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इंसान को इंसानियत की परिभाषा सिखाता कर्नाटक का एक आटो वाला

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कर्नाटक के रहने वाले ंमंजूनाथ वैसे तो कैब सर्विस प्रदान करने वाली कंपनी ओला के साथ अपना ऑटो चलाते हैं.आमतौर पर सभी ड्राइवर अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद घर जाते हैं, मगर मंजूनाथ रात में बेसहारों की मदद करने निकल जाते हैं.मंजूनाथ का ऑटो रिक्शा लोगों की मदद करने के साथ ही समाज को एचआईवी एड्स के प्रति जागरूक कर रहा है. वे अपने ऑटो पर ऐसे संदेश लिखकर रखते हैं जो लोगों को इस खतरनाक संक्रमण से जागरूक करता रहे.

ऑटो ड्राइवर ने बेसहारा लोगों की मदद का उठाया बीड़ा

सच ही कहा जाता है कि किसी की मदद करने के लिए रुपये पैसे की नहीं सही नीयत की जरूरत होती है. मंजूनाथ निंगप्पा पुजारी कर्नाटक के ऐसे ही एक ऑटो ड्राइवर हैं जो दिन में तो अपना ऑटो चलाते हैं और रात में उसी ऑटो को एंबुलेंस बना देते हैं. जो ऑटो दिन में उन्हें पैसे देता है वे उसे रात में दूसरों के लिए फ्री कर देते हैं. उन्हें बस एक फोन करने की देरी होती है और वे हाजिर हो जाते हैं. वे कैब सर्विस प्रदान करने वाली कंपनी ओला के साथ अपना ऑटो चलाते हैं. आमतौर पर सभी ड्राइवर अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद घर जाते हैं, लेकिन मंजूनाथ बेसहारों की मदद करने निकल जाते हैं.

वे शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक अपने ऑटो को एंबुलेंस बनाकर चलाते हैं. लेकिन उन्हें रात में कभी भी फोन कर दिया जाए तो वे हाजिर हो जाते हैं. इतना ही नहीं दिन में ऑटो चलाने से जो कमाई होती है उसमें से भी वो गरीबों को दान कर देते हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं यह काम पिछले कई सालों से कर रहा हूं. इस काम से मुझे इतनी खुशी मिलती है जितनी मैं किसी दूसरे काम से नहीं हासिल कर सकता हूं, मैं हमेशा से समाज सेवा करना चाहता था, अब मैं इस लायक हो गया हूं तो कर भी रहा हूं.

 

वे एक गैर सरकारी संगठन आश्रय फाउंडेशन से भी जुड़े हैं. मंजूनाथ का ऑटो रिक्शा लोगों की मदद करने के साथ ही समाज को एचआईवी एड्स के प्रति जागरूक कर रहा है. वे अपने ऑटो पर ऐसे संदेश लिखकर रखते हैं जो लोगों को इस खतरनाक संक्रमण से जागरूक करता रहे. इस पहल की शुरुआत के बारे में बात करते हुए वे कहते हैं, ‘इस काम को शुरू करने के पीछे मेरा एक निजी अनुभव था. एक बार मुझे अपने परिचित को अस्पताल पहुंचाना था लेकिन साधन न मिलने की वजह से उसे अस्पताल पहुंचने में दो घंटे लग गए.

इसके बाद वे आश्रय फाउंडेशन से मिले. फाउंडेशन के लोगों ने भी इस समस्या के बारे में गंभीरता से सोचा. वे ओला को भी धन्यवाद कहते हैं. उन्होंने बताया कि जब वे ओला के पास रजिस्ट्रेशन करवाने गए तो उन्हें स्पेशल केस मानकर पार्ट टाइम ऑटो चलाने की अनुमति दे दी गई. वे बताते हैं कि उनकी मां ने उन्हें ऑटो खरीदने के पैसे दिए थे.इस काम में उनकी पत्नी भी उनकी मदद करती है.अगर मंजुनाथ कुछ और काम कर रहे होते हैं तो उनकी पत्नी उनके फोन पर नजर रखती हैं और किसी भी जरूरतमंद का फोन आने पर वो उन्हें सूचित कर देती हैं.

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