्रीन वेव’ नाम से एक संस्था गठित की. फिर शुरू हुआ ‘ग्रीन वेव’ का पहला प्रबंधन कौशल. मुंबई के मंदिरों के आसपास डस्टबीन रखवा दिए गए. अगले दिन से ही मंदिरों का कचरा उन डस्टबीन्स तक पहुंचने लगा. संस्था से जुड़ी महिलाओं के जरिए डस्टबीन में पड़े फूल गम्पा के कार्यस्थल पर जमा करने के साथ ही सुखाए जाने लगे.और फिर सूख जाने के बाद उन फूलों से अगरबत्तियां तैयार की जाने लगीं.


बासी फूलों ने गुलजार की जिंदगी
कचरे के फूलों से अब गम्पा की कार्यशाला में हर महीने लगभग साठ-सत्तर किलो अगरबत्तियां तैयार की जा रही हैं.काम चल निकला है.अब वह रोजाना प्रोडक्शन के बारे में गंभीरता से विचार कर रहे हैं. गम्पा ने एक पंथ दो काज ही नहीं, बल्कि कई काज साध लिये हैं. एक तो मंदिरों के इर्द-गिर्द साफ-सफाई रहने लगी है और दूसरी, इस काम के शुरू होने से बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार मिला है, साथ ही बासी-कचरा फूलों से एक अच्छा-खासा उद्यम खड़ा कर लिया गया.

वाकई निखिल गम्पा का स्टार्टअप साबित करता है कि बस जरूरत है तो एक नए आइडिया और कुछ कर दिखाने की ललक की,जिसके जरिए  कामयाबी की सीढ़ियों तक पहुंचा सकता है.हर किसी के व्यवहार जगत में ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है, जिस पर गौर करते चलें तो अपने लिए ही नहीं, समाज के लिए भी सबब बन सकते हैं, अपनी सक्सेस से लोगों के लिए उदाहरण बन सकते हैं.

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